मध्यप्रदेश में संवैधानिक संकट : अदालत पर नजर…?

जिसकी आशंका थी, वहीं हुआ। राज्य की कमलनाथ सरकार ने राज्यपाल के निर्देश को रददी की टोकरी में डालते हुए विधानसभा में मतविभाजन परीक्षण (फ्लोर टेस्ट) नही कराया और कोरोना की आड मे विधानसभा की कार्यवाही अगले दस दिन (अर्थात 26 मार्च) तक के लिए स्थगित कर दी।

अब राज्यपाल और विधानसभाध्यक्ष एक दूसरे के आमने-सामने है और अब भाजपा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी की जा रही है, अब सुप्रीम कोर्ट ही राज्य की सरकार व राजनीति का भविष्य तय करेगा या अपनी अवमानना से नाराज राज्यपाल केन्द्र की मोदी सरकार को राज्य के संवैधानिक संकट पर अपनी रिपोर्ट भेजकर राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा भी कर सकते है,

फिलहाल प्रदेश व उसकी सरकार का भविष्य अधर मे लटक गया है, लेकिन यह तय है कि मौजूदा माहौल में राज्यपाल और भाजपा सरकार पर भारी पडते नजर आ रहे है।  वास्तव में मौजूदा राजनीतिक गतिरोध की शुरूआत तब हुइ जब राज्य के दिग्गज कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक सप्ताह पूर्व कांग्रेस से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली, सिंधिया ने अपने इस्तीफे के पूर्व ही अपने समर्थक 22 विधायकों व 6 मंत्रियों को बंगलूरू भेज दिया था, और वहा से सभी विधायको व मंत्रियों के इस्तीफे बुलवा कर राज्यपाल व विधानसभाध्यक्ष को सौंप दिए थे।

मुख्यमंत्री ने सबसे पहले अपनी केबिनेट के इन छः मंत्रियो को सबसे पहले केबिनेट से बर्खास्त किया और विधानसभाध्यक्ष ने इन आधा दर्जन मंत्री-विधायको के इस्तीफे मंजूर कर लिए इस बीच जब राज्यपाल अपने अवकाश की समाप्ति के बाद लखनउ से लौटे तो उन्होने विधानसभाध्यक्ष को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 175/2 के तहत निर्देश दिए कि विधानसभा बजट सत्र के पहले दिन (अर्थात 16 मार्च को) राज्यपाल के अभिभाषण के बाद फ्लोर टेस्ट करवाया जाए किन्तु विधानसभा की दलील थी कि राज्यपाल को विधानसभा के अन्दरूनी क्षेत्र मे हस्तक्षेप कर फ्लोर टेस्ट करने का निर्देश देने का अधिकार नही है

विधानसभा सदन तथा परिसर में केवल अध्यक्ष के ही निर्देश माने जाते है। ऐसा कहकर अध्यक्ष ने राज्यपाल के विधानसभा से विदा होते ही विधानसभा की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी फ्लोर टेस्ट सम्बंधी राज्यपाल के निर्देश का पालन नही किया। इसके लिए कोरोना बीमारी का सहारा लिया गया। आज विधानसभा मे भी अदभूत नजारा था, विधानसभाध्यक्ष सहित पूरे कांग्रेस पक्ष के विधायक मंत्री मास्क पहनकर सदर में उपस्थित हुए थे, राज्यपाल महोदय ने अपने आपको अस्वस्थ बताकर अभिभाषण का केवल एक पेरेग्राफ पढा और फिर विधायको को वैधानिक सीख देकर सदन से चले गए। उनकी विदाई करने के बाद विधानसभाध्यक्ष ने सदन में आकर सदन की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी, सदन में भाजपा ने काफी नारेबाजी और हंगामा किया, किन्तु वह निष्फल सिद्व हुआ।

राज्य के भाजपा नेताओं खासकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर आदि नेताओं को इस स्थिति का पहले अनुमान था, इसलिए उन्होने दिल्ली के वरिष्ठ वकीलों से चर्चा कर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की पहले से ही तैयारी कर रखी थी, कोई आश्चर्य नही की आज ही सुप्रीम कोर्ट मे यह मामला दाखिल हो जाए।

यहॉ यह उल्लेखनीय है कि पिछले साल अर्थात 2019 में कर्नाटक में सियासी संकट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट के निर्देश दिए थें, 17 मई को येदुरप्पा सरकार ने शपथ ग्रहण की थी, और कांग्रेस की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने 48 घंटे में फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश दिये थे। 1996 मे जगदंबिका पाल के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट के निर्देश दिये थे 2016 मे उत्तराखंड में भी यही कहानी दोहराई गई थी, सुप्रीम कोर्ट ने एस.आर. बोम्मई को तो पुनः मुख्यमंत्री पद की शपथ तक दिलवा दी थी और राज्यपाल की कार्यवाही को पूरी तरह असंवैधानिक बता दिया था।

इसलिए अब तक कुल मिलाकर मध्यप्रदेश का राजनीतिक भविष्य सुप्रीम कोर्ट व राज्यपाल के आसपास केन्द्रित हो गया है, अब देखना यह है कि राज्यपाल विधानसभा भंग करने की सिफारिश पहले करते है या सुप्रीम कोर्ट विधानसभा व सरकार को कोई निर्देश जारी करता है ? जो भी हो, मध्यप्रदेश में संवैधानिक संकट तो पैदा हो ही गया है और राज्यपाल ने बिना फ्लोर टेस्ट के ही कमलनाथ सरकार को अल्पमत में मान लिया है, जिसका कि उन्होने अपने निर्देश में जिक्र भी किया है। अब देखिये 26 मार्च के बाद विधानसभा बैठती भी है या नही?

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