किसानों से है उम्मीदों के बीज!

जा रहा साल पूरी तरह निराशा का साल बन जाता लेकिन किसान आंदोलन ने उम्मीदों का चिराग जला दिया। वर्ष 2020 ऐसा होगा किसने सोचा था? हालांकि साल के शुरूआत में ही कोविड की खबरें आने लगी थीं। मगर उसके भंयकर परिणामों के बारे में किसी को अनुमान नहीं था। राजनीति में राहुल गांधी और पत्रकारिता में वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास जरूर शुरू से ही इस खतरे की गंभीरता को समझ रहे थे और लगातार चेतावनियां दे रहे थे। मगर किसी ने नहीं सुना। सरकार ने भी नहीं। जब खतरा बढ़ा तो अचानक बिना तैयारी के लाकडाउन लगा। लोगों में भय और घबराहट का माहौल बन गया। मध्यम वर्ग राशन जमा करने लगा। और घबराया मजदूर सड़क पर निकल आया। जैसा कभी नहीं हुआ था वह हुआ। लाखों लोग हजारों किलोमीटर पैदल चले। कई कई दिनों तक, हफ्तों तक।

अर्थव्यवस्था गिरी, नौकरियां गईं। मौतों का तो कोई हिसाब ही नहीं है। कहीं कोरोना से तो कहीं छंटनी के डर से भी। हर तरफ बुरी खबरों की बाढ़ आ गई। ऐसे में सबसे ज्यादा निराश किया मीडिया ने। देश के इतिहास में ऐसा लिजलिजा और निर्लज्ज मीडिया पहले कभी नहीं हुआ। इसने बेशर्मी के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। कोरोना जब शुरू हुआ तो सारा दोष तबलीगी जमात पर डाल दिया। एक के बाद एक सफेद झूठों की कहानी टीवी दिखाने लगा। बाद में अदालतों ने सारे जमातियों को निर्दोष घोषित किया। मगर किसी चैनल ने, मैंने देखा थूकते हुए कहने वाले पत्रकारों ने माफी नहीं मांगी।

ऐसे ही सुशांत सिंह राजपूत के मामले में हुआ। आत्महत्या को हत्या घोषित कर दिया। दो महीने तक टीवी पर हत्या की नई नई थ्योरियां गढ़ते रहे। आखिर में सीबीआई ने एम्स ने भी जब स्पष्ट कर दिया कि यह हत्या नहीं थी तब भी किसी ने रिया सहित उन लोगों से माफी नहीं मांगी जिनकी जिन्दगी इन चैनलों ने बरबाद कर दी। दूसरी तरफ हाथरस में दलित लड़की के गैंगरेप और ह्त्या का मामला था। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कहा। मगर उससे पहले मीडिया ने अनगिनत झूठी कहानियां चलाकर पीड़िता के परिवार पर ही सारा अपराध मढ़ दिया।

वैसे तो पिछले छह साल से मीडिया यही कर रहा है और खुद को गोदी मीडिया कहलाने में भी कोई शर्म महसूस नहीं कर रहा है। मगर इस साल जब देश को इतनी भयंकर महामारी कोरोना से, अर्थव्यस्था की भारी गिरावट से, चीन की घुसपैठ से और अभी खेती किसानी की समस्या से निपटना था उस समय मीडिया का

और पतनशील हो जाना बहुत निराशाजनक साबित हुआ। लोगों का मीडिया से विश्वास पूरी तरह उठ गया। हालांकि पतन और भी बड़े इंस्टिट्यशन का हुआ है। कई बार इंसाफ की आस को झटका लगा। मगर न्याय का चिराग बुझा नहीं। लो टिमटिमाई, प्रकाश कमजोर हुआ मगर उम्मीद का दिया जलता रहा। लोकतंत्र में यह सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। जब तक न्याय की आस है गरीब और कमजोर के सब्र का बांध भी है। जिस दिन न्याय से विश्वास उठा उस दिन लोकतंत्र से भी विश्वास उठा। दुनिया में कहीं भी, कभी भी, कैसी भी शासन पद्धति रही हो वह कायम ही तब रही जब उसमें सबके लिए न्याय की भावना रही। न्याय के लिए विक्रमादित्य का सिंहासन और जहांगीर का घंटा आज भी लोगों के मन में न्याय का विश्वास जगाते हैं। लेकिन यह न्याय अंतिम रास्ता होता है। लोकतंत्र में उससे पहले व्यक्ति प्रेस जिसे आज मीडिया कहने लगे हैं के पास जाता है। और यहां से उसे हमेशा मदद मिली है। अगर आज जनता किसी से सबसे ज्यादा निराश हुई है तो

