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आज क्या सर्वाधिक मजबूर-मौन सरकार नहीं?

इतिहास खुद को दोहराता है! मगर इतनी जल्दी यह किसी को अंदाजा नहीं था। सन् 2012- 13 में मनमोहन सिंह सरकार की क्या  हालत हो गई थी? ऐसी ही या इससे थोड़ी बेहतर या इससे खराब,  कहना मुश्किल है! हां मगर एक बात जरूर दावे के साथ कही जा सकती है कि उस समय सरकार पर हो रहे चौतरफा हमलों का कारण क्या था यह आज कोई नहीं बता सकता। किसी को याद नहीं है। भीड़ की मारो मारो की साइकलोजी के तहत सारा विपक्ष, मीडिया, सिविल सोसायटी, व्यापारी,सरकारी कर्मचारी सब चिपट गए थे।

आज जब इतने लोग मर रहे हैं, और मरने के बाद श्मशान में जलने का इंतजार और मरने से पहले आक्सीजन, बेड, वैंटिलेटर, रेमडेसिवियर इंजेक्शन, दूसरी दवाओं के लिए मारामारी करते हुए तो क्या यह सवाल नहीं बनता कि सात साल पहले ऐसा क्या हुआ था जो पूरे देश को सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतार दिया था? आज इस सवाल का जवाब कोई नहीं देगा।

एक टू जी के आरोप जो आज तक साबित नहीं हुए। एक हर मर्ज की दवा लोकपाल की मांग, जो भी अभी तक पूरी नहीं हुई। इनके अलावा और क्या था। एक बवंडर! एक झूठा प्रपंच ! एक नरेटिव (छवि) की मनमोहन सिंह की सरकार फेल है। पूरा देश इसमें बह गया। खैर सरकारें बदलना लोकतंत्र के मजबूत होने की निशानी मानी जाती है। और फिर यह सरकार तो आई ही मजबूत सरकार के नारे पर थी। मनमोहन सिंह को मजबूर और मौन बताते हुए।

मगर आज यह सरकार इतिहास की सबसे ज्यादा मजबूर और मौन सरकार में बदल गई है। सरकार कुछ भी करते हुए नहीं दिख रही। एकदम हाथ पांव डाले हुए, या जैसा कि दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर छुपाए हुए। राजनीतिक भाषा में इसे लेम डक (Lame duck) सरकार कहते हैं। मनमोहन सिंह के समय में यह मीडिया का प्रिय शब्द था।

इसका शाब्दिक मतलब होता है लंगड़ी बत्तख। जो कुछ नहीं करती। कुछ नहीं कर सकती। राजनीति मायनों में खतरे में सरकार। मगर आज इस मुहावरे का उपयोग मीडिया नहीं करता। मीडिया के मुताबिक सरकार को कोई खतरा नहीं है, न आज, न आगे कभी भविष्य में! खतरे में जनता है, मगर उसकी मीडिया को कोई चिन्ता नहीं है। खतरे में देश भी है, मगर उसे भी मीडिया ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ जोड़ रखा है। जिसका मतलब है कि मोदी मजबूत है तो देश भी मजबूत है। अब इसकी एक उलटबांसी यह भी होती है कि अगर देश को मजबूत रखना है तो मोदी जी को मजबूत रखना होगा।

भक्त यह कर भी रहे हैं। उनके जीवन का परम ध्येय यही है कि मोदी जी का कवच बन जाओ। चाहे उन्हें, उनके परिवारों को कोरोना से कितना ही नुकसान उठाना पड़े मगर वे इसके लिए सरकार को दोषी मानने को तैयार नहीं हैं। दोषी नेहरू
है, राहुल है, खुद जनता है, भगवान है, कोई एक नया प्राणी आया है सिस्टम, वह है, भूत है, प्रेत है, मगर मोदी सरकार नहीं है। विदेशी मीडिया कठोर शब्दों में कह रहा है कि अपनी छवि बचाने के लिए मोदी ने जनता को खतरे में डाल दिया।

