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2024 की उल्टी गिनती शुरू, पर कांग्रेस नींद में!

कांग्रेस में एक विचार मंच भी है। मगर वह क्या करता है किसी को नहीं मालूम। आज जब लड़ाई ही सारी विचार की है तो कांग्रेस का यह विभाग सोया पड़ा है या कहें विलुप्त ही है। किसी को नहीं मालूम की वह है और कौन उसका अध्यक्ष है?  nहोने को कांग्रेस में कभी एक लायब्रेरी भी हुआ करती थी। मगर आज गांधी, नेहरू की किताबें कांग्रेस का इतिहास देखना हो तो आप को कहीं और जाना होगा। कांग्रेस दफ्तर में अब कुछ नहीं है।

इस समय जब हर घर तिरंगा के जरिए भाजपा पहली बार तिरंगे को सम्मान और स्वीकृति दे रही है तब उसका मुकाबला करने के लिए कांग्रेस कहीं नहीं है।  15 अगस्त तक भाजपा और केन्द्र सरकार ऐसा माहौल बना देगी कि देश भर में लोगों को यकीन हो जाएगा कि आजादी में कांग्रेस की भूमिका कहीं नहीं थी। या कम थी। गैर कांग्रेसियों की जिसमें भाजपा के लोग भी शामिल थे बड़ी भूमिका थी।

प्रचार में कितना दम होता है यह अभी सबने देखा कि किसी अनजान ने नहीं पब्लिक फिगर कंगना रनौत ने कहा कि हमें आजादी 2014 में मिली है। इसका खंडन करना तो दूर की बात उन्हें पद्मश्री दॆकर उनकी बात को अथेंटिक बनाया गया। आपको वह भी याद होगा कि एक बीजेपी की प्रवक्ता ने कहा था कि आजादी हमें 99 साल के पट्टे पर मिली है। यह अफवाह लंबे समय से चलाई जा रही थी। अब सार्वजनिक रूप से भी कही जाने लगी। ऐसे ही नेहरू को शक के दायरे में लाने के लिए कहा जाता है कि नेहरू ने जानबूझकर लोगों को नौकरियां देकर राजनीति में नहीं आने देने की साजिश की थी।

और यह बाते करने वाले कौन हैं? सामन्य भक्त नहीं। पुराने लोग। जिन्हें यह बातें सिखाई गईं थीं। ऐसे ही बहुत सारी अफवाहें हैं। जिनका उद्देश्य भरत से सुत पर भी संदेह की तरह नेहरू से, कांग्रेस से जुड़ी हर चीज पर संदेह पैदा करना है।

यह तो एक पत्रकार जो बाद में  भाजपा की तरफ राज्यसभा सांसद भी बने लिख चुके हैं कि हमारी कार्य पद्धति है उपहास, तिरस्कार फिर बहिष्कार। बहिष्कार के बाद वाला शब्द उन्होंने नहीं लिखा था। मगर अब पिछले 8 साल में लिंचिंग का दौर देखकर याद आता है कि वह शब्द कितना खतरनाक होगा।

पत्रकार वह पुराने थे। इसलिए संवाद खूब होता था। राज्यसभा मिलने से पहले तक वे छुपाते भी थे कि उनकी राजनीतिक विचारधारा क्या है। मगर सबको मालूम था। और उन्हें खूब बातें करने और महफिलें जोड़ने का शौक था तो उनसे हर विषय पर बहुत बातें होती थीं। जब उन्होंने लिखा और छप गया तो उन्हें मालूम पड़ा कि कुछ ज्यादा लिख गए हैं। मगर फिर इस बारे में उन्होंने बात नहीं की। मगर ऐसी कई सच्चाइयां हैं जो सबकों मालूम है। जैसे उमा भारती अपने जीवन के प्रमुख निशाने बता चुकी हैं। जिनमें पहला नेहरू गांधी परिवार है।

उसी को अब प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस मुक्त भारत कहते हैं। जो दरअसल में नेहरु गांधी परिवार मुक्त कांग्रेस है। इसलिए वह हर जगह वंशवाद का जिक्र ऐसे करते हैं जैसे इस परिवार ने देश का कितना नुकसान किया हो।

आज 15 अगस्त के बहाने हर घर तिरंगा अभियान के नाम पर भाजपा सबसे ज्यादा नेहरू पर ही हमले कर रही है। जब भाजपा ने सोशल मीडिया की डीपी बदलने की मांग की। और वहां तिरंगा लगाया तो कांग्रेस ने तिरंगा हाथ में लिए नेहरू का फोटो लगा दिया। यह एक स्मार्ट मूव था जो बहुत समय बाद कांग्रेस में देखा गया। नेहरू के आते ही प्रतिक्रियाएं बहुत तेज हो गईं। मीडिया के जरिए कहा जाने लगा कि कांग्रेस तिरंगे के ऊपर नेहरू को रख रही है।

ऐसी बाते जनता में बहुत तेजी से फैलती हैं। मगर कांग्रेस को इनका काउंटर करना नहीं आता है। टीवी उसे दिखाता नहीं है। अख़बार छापता नहीं है। मगर एक सोशल मीडिया और दूसरा छोटी छोटी बुकलेटें झूठ और अफवाहों का खंडन करने और सत्य को सामने लाने में सबसे बेहतर भूमिका निभाते हैं।

