Disadvantages of Bhakti Politics भक्ति राजनीति की हानियां!
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भक्ति राजनीति की हानियां!

भक्ति-राजनीति झूठा विराट् व्यक्तित्व बनाती है। फिर उस के बचाव में विविध प्रपंच रचती है। नियमित प्रोपेगंडा पर राजकीय/सार्वजनिक पैसा गंदे पानी सा बहाती है। जनता को झूठ और नाटक की खुराक देती है, ताकि उस की नजर पर नीतिगत गड़बड़ियाँ न चढ़ें। …. सिर पर कोई हिटलर, स्तालिन, या औरंजजेब सवार नहीं। फिर भी सभी दलों में समर्थ लोग भीगी बिल्ली बने रहते हैं। मानो अपने समाज से अलग उन का भवितव्य हो!  जैसा श्रीअरविन्द और कवि अज्ञेय जैसे मनीषियों ने 50 वर्ष के अंतराल पर कहा था – यह हिन्दुओं में चिंतन-फोबियाहै, तथा भारत के मध्यवर्ग की प्रतिभा मर गई है

आधुनिक युग में भक्ति-राजनीति रूस और भारत में लगभग एक साथ शुरू हुई। लगभग सौ साल पहले। रूस में कम्युनिस्टों द्वारा सत्ता हड़पने जमने बाद, लेनिन को दैवी-क्षमता से युक्त अलौकिक व्यक्ति बताया जाने लगा। कम्युनिस्टों ने प्रचार किया कि लेनिन के दिमाग पर साइंटिस्ट शोध कर रहे हैं, वगैरह। आगे वही भक्ति स्तालिन के लिए और बढ़कर की गई।

भारत में वही गाँधीजी के साथ हुआ। एक संत, जो कुटिया में बैठे, अपनी क्षीण वाणी से ब्रिटिश साम्राज्य को हिला रहा है!  जिसे ऐसे-ऐसे काम सूझते हैं जिस से सभी दंग रह जाते हैं, आदि। बाद में वही नेहरू के लिए हो गया। 1950 के दशक में बड़े-बड़े भारतीय बौद्धिक गंभीरता से कहते थे कि पंडित जी ने ही दुनिया को बचा रखा है, वरना अमेरिका-रूस लड़ मरते!

आज भारी कीमतें चुका कर रूस तो भक्ति राजनीति से निकल गया। चीन में भी माओ-भक्ति अतीत हो चुकी, यद्यपि कीमत वहाँ भी भारी चुकानी पड़ी। किन्तु भारत में भक्ति-राजनीति जारी है। पदासीन नेताओं  के गजब दिमाग, दिव्य-दृष्टि के किस्से चलाए जाते हैं।

यहाँ अनेक दल अपने नेता की आरती-पूजा एवं आज्ञापालन सिवा कोई काम न करते हैं, न जानते हैं। अच्छे-अच्छे लोग ऐसे-ऐसे भक्ति बयान देते और काम करते हैं जिस का सानी वर्तमान लोकतंत्रों में मिलना असंभव है।

भारत जैसी ज्ञान-परंपरा के महान देश, तथा लोकतंत्र में यह विशेष लज्जास्पद है। क्योंकि ऐसा करने से इंकार पर पार्टी या शासन कोई दंड नहीं दे सकता। कोई ऊँचा पद न मिले, पदोन्नति न हो, अगली बार पार्टी-टिकट न मिले। बस। यह स्वविवेक, देश-हित, या आत्म-सम्मान के लिए भी कोई कीमत ही नहीं! तब भी यदि अनेक पार्टियों, संगठनों के लोग अपने नेता की भयंकर भूलों और बारं-बार गलत कामों पर चुप्पी रखते हैं। नीतियों के बदले नेताओं की छवि बनाते-बिगाड़ते जीवन व्यर्थ करते हैं।

