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सभ्यता- संस्कृति को नष्ट करने की साजिश

प्राचीन भाषा संस्कृत ने विश्व को योग, प्राणायाम, आयुर्वेद और नाड़ी विज्ञान के साथ ही कई अनुपन ज्ञान दिये हैं। मात्र नाड़ी की चाल से किसी भी रोग व शरीर की दशा को बगैर किसी एक्सरे या स्कैन के बिना समय गँवाए जानने की उन्नत विधि दी। भारतीय  त्योहार मौसम, जलवायु और सामाजिक आश्यकताओं को पूरा करते हैं। सामाजिक समरसता पैदा करते हैं। जीवन शैली को आधुनिक बनाने का यह अर्थ कतई नहीं है कि पाश्चात्य सभ्यता की आंख बंद करके नकल की जाये।

अशोक “प्रवृद्ध”

सदियों से भारतीय सभ्यता- संस्कृति, धर्म- इतिहास को नष्ट करने का षडयंत्र रचा जाता रहा है। पहले वेद, पुराण आदि प्राचीन ग्रन्थों में मूल मन्त्र, श्लोकों में नये मन्त्र, श्लोक प्रक्षिप्त कर और फिर मन्त्रों के सत्य अर्थ, भाष्यों के स्थान भ्रांतिपूर्ण अर्थों, दूषित भाष्यों को प्रश्रय देकर यह प्रयास किया गया, और अब भारतीय पर्व- त्योहारों और परम्पराओं के स्थान पर नए त्योहारों और पश्चिमी परम्पराओं का प्रचलन करने का प्रयास कर इस षडयंत्र को अंजाम दिया जा रहा है। सहस्त्राब्दियों से सनातन व्यवस्था पर अवलम्बित भारतीय समाज में पर्व- त्योहारों की अपनी पारम्परिक वैज्ञानिक व्यवस्था व श्रृंखला है, लेकिन अब पर्व- त्योहारों की इस श्रृंखला को नष्ट कर विदेशी धर्म, पश्चिमी सभ्यता को लादने के उद्देश्य से हमारे देश में नये त्योहारों को लाया जा रहा है। भारतीय संस्कृति में माता, पिता, गुरु सदैव से नित्य नमनीय रहे हैं, लेकिन अब किसी ख़ास दिन को मदर डे, फादर डे, टीचर डे, आदि डे बनाने की एक श्रृंखला चलाई, बनाई जा रही है।

जिसके तिथि निर्धारक व संचालक और कारणों का कोई खास अता- पता तक नहीं है। भारतीय पर्व- त्योहारों के समान पवित्रता भी इन त्योहारों में नहीं दिखाई देती। लेकिन पाश्चात्य मिडिया के धुआंधार प्रचार के कारण शीघ्र ही युवा पीढ़ी इन पश्चिमी प्रेरित त्योहारों के प्रभाव में आकर इन्हें अपनाने लगी है। और आधुनिकता का नाम देकर रात- विरात इतराने लगी है।  बे सिर पैर के आरम्भ की गई इन नवीन त्योहारों को अपाने के कारण कई प्रकार के शारीरिक, मानसिक विषाद समाज में पनप रहे हैं। लेकिन पाश्चात्य संस्कृति की अनुवर्ती मौजदा भारतीय पीढ़ी इसका अनुकरण कर प्राचीन भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात करने के इस षडयंत्र में स्वयं शामिल हो रही है।

भारत विभाजन के पूर्व से ही भारतीय सभ्यता- संस्कृति को नष्ट- भ्रष्ट करने का यह षडयंत्र विधर्मियों, विदेशियों ने आरम्भ कर रखा था, जो स्वाधीन भारत में आज भी निरंतर जारी है। पूर्व में वेद के मन्त्रों के भ्रांतिपूर्ण भाष्य लिखे गए, वेद के मन्त्रों और महाकाव्यों, पुराणों के श्लोकों में नए श्लोक प्रक्षिप्त किये गए। भारतीय ग्रन्थों को मिथक कहकर विदेशी मजहब को प्रश्रय देने के लिए पाश्चात्य तरीके से इतिहास लेखन कर भारतीय सत्य इतिहास, वास्तविक घटनाओं को छुपाने का प्रयास किया गया। भारतीय ज्ञान- विज्ञान की संवाहक देश के प्रत्येक ग्रामों में अवस्थित गुरुकुल प्रणाली को समाप्त कर लार्ड मैकाले की ब्रिटिश शिक्षा पद्धति को लागू किया गया । देवभाषा संस्कृत को मृत भाषा की संज्ञा देकर उसके पठन- पाठन से भारतीयों को दूर किया गया । देवनागरी लिपि, भारतीय अंक प्रणाली- देवनागरी अंक को लुप्तप्राय कर दिया गया ।

