परिवार है तो कांग्रेस की आत्मा है!

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क्यों सात साल से निर्विध्न राज कर रही मोदी सरकार और उसका सहयोगी मीडिया सबसे ज्यादा सवाल नेहरू-गांधी परिवार के राजनीतिक वारिस राहुल गांधी से करते हैं? .. प्रधानमंत्री मोदी का जो कांग्रेस मुक्त भारत का नारा था वह दरअसल कांग्रेस को खत्म करने का नहीं है, बल्कि कांग्रेस से परिवार को खत्म करने का है। इसलिए कि जनता के बीच पहचान है।  

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देश की अधिसंख्यक आबादी, जो गरीब है, पिछड़ी है, दलित है और बेआवाज है वह किसकी तरफ उम्मीद भरी निगाह से देखती है? सवाल मुश्किल है। लेकिन अगर आप आजादी के बाद का इतिहास उठाकर देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर उसने एक परिवार, गांधी नेहरू परिवार पर सबसे ज्यादा विश्वास किया है। उसकी उम्मीदें कितनी पूरी हुईं यह थोड़ी अलग बात है मगर उम्मीदों का वह चिराग बुझा नहीं है। इसीलिए सात साल से निर्विध्न राज कर रही मोदी सरकार और उसका सहयोगी मीडिया सबसे ज्यादा सवाल उसी परिवार के राजनीतिक वारिस राहुल गांधी से करते हैं।

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एक तरफ तो पप्पू कहकर राहुल को हल्का, अगंभीर बताने की कोशिश करते हैं, मगर दूसरी तरफ लगातार उनके पीछे पड़े रहते हैं। राहुल का या इस परिवार का डर ऐसा है कि सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि दूसरे राजनीतिक दल भी लगातार कोशिशें करते रहते हैं कि कांग्रेस परिवार मुक्त हो जाए। प्रधानमंत्री मोदी का जो कांग्रेस मुक्त भारत का नारा था वह दरअसल कांग्रेस को खत्म करने का नहीं है, बल्कि कांग्रेस से परिवार को खत्म करने का है। बिना परिवार के कांग्रेस उन्हें बिना हथियार के सेना जैसी लगती है जिसे जब चाहे जैसे दबाया जा सकता है।

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इसलिए कांग्रेस में एक बागी गुट खड़ा किया गया जो अंदर से परिवार का हौसला तोड़े। शल्य की तरह। शल्य कौरव सेना में था और कौरवों के सबसे बड़े महारथी कर्ण का साहस तोड़ने में उस वक्त लगा था जब कर्ण अपनी सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रहे थे। शल्य तो एक था यहां कांग्रेस में कई शल्य खड़े हो गए थे। मीडिया ने इनकी गिनती 23 बताई थी।

तो ऐसे समय में जब बाहर,अंदर सब तरह के विरोधी यह चाहते हों कि कांग्रेस का नेतृत्व परिवार के हाथ से चला जाए तब राहुल को यह सोचना और जानना चाहिए कि देश की वह जनता जिसका जिक्र उपर किया था गरीब और बेआवाज लोग क्या चाहते हैं?

राहुल ने 2007 -08 में देश का व्यापक दौरा किया था। बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, उत्तराखंड कई इलाकों के अंदरुनी बसे गांवों का। नेहरू की तरह भारत एक खोज की जमीनी कोशिश। हालांकि राहुल इससे सहमत नहीं थे कि वे भारत के पुनर्पाठ जैसा बड़ा काम कर रहे हैं। उनका कहना था कि वह बड़ी बात है , नेहरू के पास बड़ी दृष्टि थी, गहरी ऐतिहासिक समझ, मैं तो बस अपने लोगों की स्थिति जानने की कोशिश कर रहा हूं। तो उस

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समय अलग अलग इलाकों के एक जैसे हुए अनुभवों को राहुल को याद करना चाहिए। क्या अनुभव थे? छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके, बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त गांव और कर्नाटक के घने चंदन वन में वीरप्पन के प्रभाव वाले क्षेत्र सब जगह उन्होंने किसी कच्चे घर की दीवार पर तो कहीं टूटे दरवाजे पर चिपके तो कहीं पुराने टिन की बक्सिया में संभाल कर रखे कुछ चित्रों को देखा था। किसके चित्र थे वे जिन्हें बताकर गांव के सीधे सादे लोग कह रहे थे कि इन्होंने हमें जमीन दी। हमारा कर्ज माफ किया। हमारे बच्चे को बंधुआ मजदूरी से छुड़वाया।

