कोरोना रिटर्न्स, सरकार और कांग्रेस बैकफुट पर

अप्राकृतिक संकट कोरोना के कारण जहां एक ओर मध्यप्रदेश की जनता गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी और जीवन यापन की जद्दोजहद से जूझ रही है तो वहीं सियासतदार इनकी इस बेबसी,लाचारी पर अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं।

प्रदेश में ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि जनता कोरोना और लॉकडाउन से आहत है तो सरकार अपने को स्थापित करने परेशान दिख रही है,विपक्ष सत्ता वापसी की उम्मीदें पालकर अपने घर को महफूज़ रखने जुगत लगा रहा है तो आम जनता परेशान सरकार से कुछ बेहतरी की उम्मीद लगाए बैठी है.मध्यप्रदेश के हाल को यदि एक लाइन में कहा जाए तो ‘जिम्मेदार लाचार हैं,

प्रशासन लचर और विपक्ष असहाय ही कहना उचित होगा.सियासतदार पहले तो अपने मतलब की बात करते हैं और जब कुछ जवाब नहीं होते तो कोरोना का रोना रोने लगते हैं.इन हालातों में जब भीषण संकट काल है,बीमारी धीरे धीरे अपने पैर पसार रही है,जनता वास्तव में बेहाल है और कई घरों को दो जून की रोटी के लाले पड़े हैं तब राजनेता जनता की सुध भूलकर उपचुनाव की उठापटक में उलझे नज़र आ रहे हैं।

बिगड़ते हालात से उलझते कामकाज
हाल ही में विधानसभा सत्र है और भविष्य में 25 सीटों पर उपचुनाव पर प्रदेश में कोरोना का कहर दिनों दिन बढ़ता जा रहा है इससे सत्तासीन भाजपा और विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती जा रहीं हैं.प्रदेश में संक्रमितों की संख्या 19 हज़ार के पार हो गई है.भोपाल इंदौर के हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं,ग्वालियर में कर्फ्यू लगाकर सात दिन का लॉकडाउन लगा दिया गया है.जबलपुर के हाल भी बेहाल हैं.जिन जिलों में उपचुनाव होना है वहां रोजाना संक्रमित मरीजों की संख्या में इज़ाफ़ा हो रहा है.सबसे ज्यादा बढ़ोतरी इंदौर,भोपाल,ग्वालियर और मुरैना में हुई है।

मंगलवार को ही करीब 800 केस एक दिन में सामने आए थे.भिंड में भी हाल में 90 से ज्यादा केस एक्टिव हैं.छतरपुर में कोरोना से गुरुवार को पहली मौत होने का मामला सामने आया है.उज्जैन,शिवपुरी, रायसेन, अशोकनगर, आगरमालवा, धार, नीमच, सागर और मंदसौर में कोरोना का प्रभाव अब ज्यादा दिखाई देने लगा है.हालांकि कुछ मरीज ठीक भी हो रहे हैं.पर इस तरह दिनों दिन बिगड़ते हालातों पर प्रशासनिक स्तर पर जल्दी काबू पाया जाना संभव नहीं नज़र आ रहा है क्योंकि इस महामारी की चपेट में जमीनी स्तर पर काम करने वाला मेडिकल स्टाफ और पुलिस महकमा भी आ रहा है।

विधानसभा सत्र और उपचुनाव पर भी संशय
जुलाई 20 से होने वाले विस सत्र को लेकर सरकार भी धर्मसंकट की स्तिथि में है.करीब आधा दर्जन विधायकों के पॉजिटिव होने से सत्र विधिवत चलने के आसार कम ही नज़र आ रहे हैं.सत्र के दौरान करीब 500 से 700 लोग विधानसभा परिसर में मौजूद रहने को लेकर भी प्रशासन को गाइडलाइन तय करने में पसीने छूट रहे हैं.हालांकि इस मामले में संसदीय कार्य मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा बोल ही चुके हैं कि जो समयानुकुल उचित निर्णय होगा वो लिया जाएगा।

इधर एक और प्रशासन जहां कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए जनता से सब नियमों का पालन करने की अपील कर डंडा का भय दिखा रहा है तो वहीं राजनेता कोरोना बचाव की सरकारी गाइडलाइन का खुलेआम मखौल उड़ाते टीवी और कैमरा पर भाषण देते नजर आ रहे हैं.ये सब देख तो यही माना जायेगा कि सारे नियम कानून जनता के लिए ही बनाए जा रहे हैं.उपचुनाव 25 विधानसभा सीटों पर होना तय है और जिन जिलों में चुनाव होना है वहां भी संक्रमण अपने पांव पसार रहा है पर इसको लेकर नेताओं को कोई चिंता नहीं,क्योंकि उनका सैकड़ों समर्थकों के साथ जनता से मेलजोल,जनसंपर्क बदस्तूर जारी है.इस मेलजोल और संपर्क के दौरान ज्यादातर नेता और कार्यकर्ता बिना मास्क लगाए बेख़ौफ़ घूमकर संक्रमण को आमंत्रण दे रहे हैं.इन हालातों में चुनाव संक्रमण से बचाव कर,सुरक्षित तरीके से करा पाना फिलहाल संभावनाओं से परे है।