विश्व का सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल जरनल लैंसेट, जिसे राजनीति से कोई लेना देना नहीं है, कह रहा है कि इसके लिए मोदी सरकार जिम्मेदार है। समस्या पर चर्चा न होने देना और अपनी आलोचना को दबाने की उनकी कोशिश माफी के काबिल नहीं है। मगर भक्त, जिसका एक हिस्सा मीडिया भी है बडे शातिराना ढ़ंग से कह रहा है कि पता नहीं क्या हो रहा है। लोग मर तो रहे हैं, मगर क्यों यह नहीं मालूम। शायद आ गई होगी उनकी।

हद है कि कांग्रेस के लोग सत्ता पक्ष के मंत्रियों, सांसदों, मीडिया के बड़े दिग्गजों की मदद करते घूम रहे हैं। अभिनेता सोनू सूद और कई दूसरे लोगों की जान बचाने में लगे हुए हैं। मगर केन्द्र सरकार कहीं नहीं दिख रही। विदेशी मीडिया आम तौर पर किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष का नाम लेकर आलोचना नहीं करती। मगर कोरोना पर प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि की हम युद्ध जीत गए हैं। और विश्व उम्मीद भरी निगाहों से हमारी तरफ देख रहा है के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने मोदी का नाम लेकर उनकी आलोचना की।

विदेशों में इन आलोचनाओं और भारत के बारे में नकारात्मक खबरों से वहां रहे रहे भारतवंशियों के सर शर्म से झुक गए।
विदेशों में भारत का एक नाम था। काम करते हुए आगे बढ़ते भारत का। लेकिन भारत झूठे दावे करता है, खुद सहित पूरी दुनिया को खतरे में डालता है यह दुनिया में कोई नहीं मानता था।

नेहरू, राजीव गांधी का देश माना जाता था जो वैज्ञानिक विकास कर रहा है, वैज्ञानिक सोच रखता है। मगर आज उसके बारे में एक नई धारणा बनी है कि यहां बोला बहुत जा रहा है, मगर किया कुछ नहीं जा रहा। हालांकि यह धारणा बहुत जल्दी टूट जाएगी, मगर दुनिया में भाषणवीर की छवि बनना कोई अच्छी बात नहीं है।

कैसी विडंबना है कि एक तरफ तो विदेशी मीडिया नेमिंग एंड शेमिंग (नाम लेकर शर्मिंदा करना) कर रहा है, दूसरी तरफ देश में सरकार और सत्ताधारी पार्टी के नेताओं से मदद न मांगकर विपक्ष के नेताओं और प्राइवेट आदमियों से मदद मांगी जा रही है। सोशल मीडिया पर जिन्हें सबसे ज्याद टेग किया जा कहा है उनमें यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास, आप पार्टी के नेता दिलिप पांडेय और अभिनेता सोनू सूद का नाम है। क्या सरकार के लोग मदद नहीं कर रहे? जिम्मेदारी तो सारी उनकी थी। श्रीनिवास आक्सीजन का सिलेंडर लेकर मरीज के घर तक पहुंच जाता है, जबकि यह काम सरकार के लोगों का होना चाहिए था। आश्चर्य की बात है कि परेशान हाल, अपनी या अपने प्रिय की जान बचाने के लिए सोशल मीडिया पर सरकार के लोगों से बिल्कुल मदद नहीं मांग रहे।

मुसीबत में तो आदमी को अपना ही याद आता है। जनता ने लगातार दो बार मोदी को वोट दिया। अनुपम खेर जैसे लोग आज भी यही कहते हैं कि आएगा तो मोदी ही! लोग इतने विश्वास से बोलते हैं, जितने विश्वास से मोदी के वैज्ञानिक सलाहकार भी नहीं बोलते की तीसरी लहर तो आएगी!

