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सियासत में परिवारवाद संवर्धन चिरस्थायी मुद्दा…!

मध्यप्रदेश की विधानसभा में चुनकर पहुंचे बहुत सारे ऐसे विधायक हैं और पूर्व विधायक हैं जिनका खासा राजनीतिक परिवार रहा फिर चाहे वो सियासत वाला परिवार हो या रियासत यानी रजवाड़ों वाला.मध्यप्रदेश की सियासत में वंशवाद की राजनीति में यदि किसी बड़े और बजनदार परिवार का नाम अगर कोई है तो वो है सिंधिया परिवार का.दशकों से इस परिवार का जन संघ से लेकर,भाजपा,कांग्रेस की राजनीति में भीतर तक दखल रहा.फिर चाहे किसी की सरकार बनाने की बात हो या सरकार गिराने की.बड़ी रियासत से राजनीति में अपने परिवार के कद की बजनदारी की बात हो या अगली पीढ़ी की राजनीति में स्वीकार्यता कायम कराने की।

सिंधिया परिवार प्रदेश सहित पूरे देश में किसी पहचान का मोहताज नहीं.चाहे भाजपा की नींव मानी जाने वाली राजमाता सिंधिया की बात हो या फिर उनके बेटे पूर्व केंद्रीय मंत्री कै.माधवराव सिंधिया की या फिर कांग्रेस सरकार में ही राज्यमंत्री रहे और वर्तमान में भाजपा से राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की.इस परिवार की ही सदस्य राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री बसुंधरा राजे सिंधिया हैं तो एमपी सरकार में मंत्री रहीं विधायक यशोधरा राजे सिंधिया भी.पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की राजनीतिक विरासत उनके बेटे अजय सिंह राहुल भैया ने संभाली,राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह दो बार से विधायक चुने जा रहे हैं और कांग्रेस सरकार में नगरीय प्रशासन जैसे विभाग के कैबिनेट मंत्री भी रहे।

उनके समर्थकों ने तो जयवर्धन सिंह के भावी मुख्यमंत्री के पोस्टर भी लगवा डाले थे.पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष,वर्तमान नेता प्रतिपक्ष कामलनाथ के बेटे नकुलनाथ पहली बार चुनाव लड़े और लोकसभा में बतौर सांसद पहुंचे.उनका एक बयान भी सुर्खियों में रहा था कि अब वो प्रदेश के युवाओं का नेतृत्व संभालेंगे.पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव सांसद रहे,मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे.सचिन यादव विधायक हैं और एमपी कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे.पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के पुत्र सुंदर लाल तिवारी भी विधायक रहे.दिल के दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था.मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह के परिवार के सदस्य हर्ष नारायण सिंह,ध्रुव नारायण सिंह वंशवाद की राजनीति का ही हिस्सा बने।

रीवा रियासत के महाराज मार्तण्ड सिंह,महारानी प्रवीण कुमारी के बाद उनके बेटे पुष्पराज सिंह भी सक्रिय राजनीति में आकर विधायक बने.अजय-अर्जुन सिंह के बाद विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस का एक नाम वर्तमान विधायक और पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल का भी है इनके पिता इंद्रजीत पटेल कांग्रेस के बड़े नेता और कैबिनेट मंत्री रहे,सात बार विधायक चुने गए.विधायक सचिन यादव पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के बेटे हैं,इनके बड़े भाई अरुण यादव सांसद रहे.मंडला से विधायक संजीव उइके पूर्व दिवंगत विधायक छोटेलाल उइके के पुत्र हैं.लांजी विधायक और विस उपाध्यक्ष रहीं हिना कांवरे दिवंगत विधायक एवं कांग्रेस के पूर्व मंत्री हिना कांवरे की बेटी हैं।

कुक्षी विधायक और कांग्रेस सरकार में मंत्री सुरेंद्र सिंह बघेल के दिवंगत पिता सांसद और मंत्री रह चुके हैं.विधायक उमंग सिंगार पूर्व दिवंगत नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी के भतीजे हैं.अटेर विधायक रहे हेमंत कटारे पूर्व मंत्री और नेता प्रतिपक्ष सत्यदेव कटारे के पुत्र हैं.विधायक लक्ष्मण सिंह दिग्विजय सिंह के भाई हैं तो प्रियव्रत सिंह भतीजे,विक्रम भूरिया पूर्व कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के बेटे हैं.ओम रघुवंशी सहित ऐसे बहुत सारे नाम कांग्रेस में हैं जिनकी बात करें तो परिवारवाद की फेहरिस्त बहुत लंबी हो जाएगी।

नेहरू गांधी अध्यक्ष बदलने के बाद नहीं रहेगा वंशवाद?
परिवारवाद का मामला कांग्रेस की जड़ों में है और इसे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि जिन कांग्रेस के बड़े नेताओं ने सोनियां गांधी को चिट्ठी लिखकर कांग्रेस संग़ठन में ऊपर से नीचे तक बदलाव की दलील दी है और गैर नेहरू-गांधी अध्यक्ष बनाए जाने की वकालत की है उन्हीं में से कुछ वंशवाद की बेल का हिस्सा हैं.हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पिता रणवीर सिंह हुड्डा भारत के संविधान सभा के सदस्य रहे और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. इनके पुत्र दीपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा के रोहतक से सांसद रहे.मध्यप्रदेश के प्रभारी कांग्रेस महासचिव मुकुल वासनिक भी महाराष्ट्र के उन नेताओं में से हैं जिन्हें राजनीति परिवार से मिली है.वासनिक के पिता बालकृष्ण वासनिक बुलढाणा से तीन बार सांसद रहे।