उपचुनाव को लेकर निर्वाचन आयोग जितना सक्रिय नज़र आ रहा था अब कोरोना के कारण बैकफुट पर है.मतदाता सूचियों के संसोधन का जो कार्य अप्रैल माह में हो जाना चाहिए था वो फिलहाल पेंडिंग हो गया है.जिन विस सीटों पर उपचुनाव होना हैं उनमें मतदाताओं की संख्या करीब 55 से 60 लाख तक है.इन विस क्षेत्रों में कोरोना की क्या स्थिति है सभी संबंधित कलेक्टर से इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है ताकि वहां हालात देखकर वोटिंग की व्यवस्था कराई जा सके.कोरोनाकाल में संक्रमित मरीजों को ध्यान में रखकर किस प्रकार चुनाव और वोटिंग कराने की व्यवस्था हो इस पर प्रशासनिक स्तर पर चिंतन-मंथन जारी है.यदि समय के साथ हालात अनुकूल हुए तो ठीक नहीं तो चुनाव टाले भी जा सकते हैं।

कांग्रेस को उपचुनाव और अपनों की चिंता
कोरोना को लेकर जहां सरकार की माथापच्ची जारी है और उसे भी उपचुनाव कराने की जल्दबाजी है तो सत्ता से विपक्ष में पहुंची कांग्रेस सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करने लगी है.कांग्रेस नेताओं ने जहां गुना में गरीब परिवार पर हुए पुलिस के अत्यचार,छतरपुर के चंद्रपुरा में प्राइवेट कंपनी और प्रशासन द्वारा बिना मुआवजा दिए किसान की जमीन खाली कराने सहित मंडला जिले के जघन्य हत्याकांड और भोपाल में नाबालिक युवतियों के यौन शोषण के मामले को लेकर सरकार की घेराबंदी शुरू कर दी तो सरकार भी विपक्ष को इसका जबाव उसके विधायकों को अपने पाले में लेकर दे रही है।

कांग्रेस का आरोप ये भी है कि भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण की बात हो या पांच मंत्रियों का मंत्रिमंडल बनाने का तरीका या फिर बाद में 28 मंत्रियों के विस्तार वाला कुनबा बढ़ाने का आयोजन ये सब जब हुए तब सरकारी आंकड़ों में कोरोना की स्थिति बेहतर बताई जाती रही पर जैसे ही उपचुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई और जनता का विरोध भाजपा को दिखाई देने लगा अचानक कोरोना के मामले बढ़ने लगे.कांग्रेस ने परोक्ष तौर पर ये आरोप लगाया है कि भाजपा अपने हार के डर से उपचुनाव टालने का प्रयास कर रही है जो लोकतंत्र के साथ छल है.हालांकि उपचुनाव के लिए उत्सुक विपक्ष यानी कांग्रेस के एक एक करके विधायक टूटकर कमलदल में जा रहे हैं इससे कमलनाथ की मुश्किलें भी बढ़ रहीं हैं।

अब यहां पॉलिटिकल लाभ और हानि की बात करें तो कोरोना का बढ़ता संक्रमण भाजपा सरकार के लिए फायदेमंद साबित हो रहा तो वहीं कांग्रेस के लिए टेंशन वाला.दरअसल उपचुनाव जितने लेट होंगे कमलनाथ कांग्रेस को अपने खेमे के विधायकों को उतने दिन कॉन्फिडेंस में रखना होगा वो भी तब जबकि भाजपा का पूरा कुनबा कांग्रेस के बहुत सारे विधायकों से संपर्क में है और भाजपा नेताओं के ऐसे बयान भी सामने आ रहे कि अभी कई प्रदुम्न हैं जो कमलदल का हिस्सा बनेंगे.कोरोना की भयावहता बढ़ने के साथ राजनीतिक सरगर्मियां भी बढ़ती जा रहीं हैं.जनता बेहाल है,सरकार कोरोना के लिए कितनी भी मुस्तैद रहने का दावा करे पर सिस्टम लचर ही साबित हो रहा है.विपक्ष अपने मारा फिर रहा है.इन हालातों में भविष्य में क्या स्थाई समाधान होंगे फिलहाल ये एक प्रश्न ही बना है।

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