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अस्पताल मानों खत्म या बंद तो..

हमेशा देखा हैं कि कोई जब बीमार होता है तो लोग उसे लेकर अस्पताल भागते हैं। मगर इन दिनों आप कहां भगेंगे? प्राइवेट अस्पतालों के एक्जीक्यूटिव बाहर ही खड़े हैं और वहीं से लोगों को लौटा रहे हैं। अगर वे साठ-सत्तर लाख की या करोड़ से ऊपर की गाड़ियों में लाए गए मरीजों को बाहर से ही लौटा रहे हैं तो दूसरी गाड़ियों की क्या बिसात? मतलब यह कि केवल पैसे से सब कुछ मिलना इन दिनों थोड़ा मुश्किल हो गया है। पैसे के अलावा आजकल आपको आज भारी पहुंच की भी जरूरत पड़ेगी। और अस्पताल में आपका प्रवेश किसी भी तरीके से हुआ हो, इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आपके साथ फीस का न्याय भी होगा।

दूसरी तरफ, सरकारी अस्पताल आपको आने से नहीं रोक रहे, लेकिन वहां लंबी कतार है। पता नहीं कितने घंटे या कितने दिनों में आपका नंबर आएगा? वहां के डॉक्टर, नर्स या दूसरे कर्मचारी आपसे बस इतना कहेंगे कि जगह नहीं है, हम क्या करें? बस आप स्ट्रेचर पर लेटे लाइन में लगे रहिए और इंतजार कीजिए। मगर इससे क्या होगा, आप इमरजेंसी वार्ड तक में नहीं पहुंच पाएंगे। पहुंच भी गए तो बेड के अकाल के कारण भर्ती नहीं किए जा सकते। और अगर किसी तरह आपको प्राइवेट या किसी सरकारी अस्पताल में बेड मिल भी गया तो आईसीयू बेड और वेंटीलेटर बेड नहीं मिल पाने का खतरा सिर पर मंडराता रहेगा। और वहां ऑक्सीजन कब खत्म हो जाए, यह भी किसी को नहीं पता।

तो यह जो अस्पताल नाम की चीज का ख्याल हमेशा से आपके मन में रहा है, उसे निकाल दीजिए। समझिये कि अस्पताल हैं ही नहीं। या सारे अस्पताल खत्म हो गए हैं या बंद हो गए हैं। अब सोचिए। अब आप अपना या अपने किसी करीबी का इलाज कैसे करवाएंगे? वास्तव में आज यही स्थिति है। उन बहसों में मत उलझिए जो इन दिनों सुप्रीम कोर्ट या कई हाईकोर्टों में चल रही हैं। पता नहीं उनका निपटारा कब होगा। और अदालतों में सरकारों ने अपनी गलती मान कर कुछ करने का भरोसा दे भी दिया तो वह काम पता नहीं कब तक होगा। क्या आप तब तक इंतजार करने की हालत में हैं? नहीं। आपको तो अभी इलाज चाहिए। अभी बेड चाहिए। अभी ऑक्सीजन चाहिए। अभी रेमडेसिविर और कोरोना की दूसरी दवाएं चाहिए। उनके बारे में सोचिए जिनकी सांसें उखड़ने लगी हैं। उन्हें अदालतों में पेश किए जा रहे आंकड़ों और दलीलों का भरोसा नहीं दिया जा सकता।

साफ बात यह है कि जो अभी होना चाहिए था, वह नहीं है। डब्लूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन तीन दशक पहले से दुनिया भर की सरकारों से कहता आ रहा है कि जन स्वास्थ्य पर अपने जीडीपी का कम से कम पांच प्रतिशत खर्च करो। पर भारत का यह खर्च जो पहले एक प्रतिशत से भी कम हुआ करता था, किसी तरह बढ़ कर 1.20 प्रतिशत तक पहुंचा है। इन तीन दशकों में देश में जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में जितना भी निवेश हुआ है उसका 85 प्रतिशत से ज्यादा निजी क्षेत्र से आया है। यानी चमक-दमक वाले प्राइवेट अस्पताल बने और उनकी चेन की चेन खड़ी हो गई। सरकारी अस्पताल बहुत कम बने। हमारी सरकारों ने जैसे देश की 138 करोड़ की पूरी आबादी के स्वास्थ्य की चिंता निजी क्षेत्र पर छोड़ दी जबकि इनमें मुश्किल से बीस करोड़ लोग होंगे जो इन प्राइवेट अस्पतालों का रुख करने की स्थिति में हैं। नतीजा यह हुआ है कि आज न प्राइवेट अस्पताल पूरे पड़ रहे हैं और न सरकारी।

