कोरोना और परदेसियों की घर वापसी, फिर टिड्डियों का हमला, शुभ तो नहीं

कोरोना के मरीजो की संख्या में और मरने वालों की संख्या में वृद्धि तथा मजदूरों की घर वापसी के लिए 3300 से अधिक ट्रेनों के बाद दिल्ली से 340 और बंगाल से 200 से अधिक तथा महाराष्ट्र से 200 ट्रेनों की मांग बता रही है कि दूसरे राज्यों से आए ‘परदेशी मजदूरों ‘ का साहस और दम अब काम करने के स्थानों से फूल चुका हैं। उधर लाक डाउन से बढ़ती बेरोजगारी ने देश के 12 (बारह करोड़) लोगों को न केवल बेकार किया हैं, वरन उनके परिवारों के सामने भूख से बरबादी का मंजर दिखा दिया हैं।

गांव या मुल्क लौटते इन बेबस दिहाड़ी मजदूरों की संख्या भी नौ करोड़ है! परंतु टिड्डियों के हमले ने उत्तर -प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र और गुजरात की ओर रुख किया हैं। अभी तक कृषि उत्पादन के अच्छे होने की उम्मीद थी। भले ही लाक डाउन ने उन्हें उनकी फसलों का लाभकारी मूल्य न मिलने का बड़ा कारण सरकारी अफसरों की अव्यवहारिक आदेश रहे हैं। मंडियों में समर्थन मूल्य के लिए एमपी में रायसेन, भोपाल, सीहोर आदि गेंहू उत्पादकों की मीलों लंबी ट्रालियां के चित्र अखबारों में छाप रहे हैं। मगर मंडी अफसर दिन (जो अब 24 घंटे से -बारह घंटे का हो गया हैं) उस दौरान वे मात्र 50 किसानों का कोई माल खरीद रहे हैं।

दो से तीन दिनों तक खुले में लू गर्मी से तपते हुए इंतज़ार करने के बाद, मजबूरी में बाहर खड़े मुनाफाखोर बनिये को औने-पौने दामो में अपना उत्पाद बेचने पर मजबूर हो रहे हैं। इस लापरवाही का फल भी कोरोना और लाक डाउन से परेशान आम जनता को अनाज के दामो में आने वालों दिनो में महंगे दामों पर लेना होगा। क्योंकि लाक डाउन में सब्जी की बिक्री की इजाजत दी गयी हैं – परंतु मंडिया बंद होने के कारण गांव के पास से व्यापारी औने-पौने दामों में आलू -प्याज़ आदि को 400 गुना दामों पर नगरों में बेच रहे हैं। उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही सरकारी अफसरों की नासमझी से ठगे जा रहे हैं।

अभी तक देश के सरकारी भंडारों में गेंहू और चावल का पर्याप्त भंडार होने का दावा सरकार का था। जो सही भी था। कुछ चावल और गेंहू की खरीद फूड कार्पोरेशन ने तथा राज्य सरकारों ने की हैं। परंतु टिड्डियों के हमले ने उत्तर भारत के राज्यों में जो तबाही मचाई है विगत चार दिनों में उसका ठीक ठीक अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता।

इसका दूसरा पहलू जो काफी दर्दनाक तस्वीर का संकेत हैं भविष्य के लिए वह हैं परदेशी माजदूरों के अपने गांव में परिवारों में पहंुचने पर भूखे नहीं रहने की आस जो टिड्डियों से बर्बाद हुई फसल उनकी उम्मीद को खाई से खड्ड की ओर धकेल देगी। वैसे ही अशांत ग्रामीण क्षेत्रों में तब अन्न के दानों को लेकर झगड़े हो या मजबूर मजदूर जो शहर से निराश हो कर आसरे के लिए गांव या घर आया हैं। उसकी आशा भी टूटेगी जब पिता या भाई अपने को बचाने के लिए इनका साथ छोड़ देंगे। फिर होगा यादवी संग्राम और मजबूत ही जीतेगा। रोजी कमाने की आस में सालों या महीनों गांव से बाहर रहा व्यक्ति या उसका परिवार अकेला पड़ जाएगा ! तब रईसों की या महानगरों की आशा में कहे – जो गोदी मीडिया के अनेक विद्वान भी कहते हैं survival of fittest यानि जो तगड़ा वही जीतेगा !

