nayaindia Election चुनाव समाज के मुद्दों पर नहीं- बाबाओं के पाखंड के सहारे होंगे...?
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चुनाव समाज के मुद्दों पर नहीं- बाबाओं के पाखंड के सहारे होंगे…?

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भोपाल। पहले प्रथमेश की मूर्ति को दूध पिलाया, फिर मंदिर की गुहार लगायी और अब भोले शिवशंकर के रुद्राक्ष पर दांव लगाया ! देश की संपत्ति बेच -बेच कर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बजट को कम किया और मंदिरों के निर्माण – पुनरुद्धार और कारीडोर बनाने के लिए छोटे मंदिर हटाये गए – लोगों के मकान तोड़ेे गए, इसलिए की भगवान के दर्शन के लिए टिकट की दर बढ़ायी जाये और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिले – भगवाधारियों को चढ़ावा मिले। होटल और खाने और पीने की दुकानें चले। पहले मंदिरों के अर्चक – पुजारी – सेवक और सहायक, दर्शन के लिए आने वालों की दक्षिणा पर्याप्त हुआ करती हैं, परंतु अब गैस – पेट्रोल और आटे दाल की मंहगाई में भक्त अब श्रद्धा निधि नहीं चड़ाते है, इसलिए सरकारी तंत्र (हालांकि इन धार्मिक संस्थानों का प्रबध यूं तो कलेक्टर या सरकार के नियुक्त नुमाइंदे ही करते है, पर बजरंग दल – विश्व हिंदु परिषद और भ्ग्वधारी बाबाओं की डिमांड हैं कि इन मंदिरों का प्रबंधन साधुओं को मिले।

वैसे खुद को ही स्वामी और संत की पदवी लेने वालों की शिक्षा -दीक्षा और योग्यता की जानकारी इनके भक्तों और -शिष्यों तक को भी नहीं होती हैं। हाँ उनके आतंक और रसूख से भयभीत चेलों को बाबा राम रहीम और रामलाल और राजस्थान की जेल में बलात्कार के अपराध की सज़ा काट रहे लाखों चेलों की उम्मीद के संत आशा राम उदाहरण हैं। दक्षिण के एक भगवाधारी के तो महिलाओं के साथ भोग के वीडियो भी समाज और बाज़ार में हैं। अब जैसे लोगों के जन प्रतिनिधि की शिक्षा और अनुभव की कोई परीक्षा नहीं होती, वैसे ही इन सफ़ेद और भगवाधारियों बाबाओं को भी कोई परीक्षा नहीं देनी होती। वैसे मस्जिद के मौलवी के बराबर पगार की मांग करने वाले यह भूल जाते है कि उनको न्यूनतम दीनी तालिम की शिक्षा की परीक्षा पास करनी होती हैं एवं ईसाई धरम में तो बाकायदा महिला और पुरुष पादरियों को भी परीक्षा पास करनी होती हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यामंत्री वेश भूषा से भगवाधारी बाबा ही हैं। वे गोरखनाथ मठ के स्वामी भी हैं। जो शैव संप्रदाय का ही एक तरह से अंग है। परंतु एक टीवी डिबेट में उन्हें एक इस्लामिक मौलवी ने शिव श्त्रोत सुनाने को जब कहा तो वे लड़खड़ा गये और असफल रहे ! शायद सनातन धरम के लोग ही अपने आराध्यों के दर्शन को भी श्रद्धा का नहीं व्यापार का मुद्दा मानते हैं, तभी तो विश्व के किसी अन्य धरम में अपने आराध्य के दर्शन के लिए कीमत नहीं चुकनी पड़ती। अब इस स्थिति को सनातन या की अहले ज़ुबान में हिन्दू लोग क्या कहेंगे ?

केदारनाथ में कुछ साल पहले का भू स्ख़लन और अब जोशी मठ में धरती के हिलने से मकानों और सड़क में दरार का कारण धरम में अब श्रद्धा के स्थान पर सुविधा का महत्व हो चला है। यूं तो पर्वतीय तीर्थ स्थानों में स्थानीय लोगों द्वारा कुली के रूप में अपनी पीठ पर बैठा कर ले जाने प्रथा काफी पुरानी है ! पर क्या पैसे के दम पर आराध्य इन तीरथ यात्रियों को इस जन्म के पुण्य के आधार पर अगले जनम में कुछ बेहतर मिलेगा! मुझे तो लगता है कि अगर पैसे देकर दर्शन करना उचित है तब तो यह सिनेमा देखने जैसा हो गया !

पाठक गण विचार करे कि – भूखे को भोजन, रोगी को इलाज़ और बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करना बेहतर है या मंदिर की मूर्ति के दर्शन के लिए टिकट खरीदना ? भगवान क्या सोचते है अथवा क्या करेंगे यह कोई ज्योतिषि या बाबा या मौलवी अथवा पारी नहीं बता सकता, अगर ऐसा संभव होता तो तुर्की और सीरिया के 45000 लोगों कि जान बचाई जा सकती थी..! हाँ कुछ लोग भूकंप के मलवे में दस इन बाद भी जिंदा मिले, अब यह आसमानी करतब है या फिर संयोग..? श्रद्धा और तर्क पर परखिये।

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