हाल में इरडा ने स्वास्थ्य बीमा करने वाली सभी बीमा कंपनियों से कहा है कि कोरोना का भी कैशलेस इलाज होना चाहिए और कोरोना मरीजों के दावों को तत्काल निपटाया जाए। जब 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार आई थी तब तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सभी स्वास्थ्य बीमा वाली कंपनियों से कहा था कि वे कुछ ज्यादा संख्या में लोगों के दावों का भुगतान करें। मगर इन कंपनियों का जवाब था कि अभी जितना प्रीमियम है उसमें हम दस प्रतिशत से ज्यादा ग्राहकों के दावे पूरे नहीं कर सकते। अगर प्रीमियम बढ़ाया जाए तो हम यह प्रतिशत कुछ बढ़ा सकते हैं। कहा नहीं जा सकता कि आज इस प्रतिशत की क्या दशा है। याद कीजिये, आयुष्मान भारत योजना को लेकर कई राज्यों से केंद्र की कितनी झिकझिक हुई थी। आज जैसे हालात हैं उनमें कितने लोगों को उस योजना का लाभ मिल रहा होगा? क्या कहीं इसकी गिनती की जा रही है? अगर कोई कर पाए तो यह भी एक महत्वपूर्ण गणना होगी कि कोरोना के जिन संक्रमितों की समय पर उचित इलाज नहीं मिल पाने से मौत हो गई उनमें से कितने लोगों ने आयुष्मान या किसी राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजना या किसी निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनी की पॉलिसी ले रखी थी।

हालात का अंदाजा इससे लगाइए कि एंबुलेंस वाला दस-पंद्रह हजार से कम पर बात ही नहीं करता। ऑक्सीजन कंसंट्रेटरों की कीमत साठ-सत्तर हजार से लेकर एक लाख के ऊपर तक पहुंच गई है। ऑक्सीजन के छोटे सिलेंडर तक बीस हजार में बिके। रेमडेसिविर के बाइस सौ रुपए के इंजेक्शन की जो कालाबाज़ारी चल रही है वह तो अदालतों तक को पता है। अस्पतालों में जगह नहीं मिल पाने से जो लोग घर पर ही इलाज कराने को मजबूर हैं उन्हें यह सब झेलना पड़ रहा है। ऐसा नहीं है के ये चीजें बिलकुल गायब हो गई हैं। वे बाकायदा उपलब्ध हैं। आपको बताया जाएगा कि इतने पैसे लेकर जाइए और वहां से ले लीजिए। यानी अस्पताल में बेड नहीं मिल पाया तो निजी स्तर पर इलाज करवाने में भी आपके साथ लूटपाट हो रही है।

वैसे भी, कोरोना की दूसरी लहर आने पर कई दवाओं बल्कि सैनेटाइजरों तक की कीमतें बढ़ गईं। किसी कैमिस्ट से पूछिए कि अचानक ऐसा क्यों, तो सब्जी वालों या किराना वालों की तरह वह कहेगा कि ‘क्या करें साब, पीछे से ही महंगा हो गया है।‘ मगर यह पीछे का क्या मतलब है? कौन है पीछे? वह क्यों किसी चीज को महंगा कर रहा है, वह भी इन भयावह परिस्थितियों में? क्या हम खुले बाज़ार की प्रताड़ना झेल रहे हैं जिसे हमने कभी बड़े चाव से अपनाया था? नहीं, शायद हमने खुले बाज़ार को नहीं बल्कि उसके विद्रूप को अपनाया है और अब हम उसी के नतीजे भोग रहे हैं। इन दुकानदारों का पीछे’ से तात्पर्य शायद नेपथ्य से है। और सब जानते हैं कि नेपथ्य में रिहर्सल के अलावा भी बहुत कुछ होता है और वे सब गतिविधियां कभी भी मंच पर नहीं आतीं। मंच पर तो सोचा-समझा रिहर्सल ही आता है। इसलिए जैसा कि नॉम चोम्स्की ने कहा कि वास्तव में यह मुक्त बाज़ार नहीं है, इसे भी कहीं कोई नियंत्रित कर रहा है। 

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के डिप्टी गवर्नर माइकल देबब्रत पात्रा उस टीम का नेतृत्व कर रहे थे जिसने केंद्रीय बैंक के अप्रैल के बुलेटिन में एक चेतावनी नुमा लेख लिखा है। इसमें कहा गया है कि देश में कोरोना की दूसरी लहर पर यदि जल्दी काबू नहीं पाया जा सका तो आवाजाही पर लंबे समय तक प्रतिबंध रह सकते हैं। इससे सप्लाई चेन फिर प्रभावित होगी और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। बुलेटिन में यह भी कहा गया है कि ये रिजर्व बैंक के नहीं बल्कि लेखकों के अपने विचार हैं। मगर एक अरब से ज्यादा गरीब लोगों के देश में इस चेतावनी का मतलब समझिए। गजानन माधव मुक्तिबोध ने कभी ये पंक्तियां लिखी थीं जो आज, कई दशक बाद, भी उतनी ही प्रभावी हैं–

आज के अभाव के व कल के उपवास के

व परसों की मृत्यु के

दैन्य के, महा अपमान के, व क्षोभपूर्ण

भयंकर चिंता के उस पागल यथार्थ का

दीखता पहाड़ स्याह! (जारी)

लेखक: सुशील कुमार सिंह

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