काहे कि? भक्त कहते हैं मोदी की! उन्हें कोरोना की तीसरी, चौथी लहर, मौत, बर्बादी, बस की सीट पर रुमाल रखकर सीट घेरने की तरह चिता के चबुतरे पर दो लकड़ियां रखकर, चिता स्थल घेरने तक की अमानवीय स्थितियों, किसी की परवाह नहीं है बस एक ही रट है कि आएगा तो मोदी ही!

क्या है इसका राज? कोई रहस्य नहीं है। यह ओपन सिक्रेट है। और वह है नफरत और सिर्फ नफरत! समर्थन का सारा पहाड़ नफरत की नींव पर खड़ा किया हुआ है। भक्तों को जो उम्मीद है कि उनका जहाज नहीं डूबेगा तो इसका कारण यह नफरती हवाएं ही हैं जो उन्हें लगती हैं कि ये हमेशा अनुकूल ही रहेंगी। मगर नफरत कभी निर्णायक तत्व नहीं हो सकती। वह एक दो सफलताएं तो दे सकती है मगर

स्थाई नहीं। हिटलर का उदाहरण सबको मालूम है कि उसने यहूदियों से नफरत के कारण पूरी दुनिया को विश्व युद्ध में झौंका मगर अंत में वह और उसकी नफरत दोनों हारे। ऐसे ही जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था उस इंग्लेंड के प्रधानमंत्री चर्चिल ने नफरत भरे हुए शब्दों में भारतीयों का दूसरे दर्जे का इंसान बताते हुए कहा था कि ये खुद अपने उपर शासन करने लायक नहीं हैं।

इन्हें चलाने के लिए हमारी जरूरत है। मगर ये नफरत भी हारी थी। नफरत का विचार भी हारा था। आज भी उसी नफरत को ताकत बनाने की कोशिश की जा रही है। मगर नफरत कभी ताकत नहीं बन सकती एक दो धक्के लगा सकती है। मगर वह शक्ति नहीं होती शक्ति का भ्रम होता है!

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इस महीने 11वीं बार बढ़े पेट्रोल-डीजल दाम
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 97 रुपए से ऊपर पहुंच गई है। साथ ही देश के 13 राज्यों…

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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इस महीने 11वीं बार बढ़े पेट्रोल-डीजल दाम

नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 97 रुपए से ऊपर पहुंच गई है। साथ ही देश के 13 राज्यों में पेट्रोल के दाम एक सौ रुपए प्रति लीटर से ऊपर पहुंच गए हैं। रविवार को केंद्र सरकार की पेट्रोलियम कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दाम में बढ़ोतरी। जून के महीने में यह 11वीं बढ़ोतरी थी। इस बढ़ोतरी के बाद इस महीने पेट्रोल की कीमत दो रुपए 99 पैसे और डीजल की कीमत दो रुपए 72 पैसे बढ़ चुकी है।

रविवार को हुई बढ़ोतरी के बाद दिल्ली पेट्रोल 29 पैसे महंगा होकर 97.22 और डीजल 28 पैसे महंगा होकर 87.97 रुपए प्रति लीटर बिक रहा है। देश के 13 राज्यों में पेट्रोल एक सौ रुपए प्रति लीटर पर पहुंच गया है। मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के सभी जिलों में पेट्रोल एक सौ रुपए के पार पहुंचा गया है। वहीं बिहार, तेलंगाना, कर्नाटक, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, ओड़िशा, चंडीगढ़, तमिलनाडु और लद्दाख में भी कई जगहों पर पेट्रोल एक सौ रुपए लीटर के पार निकल गया है। कई जगह डीजल के दाम भी सौ रुपए से ऊपर है।

इससे पहले मई के महीने में पेट्रोल और डीजल की कीमत में 16 बार इजाफा हुआ। इस दौरान पेट्रोल 4.11 और डीजल 4.69 रुपए महंगा हुआ है। इस साल की बात करें तो एक जनवरी को पेट्रोल 83.97 और डीजल 74.12 पर था, जो अब 96.12 और 86.98 रुपए प्रति लीटर पर है। यानी पांच महीने से भी कम में पेट्रोल 12.15 और डीजल 12.86 रुपए महंगा हुआ है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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