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Wednesday, May 12, 2021
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ये हम हैं और ये हमारी बरबादी है

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आप पाएंगे कि हर कोई अपने काम में देर कर रहा है। मसलन, मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहने में कितनी देर कर दी कि चुनाव आयोग ही कोरोना की दूसरी लहर का जिम्मेदार है और अगर चुनाव आयोग पर हत्या का मुकदमा दायर किया जाए तो भी गलत नहीं होगा। यह तल्ख टिप्पणी तब आई है जब पश्चिम बंगाल का चुनाव अंतिम चरण में पहुंच गया है। जब चुनाव की घोषणा हुई थी, उस समय भी कोरोना जारी था और सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क के नियम लागू थे। तो जब आठ चरणों में चुनाव कराने का ऐलान हुआ तभी क्यों नहीं हमारे किसी हाईकोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लिया? उसके बाद भी, सारे नियम-कायदे त्याग कर, पूरी नंगई से, रैलियां व रोड-शो चलते रहे, तब भी किसी अदालत को ख्याल नहीं आया कि यह गलत हो रहा है। और अगर सचमुच देश में चल रहे मौजूदा कोहराम के लिए चुनाव आयोग ही दोषी है तो अदालत केवल कह कर क्यों रुक गई, उसने सचमुच उस पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने का आदेश क्यों नहीं दे दिया? ऐसा करने के लिए उसे और क्या चाहिए? क्या उसके लिए इससे भी ज्यादा तबाही की दरकार है?

कुछ दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कहा था कि ऑक्सीजन का टैंकर रोकने वाले अधिकारी का नाम बताइए, हम उसे लटका देंगे। मगर अभी तक न तो किसी ने उसे किसी अधिकारी का नाम बताया है और न कोई लटकाया गया है, जबकि दिल्ली में ऑक्सीजन का हाहाकार अभी भी अपने चरम पर है। पिछली 21 अप्रैल को दिल्ली का ऑक्सीजन का कोटा बढ़ा कर 480 टन किया गया था, लेकिन अभी तक शायद ही किसी रोज इतनी ऑक्सीजन दिल्ली पहुंची हो। अदालतों के कठोर वचन हम पहले भी अनेक मौकों पर सुन चुके हैं, पर वे केवल ऐसी टिप्पणियां करती हैं, वैसा ही कठोर आदेश नहीं देतीं। बल्कि टिप्पणी करने में भी देर कर देती हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अगर केंद्र से यह पूछा है कि कोई व्यक्ति रेमडेसिविर जैसी कोरोना की दवा सीधे फार्मा कंपनी से कैसे खरीद सकता है जबकि कंपनी को अपना पूरा उत्पादन केंद्र सरकार को देना है जो उसे आगे राज्यों में वितरित करेगी, तो उसने भी यह पूछने में देर कर दी है। असल में तो यह काम कई राज्यों में कई स्तरों पर कई हफ्तों से चल रहा है। किसी ने पूछा ही नहीं, तो लोग मनमानी करते रहे। उत्तर प्रदेश की स्थितियों पर नाराजगी जताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी कई शहरों में न्यायिक अधिकारियों को नोडल अफसर बनाने के निर्देश दिए। साथ ही उसने राज्य चुनाव आयोग से कोरोना नियमों के उन उल्लंघनों पर जवाब मांगा है जिनके चलते चुनाव ड्यूटी में लगे 135 लोगों की मौत की खबर है। मगर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तरह उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में भी मतदान 29 अप्रैल को खत्म हो गया। मतलब यहां भी देर हो गई। अब आप किसी को सजा भी सुना देंगे, तब भी जो नुक्सान होना था वह तो हो चुका।

कोई पूछ सकता है कि दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने ऑक्सीजन के मिनी प्लांट और टैंकर आयात करने का फैसला इतनी देरी से क्यों लिया? वैसे अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि दिल्ली में अस्पतालों तक ऑक्सीजन पहुंचाने की अब तक क्या व्यवस्था थी। क्या केंद्र सरकार या ऑक्सीजन बनाने वाली या सप्लाई करने वाली कंपनियां दिल्ली की सीमा पर ऑक्सीजन दिल्ली सरकार के हवाले कर देती थीं और फिर दिल्ली सरकार के टैंकर उसे अस्पतालों तक ले जाते थे, जिनकी अब कमी पड़ गई है? या फिर निर्माता कंपनियों या सप्लायर के टैंकर ही सीधे यहां के अस्पतालों को ऑक्सीजन पहुंचाते थे और मौजूदा संकट में क्योंकि उनकी निरंतरता गड़बड़ा गई, इसलिए दिल्ली सरकार को टैंकरों की व्यवस्था करने की जरूरत आ पड़ी? वास्तविकता कुछ भी हो, दिल्ली सरकार को संकट शुरू होते ही टैंकर और प्लांट मंगाने की पहल करनी चाहिए थी। क्या अरविंद केजरीवाल इसके लिए हाईकोर्ट की फटकार का इंतजार कर रहे थे?