अब भूखे -प्यासे घर -गांव को लौटे इन 6-7 करोड़ लोगों का भविष्य भी इतिहास ही लिखेगा। जैसे 2020 की घटनाओं का लिखा जाएगा और यह सरकारी मदद से लिखवाये असत्य दावों की भांति नहीं होगा – वरन आपात काल के पूर्व जिस प्रकार आबादी नियंत्रण के लिए नसबंदी से परेशान गांव के आम आदमी ने सत्ता को बेदखल कर बदला लिया था। जो लोग बड़े अखबारों में नरेंद्र मोदी और बीजेपी को देश के भविष्य के लिए आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य बता रहे हैं वे भी इंडिया इज इन्दिरा गांधी के परिणाम को भूल रहे हैं ! की शीर्ष नेतृत्व की अवास्तविक स्तुति उसे कमजोर ही करती हैं। उसमें अभिमान जागृत करती है। हमारी सभ्यता में उन्हीं शासकों को आज भी स्मरण किया जाता हैं। लाक डाउन के दौरान सरकार की प्रेरणा से दूरदर्शन एवं चैनलों में भक्ति भाव वाले कटहये और प्रसंग भी लोगों द्वारा देखे जा रहे हैं। क्या उनके मन मस्तिष्क में आज के हालातों की इनसे तुलना करने का विचार नहीं आता होगा ! क्या कोई दुर्योधन का भी पक्ष लेगा? क्या कोई कर्ण की निंदा करेगा ? भले ही वे अधर्मियों के साथ थे! क्या भीष्म पितामह सभी आर्यजनों के पूज्य होने के बाद भी – सीरियल में उनकी भूमिका की सराहना करेंगे !

अब बात टिड्डियों के फसलों पर हमले की, लाक डाउन के बाद सभी अर्थ शास्त्री मान रहे थे कि बाज़ार में मुद्रा की तरलता का फौरी उपाय किसानों द्वारा किए जाने वाले खर्चे से ही आएगी ! क्योंकि मजदूरी -और वेतनभोगी वर्ग द्वारा इस दौरान जो आर्थिक मार झेली हैं वह उन्हें पेट भरने लायक भी छोड़े। ऐसी उम्मीद अर्थशास्त्री नहीं करते हैं। 12 करोड़ लोग ऐसे हैं जो सेवा अथवा उत्पादन क्षेत्र में लगे थे। उत्पादन ठप होने से -अब कंपनियों ने कर्मचरियों की छंटनी कर दी हैं। आधे से अधिक छोटे और मझोले उत्पादन इकाइयों ने – भी अपने कर्मचरियों के वेतन में 50% कटौती कर दी हैं। समाचार पत्र – और चैनल भी इसके भुक्त भोगी हैं। एक अनुमान के अनुसार देश की कुल आबादी में 48 करोड़ लोग कृषि या संबंधित क्षेत्रों में लगे हैं। जिनकी आमदानी पर टिड्डियों का आतंक हैं। न्यूनतम मूल्य न मिलना हैं।

ऐसे में आबादी का बड़ा हिस्सा कोरोना से ज्यादा भूख की ओर बच्चों की फीस तथा मकान और वाहन की किश्त भरने को लेकर परेशान हैं। बैंक भी अपनी उधारी वसूल नहीं होने पर वाहनों को घसीट कर तो ले आयें पर रखेंगे कहां? क्या थानों में जब्त किए हुए दो पहिया और चार पहिया के कबाड़ के समान ही वे भी डंप स्टोर बनाए। इन सबके अलावा कुछ दैवी कारण भी लगते हैं जैसे इस वर्ष 6 सूर्य और चंद्र ग्रहण का होना। कहां तो एक ग्रहण ही राजा या शासक के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता हैं। यहां तो एक साल में ही छह ग्रहण हैं ? चुनौती कोरोना और भुखमरी तथा बेरोजगारी की हैं। इसी दौरान बंगाल और बिहार में विधानसभा चुनाव भी हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares