diseases cushings syndrome diagnoses महिलाओं की मुसीबत कुशिंग्स सिन्ड्रोम
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महिलाओं की मुसीबत कुशिंग्स सिन्ड्रोम

diseases cushings syndrome diagnoses

आंकड़ों के अनुसार इससे पीड़ित महिलाओं की संख्या पुरूषों से तीन गुना अधिक है, हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके करीब दस लाख मामले सामने आते हैं।  इससे ग्रस्त महिलाओं के चेहरे, गर्दन, छाती, पेट और जांघों पर ज्यादा बाल उगते हैं तथा मोटापा, चेहरे पर फैट जमा होने से मून फेस, कंधों-अपर बैक के बीच फैट जमा होने से बफलो हम्प,  ब्रेस्ट-बाजुओं-पेट  और जांघों पर नीले स्ट्रैच मार्क, पतली त्वचा, मुहांसे, थकान, मांसपेशियों में कमजोरी और कुछ का तो मासिक धर्म अनियमित या बंद हो जाता है जिससे उन्हें गर्भधारण में दिक्कत होती है। diseases cushings syndrome diagnoses

शरीर में कोर्टिसोल हारमोन का स्तर बढ़ने से होने वाली इस बीमारी को मेडिकल साइंस में  हाइपरकोर्टिसोलिज्म भी कहते हैं, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक पुरूषों की तुलना में महिलाओं को यह ज्यादा होती है, प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इससे पीड़ित महिलाओं की संख्या पुरूषों से तीन गुना अधिक है, हमारे देश में प्रतिवर्ष इसके करीब दस लाख मामले सामने आते हैं।

इससे ग्रस्त महिलाओं के चेहरे, गर्दन, छाती, पेट और जांघों पर ज्यादा बाल उगते हैं तथा मोटापा, चेहरे पर फैट जमा होने से मून फेस, कंधों-अपर बैक के बीच फैट जमा होने से बफलो हम्प,  ब्रेस्ट-बाजुओं-पेट  और जांघों पर नीले स्ट्रैच मार्क, पतली त्वचा, मुहांसे, थकान, मांसपेशियों में कमजोरी और कुछ का तो मासिक धर्म अनियमित या बंद हो जाता है जिससे उन्हें गर्भधारण में दिक्कत होती है।

इससे पीड़ित पुरूषों की सेक्स में रूचि कम होने से वे इरेक्टाइल डिस्फंक्शन का शिकार हो जाते हैं व फर्टिलिटी समाप्त होने लगती है। जब बच्चे इसकी चपेट में आते हैं तो उनकी ग्रोथ धीमी हो जाती है लेकिन वयस्कों की तुलना में बच्चे इसका शिकार कम ही होते हैं।

इलाज न कराने से हाई ब्लड शुगर (डॉयबिटीज), हाई ब्लड प्रेशर, ज्यादा प्यास, ज्यादा पेशाब आना, ओस्टियोपोराइसिस, सिरदर्द, मूड स्विंग, जानलेवा संक्रमण, एंग्जॉयटी, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन जैसे लक्षण उभरते हैं। सूडो कुशिंग्स सिंड्रोम में ये लक्षण तो उभरते हैं लेकिन टेस्ट करने पर कुशिंग्स सिड्रोम नहीं मिलता,  ऐसा लम्बे समय तक अधिक शराब पीने, मोटापे, लगातार हाई ब्लड शुगर, डिप्रेशन और प्रेगनेन्सी में होता है।

कारण क्या है कुशिंग्स सिंड्रोम का?

