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कर्ज में सरकारें…. अरबपति राजनीतिक दल….?

भोपाल । आज एक तरफ जहां हमारा देश भारी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है, केन्द्र सहित राज्य सरकारें भारी कर्ज के तले दबी हुई है, वहीं सरकारों के प्रणेता राजनीतिक दल ‘अरबपति’ बने हुए है और इनकों चलाने वाले राजनेताओं को अपनी अगली सात पुश्तों तक की कोई चिंता नहीं है।

यह कैसी विसंगति है, आज देश के बीस राज्य कर्ज के बोझ से कराह रहे है, जिनमें हमारा अपना मध्यप्रदेश भी शामिल है, जिस पर दो लाख पिंचान्वे हजार करोड का कर्ज है और यह कर्ज दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। यदि इस कर्ज का प्रति व्यक्ति औसत निकाले तो मध्यप्रदेश के हर नागरिक पर डेढ़ लाख से अधिक नागरिक पर डेढ़ लाख से अधिक का कर्ज है, यह स्थिति क्यों बनी? इस पर आज तक किसी ने कोई माथापच्ची नहीं की, वास्तव में इसके लिए शासनरूढ़ राजनीतिक दल की जिम्मेदार है, जो अपने लोकलुभावन वादों की पूर्ति के नाम पर देश-प्रदेश को कर्ज के महासागर में डूबों रहे है।

हमारा देश शायद नब्बे का दशक भूल गया, तब मुल्क दिवालिया या यह कहें श्रीलंका होते-होते बचा था, जिसकी शुरूआत 80 के दशक से हो गई थी, जब देश के इन भाग्यविधाताओं ने अपने मूल दायित्व की अनदेखी की थी, सिर्फ अपनी तुच्छ राजनीति के लिए? आज तक भी वही चालीस साल पुराना दौर जारी है, देश प्रदेश की विषम आर्थिक स्थिति से किसी ने कोई शिक्षा नहीं ली, वह इसलिए क्योंकि आज के राजनेता देश से ज्यादा राजनीति को महत्व देते है?

आज देश की केन्द्र व राज्य सरकारें जहां भारी कर्ज के बोझ तले दबती जा रही है, वही राजनीतिक दल अज्ञात स्त्रोतों से धन अर्जित कर दिनोंदिन अरब-खरब पति होते जा रहे है हाल ही में इस बारे में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने हाल ही में अज्ञात स्त्रोतों से पन्द्रह हजार सतहत्तर करोड़ रूपए कमाए, अब ये अज्ञात स्त्रोत कौन है, यह कोई भी बताने को तैयार नहीं और फिर हमारे देश की तो यह पुरानी परम्परा रही है कि जो दल केन्द्र या राज्यों में सत्तारूढ़ होता है, उसी की आय सबसे अधिक बढ़ती है और अज्ञात स्त्रोत भी उसी ओर आकर्षित होता  है, इसी कारण आज केन्द्र तथा देश के अधिकांश राज्यों पर राज करने वाली भारतीय जनता पार्टी सबसे अमीर पार्टी है, गत वर्ष (2020-21) के दौरान भाजपा को एक सौ करोड़ से अधिक की राशि अज्ञात स्त्रोतों से प्राप्त हुई। राष्ट्रीय दलों ने 2004-05 वर्ष से 2020-21 तक 15 हजार करोड़ से अधिक की राशि अज्ञात स्त्रोतों से प्राप्त की, इस राशि से राजनीतिक दल व उसके नेता अपने हित साधनों का कार्य करते है और सरकार या किसी भी सरकारी विभाग (आयकर सहित) की हिम्मत नहीं की वह इनसे इनका हिसाब किताब प्राप्त कर सके।

लगभग आजादी के बाद से ही आज तक चली आ रही इस परम्परा पर मोदी सरकार ने कुछ लगाम कसने की तैयारी की है, अब खबर है कि चुनाव आयोग ने इस पर संज्ञान लेते हुए विधि मंत्रालय को सख्त कदम उठाने की सिफारिश की है, सबसे प्रमुख सिफारिश यह है कि राजनीतिक दलों को एक बार में दो हजार रूपयों से अधिक का नगद चंदा नहीं दिया जाए, संभव है चुनाव आयोग ने कालाधन का प्रवाह रोकने के लिए यह सिफारिश की हो? किंतु यह सिफारिश है काफी महत्वपूर्ण? अभी तक नकद चंदें को लेकर यह परम्परा चली आ रही है कि राजनीतिक दलों को बीस हजार रूपए के नगद चंदे का हिसाब नही रखना होता है। साथ ही निर्वाचन आयोग यह भी चाहता है कि चुनावों के दौरान उम्मीदवार अलग से बैंक खाता खोलें और सारा चुनावी लेन-देन इसी खाते से हो चुनावी खर्च में इसकी जानकारी भी दी जाए। इसके साथ ही चुनाव आयोग विदेशी सूत्रों से प्राप्त फण्ड की भी जांच व इसे रोकने की दिशा में व्यापक चिंतन-मनन कर रहा है। चुनाव आयोग के अध्यक्ष राजीव कुमार ने केन्द्रीय विधिमंत्री किरण रिजीजू को इस मसले पर एक लम्बा  पत्र भी लिखा है। जिसमें मौजूदा जन प्रतिनिधित्व कानून में कुछ संशोधन करने की सिफारिश की है चुनाव आयोग का दावा है कि यदि केन्द्र सरकार उसके प्रस्ताव मान लेती है और उन्हें लागू कर देती है तो चुनाव में पारदर्शिता बढ़ेगी और फिर इस पर आरोपों की बौंछारें भी नहीं होगी। उल्लेखनीय है कि चुनाव आयोग ने पिछले दिनों इन्हीं वजहों से कई दलों को निष्क्रीय भी घोषित किया है, ऐसे ढ़ाई सौ  से अधिक दल है।

इन्हीं सब चुनाव आयोग व केन्द्रीय विधि मंत्रालय के द्वारा उठाए गए  कदमों से यह माना जा रहा है कि केन्द्र सरकार अब चुनावी धांधलियों को खत्म करने की दिखा में सक्रिय हो रही है और यदि ये सख्तियां रंग लाई तो फिर देश चुनावी धांधलियों से मुक्त होकर निष्पक्षता की राह पकड़ लेगा। लेकिन इसके लिए देश की राजनीतिक ताकतों व शासनरूढ़ दलों में संकल्प शक्ति की अच्छी खासी जरूरत है, क्योंकि यदि राजनीतिक और राजनेता देश को सभी अवरोधों से मुक्त करने का संकल्प ले ले तो फिर उस देश की प्रगति को कोई नहीं रोक सकता।

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