वे चित्र थे इन्दिरा गांधी के! लोकप्रियता के बहुत सारे सर्वे होते हैं। मीडिया को जब जब प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता कम होती लगती है वह तत्काल एक सर्वे करवाकर उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ा देता है। कभी कभी तो हास्यास्पद ढंग से भी। अभी जब कोरोना से निपटने में सरकार की कोशिशें असफल दिखीं तो एक न्यूज चैनल फौरन सर्वे लेकर आ गया। इसमें जहां उसने सरकार के प्रयासों को अपर्याप्त बताया, जनता को परेशान बताया मगर वहीं मोदी को देश को सबसे लोकप्रिय नेता बताते हुए बाकी सभी नेताओं, जिनमें भाजपा के नेता भी शामिल थे को नंबर सात और आठ गुना कम बता डाल देते है।

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मतलब सरकार आक्सीजन, अस्पताल में बेड, इंजेक्शन, मरने के बाद गरिमा के साथ अंतिम संस्कार तो दे नहीं पाई और वैक्सीन के लिए लोगों को प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी कीमतों के भरोसे छोड़ दिया। मगर सरकार के मुखिया का कद बढ़ गया। यह अजीब तथ्य है। मगर इन दिनों ऐसे ही चमत्कारी चीजों का दौर है। जहां बाबा रामदेव उच्च शिक्षित डाक्टरों पर सवाल उठाते हों और कंगना रनौत एवं संबित पात्रा स्टार और आदर्श की तरह मीडिया में आते हों!

तो छवियां गढ़ने के ऐसे समय में आप कुछ भी साबित कर सकते हो। सर्वोक्षणों की औपचारिकता की भी जरूरत नहीं है। सुबह ही सुबह आ जाने वाले फारवर्ड व्हाट्सएप मैसेजों के जरिए कोई भी कहानी फैला सकते हो। लेकिन अगर नेतृत्व की लोकप्रियता का कोई ईमानदार सर्वे हो तो विश्व में जैसे सबसे बड़े सेना नायक के नाम पर नेपोलियन का नाम ही हर बार आता है, वैसे ही भारत में इन्दिरा गांधी के अलावा और किसी का नाम नहीं आएगा।

राहुल को यही समझना है कि देश की जनता उनके परिवार को कितना प्यार करती है और कितनी उम्मीदें रखती है। वे एक स्वतंत्र व्यक्ति नहीं हैं। वे तब तक ही थे जब तक राजनीति में नहीं आए थे। मगर राजनीति एक अलिखित करार करती है, खासतौर पर इस परिवार के साथ। जब आ गए हैं तो फिर यहां से जाना संभव नहीं है। उन्हें अपनी मां सोनिया का ही उदाहरण देखना चाहिए। रिटायरमेंट ले लिया था। 10 जनपथ से सारा स्टाफ वापस 24 अकबर रोड कांग्रेस मुख्यालय भेज दिया गया था। मगर वापस कांग्रेस अध्यक्ष बनना पड़ा। 2017 में कांग्रेस मुख्यालय में ही जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं के उत्साह भरे माहौल में राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाला था और सोनिया ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी थी तब किसने सोचा था कि दो साल बाद ही सोनिया को यह जिम्मेदारी अपने कमजोर होते कंधों पर वापस उठाना पड़ेगी। सोनिया 1998 में भी अध्यक्ष बनने की इच्छुक नहीं थीं तब भी पार्टी के दबाव में ही अध्यक्ष बनीं थीं।

इस परिवार का इतिहास ऐसा ही है। त्याग है, बलिदान है और चाहते न चाहते हुए भी नेतृत्व संभालना है। राहुल भी इससे बच नहीं सकते। नेहरू ने 14 और 15 अगस्त 1947 की दरम्यानी रात अपने ऐतिहासिक भाषण में ‘नियति से साक्षात्कार’, (Tryst with destiny ) के वादे की जो बात कही थी वह इस परिवार पर भी लागू होती है। देश, कांग्रेस, जनता का हमेशा साथ निभाने का वादा। यह वादा देश, गांधी और कांग्रेस से एक शताब्दी से भी पहले मोतीलाल नेहरू ने किया था। बहुत कड़ी सज़ा मिली इसकी उन्हें और उनके बाद एक के बाद एक हर पीढ़ी को। ऐसा चरित्र हनन अभियान हुआ कि मोतीलाल की उज्जवल वंशावली से लेकर आज राहुल तक सब पर कीचड़ उछाली गई। लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। त्याग और बलिदान की परंपरा इतनी बड़ी है कि उसे कमजोर करने के लिए झूठ के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

यह झूठ, नफरत, विभाजन की कोशिशें सब चलेंगी। मगर इसके साथ जनता की उम्मीदों का चिराग भी जलता रहेगा। इस परिवार से उम्मीदों का चिराग झूठ, नफरत की हवाओं का शिकार होकर कई बार बुझने बुझने को होता है। जनता नफरत के अंगारों को उम्मीद समझ लपकती भी है मगर हर बार उसके हाथ जलते हैं। प्रेम की लौ क्षीण, मंद होती है मगर राह उसकी रोशनी ही दिखाती है। नफरत की आग कितनी ही तेज जले मगर भविष्य का पथ आलोकित नहीं कर सकती।

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साभार - ऐसे भी जानें सत्य

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