वासनिक को बचपन से ही घर में राजनीतिक माहौल मिला क्योंकि पिता महाराष्ट्र के दिग्गज कांग्रेसी नेताओं में से एक रहे.कांग्रेस के कद्दावर नेता मिलिंद देवड़ा के पिता मुरली देवड़ा कांग्रेस पार्टी की सरकार में पेट्रोलियम मंत्री रहे.ये तो राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के उस परिवारवाद से जन्में अनेक नेताओं में से कुछेक उदाहरण हैं जिन्हें आज कांग्रेस का अध्यक्ष बदलने की और पार्टी के बदलाव की भारी चिंता है.जिस दिन कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक हो रही थी तब मध्यप्रदेश से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री कामलनाथ दोनों के बयान लगभग सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने के पक्ष वाले ही थे.ऐसा इसलिए भी था क्योंकि यदि बयान में कुछ उलटफेर होता तो भाजपा तत्काल चढ़ाई कर देती।

भाजपा में कांग्रेस से कम दिखता परिवारवाद
ऐसा नहीं है कि वंशवाद की बेल कांग्रेस में ही पनपी है.विधानसभा और लोकसभा चुनाव आते आते ये भाजपा में भी साफ साफ दिखाई जाती है.राष्ट्रीय स्तर की बात हो या राज्यों की सब जगह कुछेक उदाहरण मिल ही जाएंगे.हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश की तो यहां कृष्णा गौर,विधायक अकाश विजयवर्गीय,मंत्री विश्वास सारंग, विधायक दीपक जोशी, विधायक सुरेंद्र पटवा, विधायक राजेश प्रजापति वंशवाद की फेहरिस्त में शामिल हैं इसके अलावा जिन्हें राजनीतिक परिवारों की विरासत सम्हालने की जिम्मेदारी दी गई है

उनमें पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी की पुत्र अशोक रोहाणी,पूर्व मंत्री और सांसद ज्ञान सिंह के बेटे शिवनारायण सिंह,सागर के दिग्गज नेता सांसद लक्ष्मीनारायण यादव के बेटे सुधीर यादव,केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल के भाई जालम सिंह पटेल,पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के भतीजे राहुल लोधी,मंत्री विजय शाह के भाई संजय शाह,पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के भाई उमाकांत शर्मा,विधायक गौरीशंकर बिसेन की बेटी मौसम बिसेन,पूर्व मंत्री गौरीशंकर शेजवार के बेटे मुदित,हर्ष सिंह के बेटे बिक्रम सिंह,दिवंगत अखण्ड प्रताप सिंह यादव के बेटे अभय यादव,मंत्री रहीं अर्चना चिटनीस पूर्व विधानसभा अध्यक्ष की बेटी सहित कई केंद्रीय और प्रदेश के मंत्रियों के बेटों की एक लंबी लिस्ट है जो ये स्पष्ठ करती है कि भाजपा में भी परिवारवाद का असर तो है पर संगठन के हस्तक्षेप के चलते इस पर अंकुश लगा लिया जाता है.क्योंकि जब विधानसभा चुनाव या लोकसभा चुनाव आते हैं तो नेता अपने पुत्रों को टिकट दिए जाने की वकालत करने से नहीं चूकते।

अब परिजन योग्य हैं तो क्यों न मिले प्लेसमेंट
परिवारवाद को लेकर भले ही कोई राजनीतिक दलों पर नामदारों को टिकट देने का आरोप लगाए या फिर योग्य व्यक्तियों को पीछे धकेल नेता पुत्रों को आगे रखने जैसी लाख बातें करे पर नेताओं की दलीलें भी अपने पुत्रों,भाई, भतीजों को स्थापित करने काफी हद तक सही भी मानी जाएंगी.कुछ नेताओं का मानना है कि यदि नेताओं के बेटे योग्य हैं और वो राजनीति करना चाहते हैं तो उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर टिकट मिलना चाहिए और इसमें कोई बुराई नहीं क्योंकि व्यापारी का बेटा व्यापारी बन सकता तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं.बहुतों का मानना है यदि वो सियासी परिवार में जन्में हैं तो क्या गलत है।

कुछ राजनेता तो विदेशी राजनीतिक परिवारों का उदाहरण देकर बोलते हैं इसमें कहीं कुछ गलत नहीं.हालांकि कुछ नेताओं को उनके परिजनों के दिवंगत होने के बाद राजनीति में इसलिए भी मौका मिला क्योंकि जनभावनाएं उनके परिवारों के साथ रहीं.हाल ही में भाजपा के एक दिग्गज नेता ने परिवारवाद की बात पर कहा था कि क्या नेताओं के बेटे गुइयाँ छीलेंगे…खैर बात कुछ भी हो पर जब बात राजनीति में परिवारवाद या वंशवाद की हो तो देश की हर पार्टी एक दूसरे पर वंशवाद के आरोप मढ़ते अपने को साफ-सुथरा बताने की कोशिश करतीं हैं पर हक़ीक़त में सभी दल बखूबी जानते हैं कि सियासत में यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे कोई भी दल पाक-साफ नहीं हैं फिर चाहे क्षेत्रीय दलों की बात हो या राष्ट्रीय दलों की.ऐसे में क्या नामदार और क्या कामदार।

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