हमारे शरीर का इंडोक्राइन सिस्टम सम्पूर्ण हारमोन प्रोडक्शन सिस्टम कंट्रोल करता है, इस सिस्टम में सभी ग्लैंड (एड्रेनल, पिट्यूटरी, थॉयराइड, पैरा थॉयराइड, पेनक्रियाज, ओवरीज, टेस्टीकल्स) मिलकर अलग-अलग तरह के अनेक हारमोन्स बनाती हैं। इस प्रक्रिया में एक ग्लैंड से बना हारमोन सीधे-सीधे दूसरी ग्लैंड के हारमोन प्रोडक्शन को प्रभावित करता है। किडनी के ऊपर मौजूद एड्रेनल ग्लैंड कोर्टिसोल व कई अन्य हारमोन्स बनाती है, कोर्टिसोल हमारे शरीर का प्राइमरी स्ट्रेस हारमोन है यह मनुष्यों में पाया जाने वाला मुख्य प्राकृतिक ग्लूकोकोर्टिसाइड (जीसी) है। कोर्टिसोल ही यह रेगुलेट करता है कि हमारा शरीर किस तरह प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स और फैट (वसा) को इनर्जी में बदलेगा। ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर कंट्रोल करने के साथ शरीर के कार्डियोवैस्कुलर फंक्शन्स भी कंट्रोल करता है। यह इम्यून सिस्टम सप्रेस करके स्ट्रेस का सामना करने हेतु शरीर का रिस्पांस तैयार करता है जिससे व्यक्ति स्ट्रैस सहन कर सके। शरीर में कोर्टिसोल का स्तर लगातार हाई रहने से व्यक्ति कुशिंग्स सिड्रोम का शिकार हो जाता है। इस मामले में जेनेटिक फैक्टर भी अहम है लेकिन ये जरूरी नहीं कि यदि यह परिवार के एक सदस्य को है तो अन्य भी इससे पीड़ित होंगे।

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कुशिंग्स सिन्ड्रोम के टाइप

इसके दो टाइप हैं – एक्सोजीनियस और इन्डोजीनियस। एक्सोजीनियस कुशिंग्स सिन्ड्रोम की वजह शरीर के अंदर न होकर बाहरी है। ऐसा लम्बे समय तक कोर्टिस्टीराइड्स दवायें जैसेकि प्रेडनीसोन, डेक्सामेथासोन और मिथाइल प्रेंडनीसोलोन लेने से होता है, रियूमेटाइड आर्थराइटिस, ल्यूपस और अस्थमा पीड़ितों को ये दवायें दी जाती हैं। जोड़ों के दर्द, बैक पेन, बर्साइटिस, ल्यूपस, आर्गन ट्रांसप्लांट रिजेक्शन रोकने व इन्फ्लेमेटरी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल किये जाने वाले इन्जेक्टेबल कोर्टिकोस्टिराइड्स से इसके होने की सम्भावना बढ़ जाती है। क्रीम और इन्हेलर के रूप में दी जाने वाली ऐसी दवाओं से कुशिंग्स सिंड्रोम की सम्भावना न के बराबर है।

कुशिंग्स सिन्ड्रोम का दूसरा टाइप इन्डोजीनियस हमारे शरीर के अंदर से आता है और ऐसा शरीर में मौजूद एंड्रेनल ग्लैंड द्वारा ज्यादा मात्रा में कोर्टिसोल बनाने से होता है। हाई लेवल स्ट्रेस (सर्जरी, चोट, प्रेगनेन्सी से होने वाला स्ट्रेस) के समय, एथलेटिक ट्रेनिंग, मदिरा सेवन, डिप्रेशन, पैनिक डिस्आर्डर और कुपोषण से शरीर में कोर्टिसोल का उत्पादन बढ़ता है।

कुछ मामलों में शरीर में मौजूद ग्लैंड्स में ट्यूमर होने से कुशिंग्स सिन्ड्रोम होता है, पिट्यूटरी ग्लैंड ट्यूमर, इक्टोपिक ट्यूमर,  इंडोक्राइन ट्यूमर और एड्रेनल ग्लैंड ट्यूमर होने पर शरीर में कोर्टिसोल का उत्पादन बढ़ता है जिससे व्यक्ति कुशिंग्स सिंड्रोम का शिकार हो जाता है।

जब पिट्यूटरी ग्लैंड अधिक मात्रा में एसीटीएच बनाती है तो यह कोर्टिसोल में बदल जाता है और ऐसी स्थिति में यह सिंड्रोम कुशिंग्स डिसीस कहलाता है। कुशिंग्स डिसीस भी सिंड्रोम की तरह पुरूषों के बजाय महिलाओं को ज्यादा प्रभावित करती है।

किन्हें हो सकती है ये बीमारी?

इसका सबसे ज्यादा रिस्क उन लोगों को है जो किसी वजह से कोर्टिकोस्टीराइड्स की हाई डोज लेते हैं, रियूमेटाइड आर्थराइटिस, ऑर्गन ट्रांसप्लांट और ल्यूपस के मरीजों को इस तरह के मेडीकेशन पर रखा जाता है। इसके अलावा डॉयबिटीज टाइप-2, हाई ब्लड प्रेशर व मोटे लोगों को भी इसका रिस्क होता है। (diseases cushings syndrome diagnoses)

पुष्टि कैसे?

