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राजपथ से कर्तव्यपथ का गांधी मार्ग

स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास एक ही हो सकता है। बस सरकारें उसे नई तरह से दर्शा कर सत्ता लाभ में भुनाती रहती हैं। जार्ज पंचम की जगह किसकी प्रतिमा लगनी चाहिए इस पर कई साल बहस चलती रही। सन् 1969 में गांधी शताब्दी मनायी जा रही थी तो महात्मा गांधी का नाम सोचा गया। मगर निर्णय उसके बाद भी कई सालों तक टलता रहा।

समय से बलवान न कोई सत्ता होती है और न ही कोई सत्तावान। जैसे हर जीवी के मनुष्य का समय आता है उसी तरह निर्जीव प्रतिमाओं का भी अंत होता है। समय ही बलवान है जो किंगस्वे ते नाम को राजपथ बनवाता  है, और वही राजपथ फिर कर्तव्यपथ हो जाता है। सन् 1939 में राजपथ पर लगी जार्ज पंचम की मुर्ति की जगह सन् 2022 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा शोभित है। राजपथ जो गुलामी का प्रतीक था आज कर्तव्यपथ हो कर हमें प्रेरित करने के लिए तैयार है। वह आने वाली पीढ़ी को अपना सामाजिक अतीत भुलाने में, और सांस्कृतिक भविष्य संजोने का रास्ता दिखाएगा। मगर इस सब का कल गई गांधी जयंती से क्या लेना-देना हो सकता है? क्योंकि अतीत की याद से और भविष्य की आशा में सत्ता के वर्तमान को समझना भी जरूरी है।

एक अंग्रेजी अखबार में भाजपा के राम माधव ने लिखा की अपना स्वतंत्रता आंदोलन कई तरह व तरीकों से लड़ा गया था। और कहा कि गांधीजी के अहिंसक आंदोलन के अलावा भी अन्य कई नेताओं का योगदान आंदोलन में रहा। उनके लिखे को आगे बढ़ाते हुए मान सकते हैं की नेताजी का सशस्त्र, मालवीयजी का शैक्षणिक, अंबेडकरजी का विधायकी, सरदार पटेल का प्रशासनिक, नेहरु का राजनैतिक और ऐसे ही कई महानुभावों का सांस्कृतिक तौर पर आंदोलन में योगदान रहा।

मगर इन सभी को एकजुटता में साथ चलाने का काम तो गांधीजी ने ही किया था। गांधीजी का ही मानना था कि आंदोलन केवल अंग्रेजों को भारतीय शासकों से बदलने की इच्छा से प्रेरित न रहे, बल्कि अपने सभ्यतागत गौरव पर लौटने के लिए भी प्रेरित हो। सही समय पर सच्चा नेतृत्व ही अहिंसक सद्भाव में सभी को एक कर्तव्यपथ पर ला सकता है। अहिंसक न तो किसी को उपनिवेशी बनाने की इच्छा रखता है, न ही किसी को उपनिवेशी रहने देता है। गांधी जयंती पर अहिंसक सभ्यता के गौरव को भी समझने की कोशिश होनी चाहिए।

स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास एक ही हो सकता है। बस सरकारें उसे नई तरह से दर्शा कर सत्ता लाभ में भुनाती रहती हैं। जार्ज पंचम की जगह किसकी प्रतिमा लगनी चाहिए इस पर कई साल बहस चलती रही। सन् 1969 में गांधी शताब्दी मनायी जा रही थी तो महात्मा गांधी का नाम सोचा गया। मगर निर्णय उसके बाद भी कई सालों तक टलता रहा। महात्मा गांधी के पोते रामचन्द्र गांधी का विचार था कि प्रतिमा की जगह को हर समय के लिए खाली ही छोड़ दिया जाए। खाली इसलिए कि वह भारत के साम्राज्यवाद विरोध के संकल्प का प्रतीक बना रहे।

लंबी चली बहस में महात्मा गांधी की प्रतिमा न लगाने का यह भी एक नज़रिया रहा होगा। क्योंकि दुनिया भर में सत्ता द्वारा लगाई गयी मूर्ति-प्रतिमाओं का हश्र आज सभी के सामने है। सरकारें बदलती हैं तो सड़कों के नाम, प्रतिमाएं, मूर्तियां और इतिहास तक बदला जाता है। सन् 1968 में राजपथ पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान जार्ज पंचम की प्रतिमा को नुकसान पहुंचा था। सन् 1911 में राजधानी बनने पर जिस दिल्ली दरबार के सजने पर ब्रिटेन के राजा-रानी की प्रतिमाएं दिल्ली में लगाई गयी थीं वे आज सभी धूल खा रही हैं।

गांधीजी और नेताजी के बीच मतभेद तो आंदोलन के साधन पर था, साध्य पर नहीं। गांधीजी का अहिंसक और नेताजी का सशस्त्र आंदोलन दोनों के अपने तरीके थे। उसको मनभेद कैसे मान लें? हिंसा भी लंबे समय तक नहीं चलाई जा सकती है। नेताजी ने ही गांधीजी को “राष्ट्र के पिता” कह कर संबोधित किया था। गांधीजी ने नेताजी को “राष्ट्रप्रेम का युवराज” माना। मगर आजादी के पचहतर साल बाद इस मतभेद का आज क्या लेना-देना हो सकता है? सिर्फ नए प्रतिमान गढ़ कर जनता तो नए जुमलों से भरमाना और सत्ता का खेल खेलते रहना।

जनता को अपना सांस्कृतिक इतिहास किसी सत्ताकांक्षी नेता या पार्टी से नहीं समझना चाहिए। जार्ज पंचम से लेकर तो महात्मा गांधी तक की प्रतिमाओं का इतिहास दुनिया भर में खूब देख समझ लिया गया है। गांधी के विचार को गोली नहीं मारी जा सकती। राजपथ को कर्तव्यपथ कर देने भर से राज करने निकली सत्ता कर्तव्य करने लगेगी, इसकी गारंटी कौन लेगा? सत्य और अहिंसा पर विकसित भारत ही विश्वगुरु बन सकता है।

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