कांग्रेस के मीडिया डिपार्टमेंट की नई टीम आने के बाद सोशल मीडिया मजबूत तो हुआ है मगर भाजपा के आईटी सेल के मुकाबले इसके साधन भी बहुत कम हैं और पिछले आठ साल में वह पिछड़ भी बहुत गया। सबसे ज्यादा वह उदाहरण दिया जाता है कि राहुल के बयान को तोड़ मरोड़कर उसमें आलू से सोना बनाने की बात डालकर राहुल की अपरिपक्व छवि बनाई गई। उनका उपहास उड़ाया गया। मगर मीडिया डिपार्टमेंट सही तस्वीर लोगों के सामने पेश नहीं कर पाया।

राहुल के बारे में, कांग्रेस के बारे में, नेहरू के बारे में चल रहे झूठे अभियान को  काउंटर करने का सोशल मीडिया एक मुख्य साधन तो है। मगर एक मात्र नहीं। यह काम मूलत: विचार विभाग का है। देश भर में सेमिनार करना, छोटी बड़ी गोष्ठियां करना और हर विषय पर छोटी छोटी बुकलेट छाप कर देश भर में लगातार बांटना। कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेताओं को भी कई सच्चाइयांमालूम नहीं हैं। अगर उनसे गांधी के बारे में, नेहरू के बारे में, आजादी के बारे में, उसमें कांग्रेस की नेतृत्वकारी भूमिका के बारे में  कुछ पूछा जाए तो उनका अज्ञान सामने आ जाएगा। और अक्सर आता ही रहता है।

इन नेताओं को, कार्यकर्ताओं को छोटे छोटे प्रशिक्षण शिविर में पार्टी और उसके नेताओं के गौरवशाली इतिहास के बारे में बताना कोई बड़ा काम नहीं है। संघ और लेफ्ट ऐसी क्लासें करते रहे हैं। अभी सुना था कि नया मीडिया डिपार्टमेंट अपने प्रवक्ताओं और पैनलिस्टों के लिए कुछ कोर्स शुरू करने जा रहा है। अगर ऐसा हुआ तो यह अच्छी बात होगी। प्रवक्ताओं को काफी कुछ नया जानने, सीखने को मिलेगा। कुछ बहुत ही प्रभावी प्रवक्ता हैं। उन्हें एडवांस ट्रेनिंग देने में कोई बुराई नहीं है।

2024 में कितना समय बचा है? उलटी गिनती शुरू हो गई है। मगर अभी तक कांग्रेस को यह नहीं मालूम कि चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ेगी। कुछ ही दिनों में पार्टी अध्यक्ष के चुनाव होने वाले हैं। मगर राहुल ने अपनी पोजिशन क्लीयर नहीं की है। यह रहस्य तो दो ढाई दशक पहले तक कि श्रीलंक की क्रिकेट टीम जैसा हो रहा है कि किस को ओपनिंग में भेजेंगे?

यह सीक्रेट राजनीति में नहीं चलता है। याद कीजिए 2014 से कितने पहले भाजपा ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। वह बहुत बड़ा रिस्क था। एक बड़े नेता ने आश्चर्य और व्यंग्य से पूछा था कि मोदी की जाति के देश में कितने लोग हैं? मतलब साफ था कि बिना ब्राह्मण या किसी डोमिनेट करने वाली जाति के अलावा भारत में कोई प्रधानमंत्री कैसे बन सकता है?

मगर अपने चुनावी कौशल, मैनेजमेंट और तकनीक से भाजपा ने यह मिथ तोड़ दिया था। हर चुनाव का अलग माहौल होता है। 2004 में सोनिया गांधी ने अपनी मेहनत और वाजपेयी सरकार के झूठे दावे इंडिया शाइनिंग पर हमला करके वह चुनाव जीता था। 1971 में इन्दिरा गांधी गरीबी हटाओ लाई थीं।

हर चुनाव अलग नोइय्यत का होता है। जनता को कौन सी बात क्लिक करेगी यह अनुभवी नेता पहले जान लेते थे। आज इसके लिए बड़ी महंगी टीमें हैं। और मजेदार बात यह कि इनमें से कांग्रेस सबसे खराब कंपनी चुनती है। कहा जाता है कि टीम खराब है तो क्या हुआ कमीशन भरपूर देती है।

चुनाव जिसमें जीत हार पार्टी के अस्तित्व का सवाल होता है उसमें भी कांग्रेसी कमीशन नहीं छोड़ते। प्रियंका गांधी को अभी अहसास हुआ कि उत्तरॉ प्रदेश जैसे बड़े राज्य का चुनाव उन्होंने जितने पैसे में लड़ लिया उससे कई गुना ज्यादा छोटे से राज्य पंजाब में खर्च हुए। इस समस्या को एक मिनट में कड़े फैसले के जरिए खत्म किया जा सकता है। सबको मालूम है कि गड़बड़ कहां से होती है। सख्त कारर्वाई करने से राहुल और प्रियंका को कौन रोक सकता है? समस्याएं बहुत हैं। मगर इलाज केवल एक ही है। पार्टी को यह बताना कि हू इज द बास? जैसे ही यह मैसेज चला जाएगा आधे से ज्यादा समस्याएं उसी क्षण दूर जाएंगी। इसमें देर करना कांग्रेस को बहुत महंगा पड़ेगा।

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