केवल लक्षणों के आधार पर इसकी पुष्टि कठिन है, क्योंकि इसमें जो लक्षण उभरते हैं वे बहुत सी दूसरी बीमारियों में भी होते हैं। इसकी पुष्टि के लिये डॉक्टर मेडिकल हिस्ट्री जांचने के बाद फिजिकल हैल्थ कंडीशन की जांच से बफलो हम्प और स्ट्रेच मार्क देखते हैं, कुशिंग्स सिड्रोम का संदेह होने पर पुष्टि के लिये ये टेस्ट किये जाते हैं-

24-हॉवर यूरीनरी फ्री टेस्ट: इसमें 24 घंटे की यूरीन एकत्रित करके उसमें कोर्टिसोल की मात्रा जांचते हैं।

लार कोर्टिसोल टेस्ट: स्वस्थ यानी बिना कुशिंग्स सिंड्रोम ग्रस्त लोगों में शाम को कोर्टिसोल का स्तर कम होता है, इसलिये शाम या रात को लार का सैम्पल लेकर उसमें कोर्टिसोल की मात्रा जांचते हैं यदि यह ज्यादा है तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति कुशिंग सिंड्रोम से ग्रस्त है।

लो-डोज डेक्सामेथासोन सप्रेस टेस्ट: इसमें व्यक्ति को शाम को डेक्सामेथासोन की अल्प खुराक देकर सुबह रक्त में कोर्टिसोल स्तर जांचते हैं। डेक्समेथासोन शरीर में कोर्टिसोल का स्तर गिरा देता है, यदि व्यक्ति कुशिंग्स सिंड्रोम से पीड़ित है तो ऐसा नहीं होगा और कोर्टिसोल का स्तर बढ़ा हुआ ही आयेगा।

कुशिंग्स सिड्रोम का कारण जानने के लिये ब्लड एसीटीएच, सीआरएच, हाई डोज डेक्सामेथासोन टेस्ट, पेट्रोसाल साइनस सैम्पलिंग और सीटी स्कैन या एमआरआई की जाती है।

इलाज क्या है इसका?

इलाज से शरीर में कोर्टिसोल का बढ़ा स्तर कम करते हैं, इसमें चाहे एड्रेनल ग्लैंड द्वारा कोर्टिसोल का उत्पादन कम करना हो या फिर पिट्यूटरी ग्लैंड द्वारा एसीटीएच का उत्पादन। इसके लिये कीटोकोन्सेजोल, मीटोनेट, मेटोरीरोन, सिग्नीफॉर और कोरलिम जैसी दवायें दी जाती हैं।

यदि कुशिंग्स सिंड्रोम का कारण ट्यूमर है तो इलाज इस आधार पर किया जाता है कि ट्यूमर कैंसरस है या नॉन-कैंसरस। बहुत से मामलों में सर्जरी से ट्यूमर रिमूव करते हैं यदि ट्यूमर की लोकेशन ऐसी है कि उसे सर्जरी से रिमूव नहीं किया जा सकता तो रेडियेशन या कीमोथेरेपी इस्तेमाल करते हैं।

कुशिंग्स सिड्रोम की दवायें समय पर लें ऐसा करने से पीड़ित व्यक्ति ऑस्टियोपोराइसिस, एट्रॉफी, हाई ब्लड प्रेशर, बार-बार संक्रमण, हार्ट अटैक, एंग्जॉयटी और डिप्रेशन का शिकार हो सकता है, यदि शरीर में ट्यूमर है तो वह और बड़ा हो सकता है जिससे जिंदगी खतरे में पड़ सकती है।

कुशिंग्स सिंड्रोम डाइट

डाइट बदलकर इससे होने वाली परेशानियों को काफी हद तक कंट्रोल कर सकते हैं, इसके तहत कम कैलोरी  वाला भोजन लें जिससे मोटापा न बढ़े, शराब पीना बंद करें, शुगर बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ न खायें तथा खाने में नमक कम करें। यह सुनिश्चित करें कि भोजन में कैल्शियम और विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा हो।

नजरिया

कुशिंग्स सिंड्रोम की पुष्टि होने पर तुरन्त इलाज शुरू करें, इलाज का असर कुछ समय बाद दिखाई देगा  है इसलिये डॉक्टर की सलाह पर चलें, समय पर दवायें लें और धैर्य बनायें रखें। यह याद रखें कि इलाज में कोताही के गम्भीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं या जान भी जा सकती है। diseases cushings syndrome diagnoses

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