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Wednesday, May 12, 2021
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मोदी सरकार की आलोचना अब देशद्रोह का अपराध नहीं बनेगा!

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पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि की गिरफ्तारी और उसकी जमानत ने न्यायिक व्ययस्था को एक नयी संजीवनी दी है। 23 फरवरी के पहले पुलिस द्वारा अदालत के सामने देशद्रोह के आरोप के लिए सरकार के किसी फैसले की आलोचना अथवा सरकार विरोधी किसी राजनैतिक या सामाजिक मुहिम का समर्थन भी सरकार को हानि पहंुचाने वाला बताकर अंग्रेज़ों के समय के देशद्रोह की धारा को आरोपी पर लगा दिया जाता था। विदेशी सत्ता के समय सरकार -ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिनिधि थी।

उस समय प्रजा को संवैधानिक अधिकार उतने नहीं थे जितने आज भारतीय संविधान में नागरिकों को मिले हैं। इन अधिकारों में अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत सरकार का विरोध करने के लिए धरना – प्रदर्शन और हड़ताल जैसे अधिकार निहित हैं। परंतु अंग्रेज़ों के जमाने की तर्ज पर आज भी नागरिकों सरकार उम्मीद करती हैं कि वे आला हज़रत सरकार के फैसलों पर ना तो सवाल उठाए और ना ही उसके खिलाफ बयानबाजी करे।

दिल्ली मेट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट धर्मेंद्र राणा के एतिहासिक फैसले के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली दंगों को लेकर दिल्ली पुलिस को जो फटकार लगाई। फिर सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार की एजेंसियों जैसे सीबीआई, आईबी, ईडी या नरकोटिक्स अथवा एनएसए द्वारा नागरिकों से की जाने वाली पूछताछ के लिए सीसीटीवी कैमरों का होना जरूरी बताया। जस्टिस नरीमन की खंड पीठ इस बारे में सॉलिसीटर जनरल तुषारकान्त द्वरा निश्चित तिथि नहीं बताए जाने पर टिप्पणी की लगता हैं कि सरकार की नियत इस मामले में साफ नहीं हैं। इस सख्त टिप्पणी के बाद सरकार की ओर से उत्तर देने के लिए समय की मांग की गयी।

3 मार्च को ही जस्टिस किशन कौल की खंड पीठ ने फारुख अब्दुल्ला के विरुद्ध एक वकील द्वारा देशद्रोह की याचिका दायर की गयी थी। जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जम्मू और काश्मीर के राज्य के दर्जे को खत्म करना और इलाके को तीन हिस्सों में बाँट कर केंद्र शासित बना देने के मोदी सरकार के फैसले का विरोध करने का बयान दिया था। याचिका में यहां तक आरोप लगाया गया था कि अपने उद्देश्य के लिए उन्होने चीन सरकार से सहायता लेने की भी बात कही थी। सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ ने कहा की सरकार के मत या फैसले से अलग रॉय रखना कोई देशद्रोह नहीं हैं। बल्कि उन्होंने अति उत्साही याचिकाकर्ता पर 50 हज़ार का जुर्माना भी लगाया।

इन फैसलों ने चीफ मेट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट धर्मेन्द्र राणा द्वारा दिशा रवि के मामले में जमानत के समय कहा गया वाक्य अमिट बन गया कि सरकार के ज़ख्मी गुरूर पर मरहम लगाने के लिए देश द्रोह के केस नहीं थोपे जा सकते । वैसे दिल्ली विधान सभा चुनाव के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर द्वारा अलपसंख्यकों के विरुद्ध जहरीला और भड़काऊ भाषण देने के वीडियो सबूत होने पर पुलिस को उनके विरुद्ध कारवाई करने के निर्देश देने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के जज को सुबह होते ही हरियाणा उच्च न्यायालय को तबादला कर दिया गया !
अब उसी दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली के सांप्रदायिक दंगो में पुलिस की भूमिका को लेकर काफी खरी -खोटी सुनाई हैं। दंगों के एक मुस्लिम आरोपी का पुलिस के सामने दिया गया बयान या कबूलनामा मीडिया में लीक हो जाने पर अदालत ने दिल्ली के विशेष पुलिस आयुक्त को पेश होने का निर्देश दिया हैं।

पुलिस की एक खुफिया रिपोर्ट में यह लिखा हुआ पाने पर की अगर हिन्दू युवकों को गिरफ्तार करेंगे तब उनके समुदाय में अशांति फ़ैल सकती हैं। अदालत ने इस रिपोर्ट की बाबत पूछे जाने पर पुलिस ने कहा ऐसी रिपोर्ट आ जाती हैं। तब उच्च न्यायालय ने आदेश दिया की विशेष पुलिस आयुक्त पाँच ऐसी रिपोर्ट लाकर दिखाये। अब देखना हैं कि विगत एक साल में दिल्ली में पुलिस द्वारा जेएनयू, जामिया मिलिया के छात्रों के दमन पर क्या होगा। उनके संस्थान में और विरोध प्रदर्शन के दौरान की गयी सत्तारूढ़ संगठन के समर्थकों द्वारा मारपीट के मुकदमों का क्या होगा ? क्या अदालतें विगत वर्ष जनवरी में जेएनयू के कॅम्पस में बाहरी लोगों द्वारा मार पीट की घटना की जांच हो सकेगी ? एवं क्या उन्हंे न्याय मिल सकेगा ? इन सवालों के जवाब तो भविष्य ही बताएगा और वह भी पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों में !

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