सांप्रदायिक उन्माद फैलाना क्या है, दिल्ली-अधीश?

आज अखबार में पूरा पेज विज्ञापन देख कर साहिर लुधियानवी का “तुम को सब मुआफ, जुल्म हो कि लूट / तुम कहो तो सच, हम कहें तो झूठ …” याद आया। विज्ञापन दिल्ली विधान सभा की किसी कमेटी का है। इस में ‘साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने’ के विरुद्ध लोगों से शिकायत करने कहा गया है। उस से हुए एफ.आई.आर. पर शिकायती को दस हजार नकद ईनाम की भी घोषणा है। सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाले को 3 साल कैद की चेतावनी भी।

लेकिन उस में ‘सांप्रदायिक उन्माद फैलाना’ कहीं परिभाषित नहीं। तब उस की पहचान कैसे होगी? इस पर मनमानी चलती है। पंद्रह साल पहले सांप्रदायिक हिंसा निरोधी विधेयक में ऐसा ही एक कानून तक प्रस्तावित हुआ था! उस में किसी चीज को सांप्रदायिकता फैलाने का कारण हिंसा की संभावना को माना गया था। यानी, किसी उचित काम या सच्चे कथन से भी हिंसा सभांवित हो, तो वह अनुचित हुआ। तब तो खास चालाक लोग हिंसा की धमकी देकर किसी भी विषय पर विचार-विमर्श तक बंद करा सकते हैं। दरअसल अधिकांश यही होता रहा है।

वामपंथी प्रोफेसरों और सेक्यूलरवादी नेताओं ने भी सांप्रदायिकता पर वही एकतरफापन रखा है। किन्हीं कार्यों, विचारों की सूची दे कर वे घोषित नहीं करते कि यह ‘सांप्रदायिकता’ है, और जो भी वैसा करे या कहे उसे दंड मिलेगा। बल्कि उन का मापदंड हैः जिस पर हिंसा हो, वही सांप्रदायिकता है। अर्थात् जिस में हिंसा का अंदेशा न हो, वह कितनी भी झूठी, गंदी, घातक बात हो, पर चलने दी जाएगी। सो, ‘काफिर’ के खिलाफ हर तरह की घृणा सिखाना स्वीकृत है, क्योंकि वह हिंसा नहीं करता। उस के पूज्य ऋषियों, गुरुओं, अवतारों का मजाक उड़ाना भी चलेगा। जबकि किसी स्वघोषित देवदूत का रेखाचित्र बनाना भी नहीं चलेगा, क्योंकि हिंसा हो सकती है!

ऐसे दोहरेपन के असंख्य उदाहरण रोज मिलते हैं। किसी की आदतन हिंसा ठीक, लेकिन उस पर अपवाद प्रतिहिंसा भी गलत। बेस्ट-बेकरी-कांड का प्रचार मानवीय, पर राधाबाई-चाल-कांड का प्रचार अमानवीय। किसी मतवाद का दावा अच्छा, मगर उसी को उद्धृत कर उस का अर्थ दिखाना बुरा। अपने समुदाय के बाहर सब को नीच बताना, वही अपने बच्चों को सिखाना अच्छा। किन्तु उसे दूसरों द्वारा हानिकारक अंधविश्वास कहना बुरा।अपने मतवाद से बाहर बाकी सब को मार कर दुनिया से मिटा देने का दावा करना भी ‘भाईचारे का दर्शन’। पर उस मतवाद के पीड़ितों का पक्ष रखना असभ्यता। किसी का बात-बात पर दंगा भावना की अभिव्यक्ति, किन्तु उसी के आंकड़े, विवरण देकर पीड़ितों का दुःख बताना प्रतिबंधित। एक समुदाय को जगह-जगह से मार भगाना उपेक्षणीय। लेकिन मारने के लिए घोषित नारों, पोस्टरों, भाषणों, किताबों, आदि दिखा कर आगामी शिकारों को सावधान करना चिन्ताजनक।

भजन-कीर्तन के साथ देवी-देवताओं की प्रतिमा पूजने को घृणित कहना, देवी-देवताओं को ‘झूठा’ कहना तो ठीक। पर घोषित अत्याचार, अनेक नरसंहार, गुलामों का व्यापार करने, तथा बलात्कार के नियम तय करने, यातना देने की विधियाँ बताने वाले, अपने को मानवजाति के लिए एक मात्र, स्थाई अनुकरणीय त्रुटिहीन मॉडल बताने वाले किसी स्वघोषित देवदूत के अपने ही शब्दों में प्रमाणिक सच रखना गलत।उसी तरह, संविधान, संसद, कोर्ट, सब को चुनौती, जब-तब धमकाना मामूली बात। किन्तु ऐसे कामों का निर्देश देने वाले सिद्धांत की आलोचना बेबर्दाश्त। अपने मतवादियों के राज वाले दूसरे देशों के लिए यहाँ दंगा-फसाद करने पर चुप्पी, मगर वैसे मतवादियों को देश-घाती कहने पर शोर।

