किसान को न खालिस्तानी बनाएं, न गुलाम!

अगर कोई हमसे पूछे तो हम कहेंगे कि राहुल गांधी को कुछ समय के लिए अपनी संवेदनशीलता, जन प्रतिबद्धता स्थगित कर देनी चाहिए। स्थितप्रज्ञ होकर समय की चाल देखना चाहिए। खूब किताबें पढ़ना चाहिए और कुछ समझदार राजनीतिक लोगों का सतसंग करना चाहिए। समंदर में जब दूर दूर तक तट नहीं दिखता तो नाव को लहरों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। उसे इधर उधर मोड़ कर श्रमव्यर्थ नहीं किया जाता। कबीर का यह दोहा बड़ा प्रासंगिक है-

“ धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय

माली सीचें सौ घड़ा रुत आए फल होए”

नफरत और विभाजन के इस राजनीतिक दौर में राहुल ने प्रेम और सत्य का संदेश देने में कोई कमी नहीं छोड़ी। मगर लोगों के दिमाग से झूठ का नशा नहीं उतर रहा। यहा तक कि किसान आंदोलन को खालिस्तान समर्थक बता दिया जाता है। पूछा जा रहा है कि खाली पंजाब के किसान क्यों? हालांकि आंदोलन में देश भर के किसान शामिल हैं। मगर खालिस्तान से जोड़ने के लिए

पंजाब का नाम इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसा तो अंग्रेजों ने भी  नहीं पूछा था कि खाली पंजाब के भगत सिंह ने ही असेम्बली में बम क्यों फेंका था?  आज जब कोई कुछ सुनने को भी तैयार नहीं है तो किसी को क्या बताया जाए? क्या कोई सुनेगा कि आजादी के आंदोलन में सबसे ज्यादा फांसी पर भी पंजाब के युवा चढ़े! अंग्रेजों की जेलें भी उन्हीं से भरी हुई थीं। और आज फौज में भी सबसे वीर लड़ाका माने जाते हैं।

किसान आंदोलन को खालिस्तान से जोड़ने वालों को क्या मालूम है कि वहां के किसानों की मदद से ही इन्दिरा गांधी, मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और डीजीपी केपीएस गिल ने आतंकवाद की कमर तोड़ी थी? बार्डर से लेकर दूर दराज के अंदरूनी गांवों तक किसान ही सुरक्षा बलों की मदद करते थे। ये किसान आज अगर अपनी मांगें लेकर दिल्ली आ गए तो खालिस्तानी हो गए?  इस खालिस्तान के खिलाफ ही तो लड़ते हुए प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी, मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और हजारों लोग शहीद हुए थे। आज उसका नाम भी लोग भूलने लगे थे। मगर किसानों को बदनाम करने के लिए खालिस्तान के नाम को फिर जिंदा कर दिया।

सीधी साधी बात  है कि नए कृषि कानूनों से सबसे ज्यादा नुकसान पंजाब के किसानों को है। क्यों? क्योंकि सबसे ज्यादा अनाज वहीं पैदा करते है। और उसका 90 प्रतिशत तक मंडी में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बिकता है। मंडी और एमएसपी खत्म हो जाने से पंजाब का किसान तो मिट ही जाएगा। तो पंजाब के किसान का आगे दिखना जितना स्वाभाविक है उतना ही उसे पीछे धकेलने की कोशिशें भी। क्योंकि अगर पंजाब का किसान टूट गया तो आधा आंदोलन बैठ जाएगा और खेती पर कारपोरेट का कब्जा हो जाएगा। इसीलिए इसमें खालिस्तान, पाकिस्तान सारे तत्व मिलाए जा रहे हैं। अगर यह प्रोपोगंडा कामयाब नहीं हुआ तो फिर इसमें हिन्दु मुसलमान भी डाला जाएगा।

ऐसे झूठ और प्रपंच के माहौल में राहुल 6 साल से संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन हिन्दु-मुसलमान की इस राजनीति में राहुल की सारी कोशिशों बेअसर जा रही हैं। अब तो सीन में ओवेसी को भी ले आया गया है। इसके बाद हिन्दु मुसलमान की राजनीति अपने पीक पर चली गई है। एक नगर निगम के चुनाव को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया गया है। हैदराबाद का नाम बदलने का विषय भी ऐसा उठाया है कि यह आगे बंगाल चुनाव तक चलेगा। हैदराबाद के बाद बंगाल में भी भाजपा और

ओवेसी ऐसे ही उग्र आरोप प्रत्यारोप करते रहेंगे। देश में किसी दूसरे मुद्दे को उठने नहीं देंगे। किसान आंदोलन, बढ़ता कोरोना, गिरती अर्थव्यवस्था, चीन की घुसपैठ, बेरोजगारी, महंगाई सब सवाल ठंडे बस्ते में चले जाएंगे।

राहुल यही तो मुद्दे उठाते हैं। साल के शुरू में कोरोना के प्रति सचेत किया था। अर्थव्यवस्था पर आगाह किया था। चीन की घुसपैठ पर सावधान किया था। लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। यहां तक कि कांग्रेसियों ने भी। अपने आपको धुरंधर समझने वाले 23 बड़े कांग्रेसी नेताओं ने तो राहुल और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर ही हमला बोल दिया। लड़ना था इस समय मोदी से वे राहुल से लड़ने लगे। राहुल जिस ने अध्यक्ष पद भी छोड़ दिया। उसके खिलाफ एक गुट बनाकर एक्टिव हो गए।