सहस्त्राब्दियों से सांस्कृतिक दृष्टिकोण से एकमेव भारत के अनेकानेक टुकड़े करने के बाद 1947 में शेष बचे भारत को पहले इंडिया बनाया गया, अब भारतीय धर्म- संस्कृति, इतिहास, भाषा, पर्व- त्यौहार, खान- पान, पहनावा, रीति- रिवाज, सोच, पारिवारिक सम्बन्ध को निशाना बनाकर भारत को इंडिया में बदलने के कुप्रयास तीव्रता से सफल होने लगे हैं। भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी इन षडयंत्रों पर अंकुश नहीं लग सका। और इसे निरंतर जारी रखने के लिए  भारत की राजनीति में भांति- भांति के षडयंत्र, न जाने कैसे-कैसे प्रपंच नित्य चलते ही रहते हैं, जिसकी कल्पना करना कठिन ही नहीं असम्भव है। स्वतंत्रता से पूर्व हिन्दी की कई ऐसी पत्र-पत्रिकाएं होती थीं, जो हिन्दी पढ़ने के लिए देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि में आती थीं। भारतीय संविधान के निर्माण के समय अतिशक्तिशाली रोमन लिपि की लोबी  ने अंक देवनागरी में न लिखकर मात्र रोमन लिपि में लिखने का प्रावधान संविधान में दर्ज करवाने में सफलता प्राप्त कर ली, और भारतीय देवनागरी लिपि के समर्थक मुंह ताकते रह गए।

आज स्थिति ऐसी बन आई है कि देवनागरी के अंकों को लिखना तो दूर, आम जन इसे बोल भी नहीं पाते। पूर्व में चैत्र, बैशाख आदि देशी भारतीय मास, रवि, सोम आदि सप्ताह के दिन के नामों का हिन्दी में प्रचलन था, परन्तु अब नई पीढ़ी के युवा बोलने पर इसे समझ भी नही पाते। सादर प्रणाम, नमस्ते, जय श्रीराम, जय गोपाल, चरण स्पर्श आदि अभिवादन के प्रक्रियाओं का स्थान गुड मोर्निंग, गुड इवनिंग, गुड नाईट, हस्त मिलन आदि तरीकों ने ले लिया है। पत्र- लेखन की परम्परा समाप्त हो चुकी है, डाकिये के इन्तजार करने का चलन खत्म हो चुका है। अब इनका स्थान एस एम एस व अणुडाक अर्थात ई -मेल ने ले लिया है। और चलंत दूरभाष अर्थात मोबाईल के माध्यम से पलक झपकते ही आंग्ल भाषा में संदेश भेजे जाने वाले तक पहुँचने लगा है। हिन्दी भाषा के संदेश देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि में भी लिखे जाने का प्रचलन जोरों पर है।

संसार के अन्य देशों में संदेश लिखने का चलन उनके राष्ट्रभाषा में है, लेकिन दुखद है कि हमारे देश भारत में मोबाईल के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय के द्वारा अब तक हिन्दी भाषा के देवनागरी लिपि का मानकीकरण नहीं किया गया है। यह कार्य मोबाईल के प्रचलन आरम्भ होने के साथ मोबाईल कम्पनियों को लागू करने के लिए आदेश देकर अनिवार्य रूप से शुरू किया जाना आवश्यक था, लेकिन इस कार्य में विलम्ब होने के कारण भारतीयों को विवश होकर देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि में ही अपनी भाषा के संदेश भेजने को विवश होना पड़ रहा है, जिन्हें प्राप्तकर्ता को पढने में भी कठिनाई होती है।