अब आएं केंद्र सरकार पर। ऑक्सीजन की मारामारी तो बाद में शुरू हुई, मगर कोरोना की वैक्सीन की कमी का शोर तो पहले से चल रहा है। कितने ही अस्पताल तीन हफ्ते पहले ही वैक्सीन लगवाने के लिए आए लोगों को लौटाने लगे थे। इस कमी के चक्कर में कई राज्यों ने पहली मई से अठारह साल तक के लोगों को वैक्सीन लगाने के कथित अभियान को टाल दिया है। इस अभियान का क्या होगा, क्योंकि वैक्सीन की कमी की समस्या और उसकी कीमत के विवाद का निपटारा अभी तक नहीं हुआ है? इसमें कौन देर कर रहा है? इसी तरह ‘ऑक्सीजन एक्सप्रेस’ ट्रेनों को चलाने का फैसला ऑक्सीजन का इतना हंगामा खड़ा होने से पहले भी लिया जा सकता था। दिल्ली में हम जो चीख-पुकार देख रहे हैं उसके बावजूद दिल्ली के लिए कोई ‘ऑक्सीजन एक्सप्रेस’ नहीं चलाई गई थी। वह तो प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की बैठक को अरविंद केजरीवाल ने अवसर बनाया, उसके बाद चलाई गई। हमारा मीडिया इस कदर महान है कि सदैव उपलब्ध केजरीवाल से यह भी नहीं पूछ पाया कि उपरोक्त बैठक में उन्होंने जो कलात्मकता दिखाई उसके बाद भी क्या उन्हें प्रधानमंत्री ने यह बताया कि किसी संकट के समय वे किसे फोन करें? मतलब, हर तरफ देरी और हर किसी की तरफ से देरी।

पाकिस्तान के एक शायर हुए हैं, मुनीर नियाज़ी। उनकी एक नज़्म ‘हमेशा देर कर देता हूं मैं’ भारत में भी खासी मशहूर है। इस नज़्म में जो कहा गया है वह हर किसी पर सही बैठता है। लगता है कि हम हर सही काम में देर कर देने वाले समाज का हिस्सा हैं। सरकारें, अदालतें, मीडिया, हमारी तमाम संस्थाएं, सब उसमें शामिल हैं। पानी गले तक न आ पहुंचे तब तक कोई रिएक्ट ही नहीं करता। आम लोग भी समय पर कहां रिएक्ट करते हैं। उनके बर्दाश्त की तो जैसे कोई सीमा ही नहीं, हालांकि आज उन्हें जिस मुसीबत से जूझना पड़ रहा है, उसके सामने राज्यों और केंद्र के तमाम प्रचारित इंतजाम भयानक रूप से नाकाफी हैं।

आम लोगों को इतने बड़े पैमाने पर अपने किसी परिजन के इलाज के लिए, दवाओं के लिए, ऑक्सीजन के लिए, एंबुलेंस के लिए, अस्पताल में बेड के लिए और फिर उसके मर जाने पर उसका अंतिम संस्कार करवाने के लिए इस तरह गिड़गिड़ाते कभी नहीं देखा गया। कम से कम हमारे जीवन में तो नहीं। डॉक्टर भी इतने असहाय कभी नहीं पाए गए कि क्षोभ और निराशा में वे अस्पताल के गेट पर आकर खड़े हो जाएं और रोने लगें। याद कीजिये, पिछली बार आपने डॉक्टरों को इन वजहों से रोते हुए कब देखा था। जैसा यह दृश्य है उसमें कोई गिनती तो संभव नहीं, फिर भी, केवल दिल्ली में कई हजार लोग ऐसे निकलेंगे जो अपने किसी कोरोना संक्रमित परिजन या रिश्तेदार के लिए अस्पताल में बेड या ऑक्सीजन के सिलेंडर या किसी दवा के लिए इस दरवाजे से उस दरवाजे दूर-दूर तक भटक रहे हैं। जिसको जहां भी थोड़ी सी भी उम्मीद दिखती है वह वहां भाग रहा है। जितना पैसा मांगा जा रहा है उतना दे रहा है। और उसकी इस भागमभाग में कोई मुख्यमंत्री, कोई उपराज्यपाल, कोई स्वास्थ्य मंत्री, कोई गृहमंत्री या प्रधानमंत्री, कोई हिस्सेदार नहीं है। कोई उसका साथ नहीं दे रहा।

यह केवल दिल्ली का हाल है। पूरे देश का हिसाब लगाएं तो ऐसे लाखों लोग होंगे जो इस समय भी किसी अपने को बचाने की अंधी दौड़ में लगे होंगे। जिनके परिजन अस्पतालों में भरती हैं, उनमें भी ज्यादातर लोग आशंकाओं से घिरे हुए हैं। पता नहीं ऑक्सीजन कब तक चले, पता नहीं आईसीयू में बेड खाली है कि नहीं, पता नहीं वेंटीलेटर बेड मिल पाएगा कि नहीं। लोग इतनी तेजी से और इतनी बड़ी संख्या में बीमार हो रहे हैं कि ज्यादातर अस्पतालों में तमाम सुविधाओं की किल्लत हो गई है। और उन लोगों को तो आप भूल ही जाइए जिनके पास पैसा नहीं है या जिन्हें यह पता तक नहीं कि वे कोरोना वायरस से संक्रमित हैं। न तो सरकारें उनका टेस्ट कराने के लिए उन तक पहुंच रही है और न वे टेस्ट करने वाले किसी सेंटर तक पहुंच पा रहे हैं। इन परिस्थियों में किसी एक सोनू सूद, एक बीवी श्रीनिवास या एक दिलीप पांडे से काम कतई नहीं चलने वाला। सब जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाने के लिए जिस बड़े स्तर पर कार्रवाई होनी चाहिए, उसमें पहले ही बहुत देर हो चुकी है, आगे भी हो रही है।
लेखक: सुशील कुमार सिंह

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