किसी समुदाय द्वारा विविध उपायों से आबादी प्रतिशत बढ़ाकर देश पर कब्जा करने की योजनाएं, उस के लिए आवाहन, बयानबाजी भी मंजूर। लेकिन ऐसे जनसांख्यिकी हमले से अपनी सभ्यता की रक्षा की चिंता करना नामंजूर। एक धर्म के लोगों से इकट्ठे किसी पार्टी के लिए वोट देने की अपील करना सेक्यूलर। मगर दूसरे धर्म के लोगों द्वारा वही करना गैर-सेक्यूलर। साहिर के गीत जैसाः ‘तुम करो तो पुण्य, हम करें तो पाप…’।मतांध सुलतानों, बादशाहों द्वारा सदियों भारत में विध्वंस, मंदिरों को तोड़कर अपने अड्डे बनाने, जबरन धर्मांतरण कराने, भेद-भावकारी टैक्स लगाने, लाखों ‘काफिरों’ को गुलाम और सेक्स-गुलाम बना कर विदेशी बाजारों में नियमित बेचने, आदि को छिपाकर उन शासनों को ‘गंगा-जमुनी सभ्यता’ कहना वैज्ञानिक शिक्षा देना हुआ। पर उन ऐतिहासिक तथ्यों के प्रमाणिक चित्र, विवरण, दस्तावेज, आँकड़े देकर पढाना या लेख लिखना भी सांप्रदायिकता।

एक साथ अनेक पत्नियाँ रखना, उन्हें मनमाने तलाक देकर जब चाहे नई-नई पत्नियाँ लाना, यह सब तो किसी समूह का सामान्य कायदा हुआ। मगर स्त्रियों के लिए अपमानजनक, एवं दूसरे समुदायों के लिए घातक व्यवस्था देने वाली, ‘निजी कानून’ कही जाने वाली ऐसी किताबों को हानिकर बताना अनुचित। अपने को देवदूत घोषित कर, यह न मानने वालों को जानवरों से भी नीच कहना, उन का संहार करना, गुलाम और सेक्स-गुलाम बना कर बेचना, आदि को आसमानी-हुक्म बताना तो सही। परंतु इसे  आसमानी-हुक्म के बजाए उदघोषक का अपना भ्रम, डिल्यूजन, बताना गलत।

बाहरी मतांध हमलावरों द्वारा महान भारतीय तीर्थों का विध्वंस, उन के मंदिरों में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियाँ पैरो-तले कुचल कर, वहीं पर अपने अड्डे खड़े करना तो भुलाने लायक पुरानी बातें रहीं। मगर हमलावरों का समय गुजरने पर, देवी-देवताओं के भक्तों द्वारा अपने श्रद्धा-स्थलों की पुनर्स्थापना की माँग, उस के लिए अभियान चलाना बड़ी गैर-जिम्मेदार बात!ठसक से अपने मतवाद का नाम ले-लेकर आतंकी हमले करने वालों को ‘भटके सिरफिरे’ बताना सही, मगर उन्हें उस मतवाद के प्रतिनिधि कहना गलत! किसी स्वघोषित देवदूत का नाम जोड़ कर बाकायदा हिंसक दस्ते, यहाँ तक कि राज्य-शासन बना कर, जहाँ-तहाँ छिपे हमले, सामूहिक हत्याएं, आलोचक लेखक-पत्रकारों को बंधक बनाकर उन के सिर काटना, उस के वीडियो प्रसारित करना, आदि भी सेक्यूलरिज्म के लिए विचारणीय नहीं। पर उन कामों का किसी विमर्श में उल्लेख करना विचारहीनता है।

अरब, ईरान, पाकिस्तान की संसदों द्वारा अपने-अपने देश में केवल एक खास धर्म की तानाशाही, तथा दूसरे धर्मावलंबियों को तीसरे दर्जे का नागरिक बनाकर जलील रखना तो सामान्य। लेकिन भारतीय संसद द्वारा बाहरी शरणार्थियों के लिए भी एक मामूली कानून बनाना बेबर्दाश्त! इस के खिलाफ सड़क पर दंगे करने के खुले आहवान भी सेक्यूलर बौद्धिकता। दूर देशों के मध्ययुगीन विचित्र, बर्बर रिवाजों, मूर्खताओं पर भी यहाँ कुछ लोगों का घमंड करना उन का सहज-विश्वास। मगर भारत की महान प्राचीन ज्ञान-परंपरा, ऋषि-मुनियों, वीरों, योग-वेदान्त-आयुर्वेद पर गौरव करना अंध-विश्वास।

किसी नेता का खास टोपी लगा, विशेष प्रार्थना-पोज देकर, अपनी फोटो से किसी समुदाय विशेष के पैरोकार होने का दावा करना सेक्यूलर है। किन्तु गंगा-स्नान कर, रोली-चंदन टीका लगाकर, सूर्य देवता की आरती करने वाला नेता गैर-सेक्यूलर हुआ। बात-बात पर इस का ‘सिर काटो’, उसे ‘फाँसी दो’, अलाँ की ‘आँखें निकाल लो’, फलाँ को ‘मार डालने पर दो करोड़ ईनाम’, जैसे बयान ऐसी कोई चिन्ता की बात नहीं। पर ऐसे आवाहन और काम को किसी मतवाद की स्थापित सीख बताना अनुचित है।क्या ऊपर कही गई बातें, और उन पर सब से ठंढे दिमाग एवं मानवीय विवेक से विचार करने की अपील करना गलत है? अगर दिल्ली के नेता को यही लगे, तो साहिर के शब्दों में कहना होगा कि, ‘मैं जलील हूँ, तुम को क्या कहूँ…’

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