सार्वजनिक तो दूर, पार्टी के अंदर भी खुला विचार-विमर्श नहीं करते। उन्हें कौन रोकता है? सिर्फ कुछ क्षुद्र लोभ और भय। अपनी निजी सुखद स्थिति का वही सुख कुछ और समय तक चलाने की चाह के सिवा शायद ही कोई कारण हो। कहने को पार्टी अनुशासन’, ‘देश-हित’, ‘नाजुक परिस्थिति’,  आदि बहाने जरूर हैं। किन्तु पश्चिमी लोकतंत्रों में पार्टियाँ और पुरानी हैं, जहाँ पार्टी सदस्यों, सांसदों पर ऐसा कोई अनुशासनया आत्मबंधन नहीं। नीतियों, घटनाओं पर वे अपनी राय रखने को पूर्ण स्वतंत्र हैं। अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पार्टी सदस्यता से बहुत ऊपर है। वस्तुतः भारतीय संविधान ने भी वही मॉडल अपनाया है। पर व्यवहार में यहाँ कम्युनिस्ट देशों वाला प्रपंच लाद दिया गया है।

यह इस से भी साफ है कि वही अनुशासितलोग पद से हटा दिए जाने पर, सार्वजनिक रोधा-धोना, दल-त्याग, नया दल बनाने, आदि सभी कर्म करते हैं। किन्तु समाज-हित और धर्म-हित पर सीधी चोट पड़ते रहने पर भी मुँह सिले रखते हैं।

यह भक्ति-राजनीति का दूसरा, विवेकहीन पक्ष है। गाँधी और नेहरू युगों में भी यह बारंबार दिखा था। प्रथम विश्वयुद्ध में सैनिक-भर्ती कराने; खलीफत जिहाद को समर्थन; जिहादियों द्वारा हिन्दू-संहार पर चुप्पी; राजपाल या श्रद्धानन्द जैसे महान हिन्दुओं की हत्याओं की निंदा न कर मकतूल को ही दोषी बताने; मुस्लिम लीग को ब्लैंक-चेक देने; जीते-जी देश-विभाजन न होने देने की प्रतिज्ञा तोड़ लाखों हिन्दुओं के साथ औचक विश्वासघात करने; फिर उन्हीं तबाह हिन्दुओं को जली-कटी सुनाने; तथा निजी जीवन में भी लोकदृष्टि से छिपा  कर गंदे आचरण करते रहने, तक गाँधीजी की भयंकर भूलों पर बाकी कांग्रेस नेता मौन रहे थे।

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उसी तरह, नेहरू पर। चीन को तिब्बत दान देकर तिब्बतियों को बर्बाद और भारत को असुरक्षित कर लेना; सोवियत नकल में अमेरिका को लेक्चर देना; पंचशील पर हस्ताक्षर कर सीमाओं से बेफिक्र हो जाना; सुरक्षा परिषद में मिल रही स्थायी सदस्यता ठुकरा कर चीन की पैरवी करना; फिर उसी चीन से धोखा खाकर पश्चिम से मदद लेना, आदि।

कांग्रेस के इतिहास में कहीं नहीं मिलता कि उपर्युक्त भयंकर भूलों पर गाँधी या नेहरू को कभी सेंसर भी किय़ा गया। उन्हें नेतृत्व अयोग्य मानकर रिटायर करना तो दूर। क्यों?

ऐसा नहीं कि ये भूलें आज दिखाई पड़ रही हैं। सच तो यह कि कई भूलें होते समय, या तुरत बाद ही अधिक साफ दिखी थीं। चेतावनियाँ भी मिली थीं। आज उन पर भारी पर्दा डाल दिया गया है। यह केवल कांग्रेस ने नहीं किया। सभी दलों के शासकों ने पर्दादारी में सहयोग किया। वे दूसरे नेताओं पर व्यक्तिगत आक्षेप करते हैं। क्योंकि नीतियों में सभी दलों के नेता वही उत्तरदायित्व-विहीन, अबाध, आजीवन पद-सत्ता की चाह में डूबते गए। दूसरों पर आप वही सवाल उठाते हैं, जिस से आप न घिरें। लिहाजा, जो चाहे करें पर ताउम्र पदासीन रहें इस के लिए गाँधी-नेहरू मॉडल सिवा आधुनिक लोकतंत्रों में कोई उदाहरण नहीं।