तो राहुल को क्या करना चाहिए? घर, बाहर सब तरफ लड़ना चाहिए? या थोड़े समय कांग्रेस और झूठ के नशे में डूबी जनता को छोड़कर तमाशा देखना चाहिए? जिसको कांग्रेस चलाना हो चलाए। जिस विपक्षी नेता को सड़क पर आकर लड़ना हो लड़े। राहुल कुछ समय अपनी राजनीतिक सक्रियता स्थगित रखें।

जब बाडी लाइन अटैक हो रहा हो तो ओपनिंग के लिए जाना कोई जरूरी है क्या? ब्रेडमेन के लिए सीधे शरीर पर आती बालें खेलना मुश्किल हो गया था। सीधे शरीर पर गेंदे मार रहा इंग्लेंड का बालर लारवुड कह रहा था कि मुझे मैदान में खून टपकता देखकर मजा आता है। तो ऐसे में राहुल को उन बालों को अपने शरीर पर लेने की क्या जरूरत है?  हिन्दु मुसलमान की राजनीति का भी एंटी क्लाइमेक्स आएगा। बाद में लारवुड से भी ज्यादा फास्ट बालर आए। मगर बाडी अटैक और मैदान में गिरता हुआ खून बंद हो गया।

वह समय यहां भी आएगा। हर चीज की एक सीमा होती है। नफरत और झूठ की राजनीति का पर्दाफाश होगा। यही किसान करेगा। क्योंकि भारतीय समाज में किसान से ज्यादा ईमानदार, परोपकारी कोई समुदाय नहीं है। अगर जैसा कि प्रेमचंद की मशहूर कहानी पूस की रात में मुन्नी अपने किसान पति हल्कू से कहती है “ मैं कहती हूं तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो। बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जन्म हुआ है। तुम छोड़ दो अबकी से खेती। मजूरी में सुख से एक रोटी खाने को मिलेगी। किसी की धौंस तो न रहेगी। अच्छी खेती है। मजूरी करके लाओ वह भी उसी में झौंक दो। उस पर धौंस।“ किसान खेती छोड़ दे तो सोचिए क्या होगा! गेहूं और चावल कोरपोरेट की फैक्ट्रियों में बनेगा?

भारत के किसान की तारीफ कृषि में एकमात्र नोबल पाने वाले कृषि बैज्ञानिक नारमन बोरोलाग भी कर चुके हैं। और भारतीय किसान है भी ऐसा ही उदार और निस्वार्थ। कैसी भी हालत में हो उसके गांव, खेत में गया कोई बंदा भूखा नहीं रहेगा। रात में राह भटक कर किसी खेत की मड़िया भी दिख जाए तो वहां खेत की रखवाली कर रहा किसान राहगीर से खाने के लिए पूछेगा। अगर उसके पास कुछ नहीं होगा तो मेहमान के लिए रात में खेत से कुछ नहीं तोड़ने के सिद्धांत से उपर जाकर भुट्टे, या चने तोड़कर भूनकर खिलाएगा। दो सिद्धांतों या कई सिद्धांतों के बीच टकराव की स्थिति में हमारा मध्यम वर्ग अपने स्वार्थ का उसूल पकड़ता है। मगर किसान सामने वाले की मदद का। दो उसूल टकरा रहे हैं। एक सदियों पुराना, खेती का मूल सिद्धांत की रात को

फसल को परेशान नहीं करना चाहिए। दूसरा भूखे को खिलाना। किसान भूखे को खिलाने के उसूल का पालन करेगा।

किसान को छेड़कर सरकार ने अच्छा नहीं किया। जिन्होंने देखा नहीं, वह पढ़ लें कि कैसे भारत में अमेरिका का लाल गेहूं पीएल 480 आता था। 1965 के युद्ध के समय अमेरिका ने भारत पहुंच गए अपने गेहूं से भरे 6 जहाजों को वापस करवा लिया था। इसके बाद ही प्रधानमंत्री बनते ही इन्दिरा गांधी ने हरित क्रांति की। जिन कृषि वैज्ञानिक बोरलाग का जिक्र उपर किया है वे उसी

समय भारत आए थे। और यहां के किसानों द्वारा हरित क्रांति को अपनाने की तत्परता को देखकर ही उन्होंने कहा था कि भारत के किसानों का सहज ज्ञान (कामन सेंस) अनुपम है। तो इन्दिरा के दृढ़ राजनीतिक नेतृत्व और किसानों के सीखने और अपनाने की ललक ने मिलकर ही हरित क्रांति को सफल बनाया था। आज जो अनाज के गोदाम भरे पड़े हैं वह भारत की बहुत बड़ी ताकत है। किसान अगर परेशान हुआ और जैसा कि मुन्नी हल्कू से कह रही थी कि खेती छोड़ क्यों नहीं देते? तो सोचिए अगर किसान इस लाइन पर चला गया तो क्या होगा? पूस आने वाला है। 10 दिन बाद शुरू हो जाएगा। उस ठिठुरती सर्दी में एक रात खेत में गुजारिए और देखिए कैसे किसान रखवाली करता है, कैसे घुटने घुटने ठंडे पानी में खड़ा होकर सिंचाई करता है। किसान ने देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया उसे कारपोरेट का गुलाम मत बनाइए।

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