झूठे दावे-कोरे वादों की बिसात का ‘मोहरा’ मजदूर

हक़ीक़त पर नजर डालें तो लॉकडाउन वन के तत्काल बाद जब इन मजदूरों पर रोजी रोटी का संकट मंडराने लगा तो उनका धैर्य टूट गया। मरता क्या न करता तो मासूम बच्चों,महिलाओं के साथ इस तपतपाती धूप में निकल पड़े पैदल ये जानते हुए कि कुछ कोस का सफर नहीं बल्कि जान हथेली पर लेकर सैकड़ों हज़ारों किमी की लंबी दूरी तय करना है।

जब ये मजदूर निकले तो उस समय न तो किसी नेता को इनकी बेबसी समझ आई और न किसी नेत्री को इनकी भूख से हमदर्दी दिखी. रास्तों में खुदगर्ज बनकर बिना किसी से सहायता की उम्मीद पाले ये मजदूर जब सड़कों से निकले तो कुछ समाजसेवियों को इनकी पीड़ा का एहसास हुआ और वे रास्तों पर भोजन, पानी, जूते चप्पल देकर उनका सहारा बने।

अब तक सरकार और जनप्रतिनिधि सब सो रहे थे. दूसरे और तीसरे लॉकडाउन तक जब,मीडिया और सोशल मीडिया ने मजदूरों की बदहाली,पांव के छालों और उनके निवालों की बात कर सवाल खड़े किए तो सबके कान खड़े हो गए और सरकारों, नेताओं की दरियादिली सामने आने लगी। मजदूर अपने गंतव्य तक पहुंच रहे हैं और बहुत संख्या में अभी सड़कों पर पैदल हैं.सड़क से लेकर बसों और ट्रेन की सुविधाओं से भले ही बहुत मजदूर बंचित हों पर राजनेताओं के लिए अब वही मजदूर पॉलिटिकल एजेंडा बन चुका है।

समाजसेवियों ने समझा मजदूरों का दर्द

कोरोना पर अंकुश लगाने में जब सरकारें बेबस नज़र आने लगीं तो माननीयों के बयान बदल गए और उन्होंने कोरोना के संग जीना सीखने के गुरु मंत्र देकर जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया.ठीक वैसा ही मजदूरों के मामले में सरकारों ने किया.जब मजदूर हज़ारों, लाखों की संख्या में महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा से सड़क मार्ग पर पैदल बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश में अपने गांव को चल पड़े तब सरकारें लॉकडाउन के नियम कानून गिनाकर सोशल डिस्टेन्स की वकालत करने में मगन थीं।

मजदूरों को लॉकडाउन की जगह अपना गांव दिखाई दे रहा था सो जैसे भी साधन मिला, साइकिल, रिक्शा, ट्रक, टैंकर, कंटेनर, मिक्सर मशीन वे उसमें गिरते पड़ते, भूसे से भरकर अपने गंतव्य को जाने लगे.सरकार और राजनेताओं को तब न इन मजदूरों के पांव में छाले नज़र आए और न इनके भूख से तड़प रहे बच्चे,गर्भवती महिलाएं जो सर पर गठरी रखकर सैकड़ों किमी पैदल चलती जा रहीं थी.इतनी जिंदगियों के सड़क पर होने के बावजूद सरकारों ने इसे शुरुआत में नज़रंदाज़ किया और राज्यों की पुलिस ने बॉर्डर पर ही मजदूरों को रोक दिया।

हज़ारों लाखों मजदूरों की बेबसी,लाचारी,बदहाली जब सोशल मीडिया और मीडिया के जरिए सरकार की आंखों तक पहुंची तब सरकार जागी और उसे एहसास हुआ कि लॉकडाउन से मजदूरों के हालात बेहद बद्तर हैं.मजदूर खुद व खुद अपनी मुँहजुबानी सरकारी सुविधाओं वाले दावों की पोल खोल रहे हैं.क्योंकि सड़कों पर पैदल चल रहे मजदूरों की भूख सरकार ने नहीं समाजसेवियों ने मिटाई है.सरकारी सुविधायें भी मजदूरों को मिली पर वो ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर.