वह मीडिया है। उसने किसी को नहीं बख्शा। मजदूर, किसान, जवान सबके खिलाफ गया।चीन की घुसपैठ के समय सरकार के बचाव में बेशर्मी से टीवी कहता है कि घुसपैठ रोकना सेना का काम है सरकार का नहीं। सेना पर इस तरह दोष इससे पहले कभी नहीं मढ़ा गया। लेकिन जैसा की कहते हैं कि जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है और उसे  सच साबित किया किसान आंदोलन ने। जाते हुए साल में जिस हिम्मत के साथ किसान खड़ा हुआ उसने साऱी निराशाओं के अंधेरे को छांट दिया। यह स्वत:स्फूर्त आंदोलन इतना व्यापक रूप लेगा यह किसी ने नहीं सोचा था। सरकार चौंक गई। उसने आंदोलन को बदनाम करने की हर चाल चली। खालिस्तानी कहा, माओवादी कहा, विदेशों से सहायता प्राप्त कहा, क्या नहीं कहा। मगर किसानों का आंदोलन

जरा भी नहीं भड़का, न ही शांतिपूर्ण रास्ते से भटका। उल्टा उसने अप्रत्याशित रूप से आरोपों की तोप का मुंह दूसरी तरफ मोड़ दिया। अंबानी और अडानी निशाने पर आ गए। अभी तक खाली राहुल गांधी उनका नाम लेकर क्रोनी कैपटलिज्म का आरोप लगाते थे। मगर उन्हें बहुत समर्थन नहीं मिलता था। लेकिन किसानों ने सीधा अंबानी अडानी को फायदा पहुंचाने के आरोप लगाकर और जियो का बहिष्कार का आह्वान करके पहली बार दोनों को डिफेंसिव बना दिया। लोगों के बीच यह चर्चा होने लगी कि अगर अनाज अंबानी अडानी के कब्जे में पहुंच गया तो वह भी मोबाइल के डाटा की तरह रोज मंहगा होता चला जाएगा। खेती किसानी तबाह हो जाएगी। किसानों का समर्थन बढ़ने लगा। जिससे उसका हौसला भी बढ़ा।

एक महीना से ज्यादा हो गया है मगर किसान खुले में सड़क पर डटा है। आंदोलन में फूट डालने की हर कोशिश नाकामयाब हो गई। मीडिया थक गया। एजेंडा बदलने की उसकी कोशिश पहली बार असफल साबित हुई। हालत यह हो गई कि कई टीवी चैनल इतने एक्सपोज हो गए कि अपना नाम लिखा माइक लेकर वे किसानों के बीच जा नहीं पा रहे। किसान शांतिपूर्ण तरीके से उनसे बात करने से मना कर देते हैं। गो बैक के नारे लगाते हैं। उल्टे उनसे सवाल पूछने लगते हैं। मीडिया पहली बार दबाव में आया है।

किसानों ने अपना अखबार निकाल लिया, ट्राली टाइम्स। अगर आंदोलन लंबा चला तो वे अपना चैनल भी शुरू कर देंगे। यह समानान्तर मीडिया अगर शुरू हो गया तो मुख्यधारा के मीडिया के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा। चुनौतियों के बीच में ही नई मौलिक शुरुआतें होती हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जब सारे अंग्रेजी अखबार अंग्रेजों का साथ दे रहे थे तब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जनता का पक्ष रखने के लिए नेशनल हैराल्ड शुरू किया था। आजादी के आंदोलन में इस अख़बार का ऐतिहासिक योगदान रहा है। आज जब सोशल मीडिया कहे

जाने वाले फेसबुक और ट्विटर का झुकाव भी सत्ता पक्ष की और होने लगा है तो सूचना और जन जागरूकता के नए माध्यमों की खोज ज्यादा जरूरी है।किसान आंदोलन इस तरह दोहरी उम्मीद का प्रकाश स्तंभ बन गया। एक तरफ यह मिथ टूटा कि भक्तों की इस हुआं हुआं में कोई और आवाज उठ ही नहीं सकती। दूसरे यह दिखा कि गोदी मीडिया के एकाधिकार में आंदोलन के नए अख़बार, संभावित चैनल नई राह बना सकते हैं। जा रहे साल की निराशा की धुंध इसी तरह छटेगी कि आने वाला साल उम्मीद का साल बने और उम्मीदों का चिराग हमेशा जलता रहे।

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