इसीलिए, भक्ति-राजनीति एक ओर झूठा विराट् व्यक्तित्व बनाती है। फिर उस के बचाव में विविध प्रपंच रचती है। नियमित प्रोपेगंडा पर राजकीय/सार्वजनिक पैसा गंदे पानी सा बहाती है। जनता को झूठ और नाटक की खुराक देती है, ताकि उस की नजर पर नीतिगत गड़बड़ियाँ न चढ़ें। नीतिगत फैसलों, उस के औचित्य, या परिणामों का आकलन न कभी करती है, न करने देती है। बस कम्युनिस्ट देशों सी मनमानी घोषणाओं, अनर्गल दावों, अप्रमाणिक बातों का घटा-टोप। साथ ही दुश्मनों को फायदा न होने देनेऔर आंतरिक घातियोंसे सावधान रहने के नाम पर सभी असुविधाजनक सवालों पर स्थाई ताला। जो लेखक आदि आलोचना करें उन की बातों का उत्तर के बदले चरित्र-हनन।

यह दूसरी बात है कि जिन्हें दुश्मन, विदेशी एजेंट, टट्टू, आदि कहा जाए, उसी को कल बड़ा पद या पुरस्कार भी वही लोग दे सकते हैं। जिन को भष्ट लुटेरे कहें, उसी से कल मिलकर राजपाट बना लें। तब इसी को रणनीति, या विवशता कह बेचारे भक्त फिर दुहराते हैं। यह सब इतनी बार, और इतने क्षेत्रों में हो चुका कि इसे अनायास कहना असंभव है।

गत सौ सालों में भारतीय नेताओं द्वारा जो बड़ी-बड़ी नीतिगत भूलें होती रही उन्हें कभी नोट तक नहीं किया गया। किसी राजकीय/दलीय समिति ने उस की समीक्षा नहीं की। न देश को रिपोर्ट दी। फलतः वैसी भूलों का दुहराव रोकने की कोई व्यवस्था भी नहीं बनी। बल्कि, उन पर पर्दा डाल, उन्हीं नेताओं के राजकीय मकबरे बना. उन पर नियमित पूजा-पाठ, प्रोपंगेडा पर अलग से राष्ट्रीय धन की बरबादी। यह भी किसी लोकतांत्रिक देश में नहीं होता। केवल कम्युनिस्ट देशो में यह अनुष्ठान होते थे। नेताओं के नाम पर चौतरफा नामकरण भी. जो भक्ति राजनीति का रूप और फल दोनों है।

वही पंरपरा भारत में लोकतंत्र के बावजूद जारी है। कितना दुःखद कि सौ साल से लगातार नेता-भक्ति की भयावह हानियाँ उठाकर भी हम उत्तरदायी व्यवस्था नहीं बना सके। जिस में हरेक नेता को अपने दावों, नीतियों, निर्णयों का यथार्थ, प्रमाणिक हिसाब देना अनिवार्य हो। सभी कार्यो का स्वस्थ, पारदर्शी आकलन भी। तदनुरूप नेतृत्व-परिवर्तन भी सहज संभव हो।

हमारे नेताओं ने जैसी भूलें बार-बार कीं, उन में से एक पर भी पश्चिमी लोकतंत्रों में नेता को पद से विदा कर घर बिठाया जाता है। पर यहाँ उन की जयकार सदैव तेज कराई गई है। जैसा रूस चीन में हुआ, समय के साथ सारा आंडबर टूटता ही है। पर तब तक देश की भारी हानि हो चुकती है।

हम लोकतांत्रिक स्वराज में, स्वेच्छा से, ऐसा कर रहे हैं। सिर पर कोई हिटलर, स्तालिन, या औरंजजेब सवार नहीं। फिर भी सभी दलों में समर्थ लोग भीगी बिल्ली बने रहते हैं। मानो अपने समाज से अलग उन का भवितव्य हो!  जैसा श्रीअरविन्द और कवि अज्ञेय जैसे मनीषियों ने 50 वर्ष के अंतराल पर कहा था – यह हिन्दुओं में चिंतन-फोबियाहै, तथा भारत के मध्यवर्ग की प्रतिभा मर गई है

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By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

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