नेताओं की ‘बस’ राजनीति और एमपी
कुछ रोज पहले से जब ज्यादातर मजदूर घरों पर पहुंच चुके कुछ बाकी हैं तो उनके लिए बसों की व्यवस्था पर राजनीति फैलने लगी.मजदूरों को बस सेवाएं उपलब्ध कराने को लेकर कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी और उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की बयानबाजी चर्चाओं में है.अब मजदूरों को बसें मिलें न मिले बयानबाज़ी ने जमकर सुर्खियां बटोर ली हैं.कांग्रेस का कहना है कि प्रियंका गाँधी ने यूपी को 1000 बसें पैदल चल रहे मजदूरों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने भेजीं थीं लेकिन बसों को मजदूरों को ले जाने की अनुमति नहीं दी जा रही।

वहीं यूपी सरकार ने कहा कि बसों के साथ निजी वाहनों के नंबर लिस्ट में दिए गए जिससे अनुमति नहीं दी गई.पिछले दो रोज़ से प्रियंका गांधी और योगी सरकार के बीच चिट्ठी चिट्ठी खेला जा रहा है.तनातनी के बीच मंगलवार को उस समय इस मजदूर वार में ट्विस्ट आ गया जब प्रियंका और योगी की खींचतान में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ट्वीट एंट्री हुई.उन्होंने प्रियंका ग़ांधी को आड़े हाथों लिया और उन्हें समझाइश दे डाली।

शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट में कहा कि प्रियंकाजी यदि आपको सच में श्रमिकों से हमदर्दी है और मदद करनी है तो मध्यप्रदेश आइए.हमारे यहां की व्यवस्थाएं देखिए,सीखिए उससे आपको मदद मिलेगी.मध्यप्रदेश की धरती पर आपको कोई मजदूर भूखा,प्यासा और पैदल चलता नहीं मिलेगा.हमने कारगर इंतज़ाम किए हैं.दूसरे ट्वीट में शिवराज ने कहा प्रियंका जी संकट की इस घड़ी में अपनी निकृष्टतम राजनीति के लिए मजदूरों को मोहरा मत बनाइए।

उनकी हाय लगेगी. उनके साथ साथ ये देश और दुनिया भी आपकी कथनी और करनी में अंतर को साफ साफ देख रही है.छल नहीं सेवा कीजिए,यही सच्ची राजनीति है.इसके एक अन्य ट्वीट अपनी उपलब्धियों से भरा किया गया जिसमें शिवराज ने कहा कि अपने और दूसरे राज्यों के श्रमिक भाइयों को उनके घरों एवं राज्यों तक पहुंचाने के लिए एक हज़ार से ज्यादा बसें रोजाना चलवा रहे हैं। देश के दूसरे राज्यों में फंसे अपने 4.5 लाख मजदूर भाई बहनों को अब तक ट्रेनों और बसों से उनके घर पहुंचा चुके हैं।

शिवराज जी झूठे हो आप
शिवराज के प्रियंका गांधी को किए गए ट्वीट सामने आते ही प्रदेश कांग्रेस अपने नेता के बचाव में उतरी.कांग्रेस ने पलटवार कर प्रदेश भर में पैदल चलने वाले मजदूरों की तस्वीरें शेयर कर लिखा कि एमपी के हाईवे पर पैदल चलते लोग,भोपाल सहित सभी शहरों से हज़ारों की तादाद में पलायन करते लोग,हर गली हर मोहल्ले में आपके खिलाफ प्रदर्शन करते लोग खुद सच बता रहे हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता दुर्गेश शर्मा ने कहा कि प्रदेश में यदि कोई मजदूर पैदल नहीं चल रहा,भूखा प्यासा नहीं है तो हाल ही में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा सड़क पर चलने वाले जिन मजदूरों को चप्पल पहना रहे थे.पानी पिला रहे थे क्या वो सब झूठ था.सरकार ने एक आदेश जारी किया कि बाहरी प्रदेश के किसी मजदूर की यदि मृत्यु होती है तो सरकार उसके परिजनों को एक लाख रुपए,घायल को 25 हज़ार रुपए सहायता राशि देगी।

कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि मध्यप्रदेश में सब ठीक है तो इस आदेश की क्या जरूरत.कांग्रेस ने सवाल किया कि कितने हादसे हुए,कितने मजदूर मारे गए और रोजाना सड़क चलते मजदूर हादसों का शिकार हो रहे और ऐसे प्रदेश को देखने आप लोगों को बुला रहे हैं. रोजाना प्रदेश के इंदौर, भोपाल, जबलपुर, एमपी, यूपी बॉर्डर पर सैकड़ों समाजसेवी जिन पैदल राहगीरों को खाना,पानी और अन्य सामग्री वितरण करने की तस्वीरें डाल रहे वो क्या झूठ है।

दावे सही हैं तो ऐसा क्यों..
सरकार के दावों को मान लिया जाए तो फिर क्या उन प्रशासनिक जिम्मेदारों पर लापरवाही बरतने का सवाल उठाया जाए जो सरकार की मंशा के अनुरूप अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर रहे.महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के बॉर्डर यानी बड़वानी के बीजासन घाट पर कई हज़ार मजदूर 4 रोज़ पहले फंसे रहे.ऐसा नहीं कि वहां सरकारी बसें नहीं पहुंचाई गई बल्कि मजदूरों की संख्या को देखते हुए जितनी बसें पहुंचाई गई न काफी ही माना जाएगा.वहां मौजूद मजदूरों ने बताया खाने-पीने की व्यवस्था छोडि़ये जाने की व्यवस्था हो जाए काफी है।

ग्वालियर क्षेत्र में आज भी सैकड़ों मजदूर सड़क पर पैदल चलकर अपने गांव जा रहे. इन्हें न बस सुविधा है न खाना. सड़क पर मजदूर पैदल भी है, भूखा भी है,प्यासा भी है तो सरकार के दावों और वादों को कौन पलीता लगा रहा.मध्यप्रदेश-उत्तर प्रदेश की सीमा पर हाईवे पर ही पहाड़ी बांध के पास आज भी सैकड़ों मजदूर अपने परिवारों के साथ पैदल निकल रहे हैं. हालांकि पुलिस इन मजदूरों को वाहन से भेजने की व्यवस्था कर देती है।

मजदूरों को बसों की,भोजन की व्यवस्था की बानगी तो खुद उनकी जुबानी सुनने मिल ही जाएगी पर इन्हें बिना किसी सोशल डिस्टेन्स के ट्रकों,बसों में भरकर भेजने के घातक परिणाम की भी जिम्मेदारी किसी को तो लेनी होगी.इस कोरोना संकट में लापरवाहीं का नतीजा ये निकला कि प्रदेश के 52 जिलों में से 49 जिलों में पॉजिटिव मरीज मिल चुके हैं और ज्यादातर मरीज बाहर से पहुंचे प्रवासियों में हैं. बालाघाट, डिंडोरी, पन्ना, दमोह, गुना, मंडला, सिवनी, उमरिया, टीकमगढ़, राजगढ़, सिंगरौली, टीकमगढ़, छतरपुर में जो भी मरीज पाए गए हैं वो बाहर से लौटे हैं।

मजदूरों को भेजने और ग्रीन जोन में मिली छूट में सोशल डिस्टेंसिंग की जमकर धज्जियां उड़ाई गई हैं और जिले के जिम्मेदारों ने बाहर से आए प्रवासी मजदूरों की जांच में औपचारिकता दिखाई है.विशेषज्ञ मानते हैं कि जुलाई तक प्रदेश में 80 से 90 हज़ार मरीजों की संख्या होने की संभावना है. इसकी तैयारी भी करना ही होगी और सरकार इस दिशा में प्रयास भी कर रही है.खंडवा में एक साथ थोक में मिले कोरोना पॉजिटिव किसकी लापरवाही का नतीजा माना जाए।

बुंदेलखंड में अब तक 61 और मुरैना ,भिंड,दतिया में मिले संक्रमितों में से लगभग सभी बाहर से आए प्रवासी हैं.सरकारी मंशा में लापरवाही के नतीजे का ठीकरा चाहे जिसके सर फूटे पर अभी तो बाहर से आई इस महामारी से बचाव और मजदूरों को राशन,पानी की व्यवस्था अहम है.इन सबको देखते हुए सरकारी दावों और वादों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होना लाजमी है।

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