इन्टरनेट के सम्बन्ध में सरकारी नोटिफिकेशन निकलने के बीस- बाईस वर्षों बाद भी संदेश लेखन व प्रेषण के लिए कोई ऐसा देवनागरी संस्करण नहीं बन पाना सरकार व हिन्दी प्रेमियों की निष्क्रियता का परिचायक है, जबकि देवनागरी लिपि के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओँ के साथ ही श्रीलंका, तिब्बत, वर्मा (म्यामांर) इंडोनेशिया, मलेशिया देशों की लिपि को देवनागरी पर आधारित होने के कारण आसानी से जोड़ा जा सकता है। इससे एक भाषा से दूसरी भाषा में भाषांतरण होना भी सहज और सरल हो जायेगा, लेकिन मोबाईल के प्रचलन के विगत ढाई दशकों में ऐसा कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जाने के कारण मजबूर होकर एक नई पीढ़ी अंग्रेजी न जानने के बावजूद भी रोमन लिपि में संदेश भेजने में अभ्यस्त हो चुकी है, और देवनागरी लिपि व अंकों को भूलने लगी है। धीरे-धीरे देवनागरी लिपि में लिखना उनके लिए एकदम असंभव और पढ़ना अत्यंत कठिन हो जायेगा। ऐसी स्थिति निरंतर बनी रहे और यही क्रम बना रहा तो कुछ ही वर्षों में देवनागरी लिपि भी देवनागरी के अंकों की भांति हमारे देश से सदैव के लिए गधे की सिंघ की भांति विलुप्त हो जायेगी।

इसी तरह भारतीय पर्व- त्यौहार, भारत के पहचान, भारतीय अस्मिता भी विदेशियों, विधर्मियों, वामपंथियों और भारत विरोधियों के निशाने पर हैं। शनैः- शनैः भारतीय पर्व- त्योहारों को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। उनके स्थान पर नये- नये अंग्रेजी त्योहारों, पाश्चात्य त्योहारों को लाया जा रहा है। भारतीय वेशभूषा, भारतीय पहरावे तो समाप्तप्राय ही हो चुके हैं। धोती- कुरते का स्थान पैंट अथवा पतलून और शर्ट ने ले लिया है। चमड़े की कमरबंद के साथ कोट अथवा जैकेट भी अनिवार्य पहरावे के रूप में भारतीयों ने अपना लिया है। सिर पर से शिखा तो सदियों से गायब प्राय ही है। पगड़ी के स्थान पर सिर पर टोपी विराजमान है। यही स्थिति स्त्रियों के पहरावे की भी है। लेकिन सुखद यह है कि अनेक विपरीत परस्थितियों में भी भारतीय नारी ने अपनी भारतीय अस्मिता गौरवमयी ढंग से बना कर रखने की कोई कसर नहीं छोडी, वर्ना विदेशी संस्कृति व मजहब ने तो स्त्रियों की लाज, शर्म, शालीनता को ताक पर रख छोड़ने की पूरी योजना बना रखी थी। फिर भी स्त्रियों के कार्य स्थलों और विद्यालयों- महाविद्यालयों में रूटीन के नाम पर भारतीय पहरावे के विपरीत ड्रेस कोड लागू कर स्त्रियों के लिए वस्त्र पहनने के आदेश जारी किये जाते हैं, जिन्हें झिझकते हुए, शर्म महसूस करते हुए भी बालिकाएं व महिलाएं पहनने को विवश हैं।

उल्लेखनीय है कि देवभाषा कही जाने वाली हमारी प्राचीन भाषा संस्कृत ने विश्व को योग, प्राणायाम, आयुर्वेद और नाड़ी विज्ञान के साथ ही कई अनुपन ज्ञान दिये हैं। मात्र नाड़ी की चाल से किसी भी रोग व शरीर की दशा को बगैर किसी एक्सरे या स्कैन के बिना समय गँवाए जानने की उन्नत विधि दी। भारतीय  त्योहार मौसम, जलवायु और सामाजिक आश्यकताओं को पूरा करते हैं। सामाजिक समरसता पैदा करते हैं। जीवन शैली को आधुनिक बनाने का यह अर्थ कतई नहीं है कि पाश्चात्य सभ्यता की आंख बंद करके नकल की जाये। आज पश्चिम भारत के सनातन विज्ञान को अपना रहा है, और हम उसका सड़ा-गला खाने में भी नहीं हिचकचा रहे हैं। भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के इस षडयंत्र में भारत का मीडिया बाजार के दलालों के साथ बुरी तरह से मिला हुआ है। उनके पैरोकार भी भारत की राजनीति में जगह-जगह पर कुंडली मारे बैठे हैं। ऐसे में बहुसंख्यक भारतीयों को समाज के इन भस्मासुरों को समझना होगा, और उनकी भाषा में ही उनको जवाब देकर भारत, भारतीय और भारतीयता को बचाने के प्रयास में शामिल होना सनातन हित में उत्तम होगा।

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