सरकार : कोरोना की पहली शिकार..!

देश की नजर कोरोना पर तो मध्यप्रदेश में कमलनाथ दिग्विजय सिंह का याराना चर्चा में , जिन्होंने अपनी सरकार बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। महाराजा के कांग्रेस छोड़ देने के बाद नाथ और राजा ने कोरोना को महामारी बताकर सियासी हित भी साधने की खूब कोशिश की.. अच्छी बात है कि कोरोना भारत के कई राज्यों में पैर पसार चुका लेकिन मध्यप्रदेश में ऐसा कुछ भी नहीं, जबकि समीपवर्ती छत्तीसगढ़ में भी मरीज की शिनाख्त हो चुकी लेकिन यहां कोरोना से ज्यादा रोना सत्ता बचाने और गिराने का पिछले एक पखवाड़े से मचा हुआ है।

विधायकों को भरोसे में लेकर उनसे कहा जा रहा एक दूसरे को रोकोना, पार्टी छोड़कर जाने मत दो, जिससे सदन में बहुमत सिद्ध करने में आसानी हो.. अब सुप्रीम फैसले के बाद जिसको रोना की आड़ में विधानसभा स्थगित कर दी गई थी उसके फ्लोर पर बहुमत सिद्ध करने की चुनौती कमलनाथ सरकार के सामने होगी। ऐसे में अल्पमत की सरकार जो अतिरिक्त विधायकों के समर्थन से समाचार का कार्यकाल पूरा कर चुकी क्या अपनी पार्टी के कुछ विधायकों द्वारा की गई बगावत और इस्तीफे के बाद समय से पहले दम तोड़ कर देगी। तो क्या सियासी कोरोना की मध्यप्रदेश में पहली शिकार कमलनाथ सरकार होगी, या फिर महामारी की तरह सियासी चुनौतियों से भी कमलनाथ बाहर निकल कर अपनी प्रबंधन क्षमता का लोहा मनवाएंगे।

यह वह सवाल है जिसका जवाब शुक्रवार शाम 5:00 बजे के पहले मिलना तय है.. क्या नहीं सस्पेंस खत्म होगा और तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी सरकार चलेगी या फिर नई अस्तित्व में आएगी..कमलनाथ सरकार करीब सवा साल के अपने कार्यकाल में पहले सबसे बड़े और निर्णायक संकट से जूझ रही है.. जिसमें कहीं ना कहीं मुख्यमंत्री कमलनाथ की दूरदर्शिता, प्रबंधन क्षमता और नेतृत्व के साथ साख को भी कसौटी पर लगा दिया है.. अपने सीमित कार्यकाल में विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के निर्वाचन औरसदन में विशेष मौके पर भाजपा में सेंध लगाकर वह अपनी सरकार का बहुमत सिद्ध कर चुके हैं। लेकिन सीधी और बड़ी चुनौती उन्हें पहली बार कांग्रेस के अंदर से मिली है, ये वो विधायक जो बागी हो चुके और जिनकी निष्ठा ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से दूर और भाजपा के करीब लाकर खड़ी कर चुकी है।

कमलनाथ जिन्होंने भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी और शरद कोल को कांग्रेस का समर्थन करने और भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए लगभग तैयार कर रखा है.. उसे भरोसा है कि कमलनाथ के व्यक्तिगत संबंधों के चलते भाजपा के आधा दर्जन से ज्यादा विधायक क्रॉस वोटिंग कर अपनी पार्टी को संकट में डाल कमलनाथ के खैवनहार बने रहेंगे.. ये उन विधायकों के लिए भी अग्निपरीक्षा साबित होने वाली है.. कौन किससे उपकृत है। किससे नाराज और कौन एन टाइम पर हृदय परिवर्तन के साथ पाला बदल सकता है.. इसका इंतजार फ्लोर टेस्ट तक करना ही होगा.. सरकार में रहते कमलनाथ के लिए यदि नए फायदे उम्मीदों की किरण बने हुए हैं। तो सरकार में रहते अपनों की नाराजगी उन्हें चैन से सोने भी नहीं दे रही।

कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह और सहयोगी मंत्रियों के साथ मिलकर सरकार बचाने के सारे विकल्पों को रणनीति के साथ आगे बढ़ाया.. लेकिन सुप्रीम फैसले से उन्हें बड़ा झटका तब लगा जब बेंगलुरु पहुंचे 16 विधायकों को विधानसभा में आने और नहीं आने की स्वतंत्रता दे फैसला उन पर छोड़ दिया.. 7 सूत्री सुप्रीम फैसले में राज्यपाल की गाइड लाइन से जुड़ी अपेक्षाएं भी साफ देखी जा सकती हैं.. ऐसे में आंकड़े बताते हैं कि भाजपा के सामने यदि चुनौती अपना कुनबा एकजुट रखने की तो कांग्रेस के लिए बिना भाजपा में सेंध लगाए अतिरिक्त समर्थन जुटाना उससे भी बड़ी चुनौती साबित होने वाली है..आखिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ मध्यप्रदेश के सत्ता संघर्ष का सस्पेंस खत्म होने का समय निर्धारित हो चुका है।

3 दिन की लंबी एक्सरसाइज के बाद सुप्रीम फैसला सामने आया और इसके साथ ही यह तय हो जाएगा कि कमलनाथ सरकार बहुमत में है या फिर अल्पमत में अंततोगत्वा इसका फैसला विधानसभा के फ्लोर पर ही होगा.. यानी फ्लोर टेस्ट जिससे अभी तक कमलनाथ और उनकी सरकार सीधे बचने की कोशिश कर रहे थे.. वो जिम्मेदारी शुक्रवार शाम 5 बजे तक निभाने की गाइडलाइन सामने आ चुकी है.. ये सब कुछ उन आंकड़ों पर निर्भर है.. जो या तो कांग्रेस से इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं.. इन 22 में से 6 पूर्व मंत्रियों के इस्तीफे अध्यक्ष स्वीकार कर चुके हैं।

जबकि शेष 16 के लिए न्यायालय ने फ्लोर टेस्ट में शामिल होने और ना होने का रास्ता विकल्प के साथ खोल दिया है.. कांग्रेस के बागी विधायकों के बाद अभी तक सरकार को अतिरिक्त समर्थन दे रहे विधायकों का भी महत्व बढ़ गया है.. चाहे फिर वह सपा, बसपा और निर्दलीय ही क्यों ना हों.. इनमें से कौन सदन में मौजूद रहेगा.. कौन विश्वास मत का बायकाट करेगा तो कौन क्रॉस वोटिंग कर दूसरे पाले में खड़ा नजर आ सकता है। इसकी मोर्चाबंदी को लेकर भाजपा और कांग्रेस अपने विधायकों के साथ नए सिरे से संवाद स्थापित कर रही है.. तेजी से बदलते घटनाक्रम पर जब सबकी नजर फ्लोर टेस्ट पर है

तब दिल्ली में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के आवास पर ज्योतिरादित्य सिंधिया धर्मेंद्र प्रधान के बीच मंत्रणा हुई तो यहां शिवराज सिंह चौहान विधायकों और अपने सहयोगियों से संवाद कर सदन में फ्लोर मैनेजमेंट को लेकर चिंतन मंथन करते रहे.. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने विधायक दल की बैठक में भाग लिया जो सहयोगी मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के आवास पहुंचे.. विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात ना कर कमलनाथ ने कानूनी विशेषज्ञों से सलाह मशवरा को प्राथमिकता दी कांग्रेस सदन में अतिरिक्त विधायकों के समर्थन को लेकर माथापच्ची देर रात तक करती रही ।

जबकि भाजपा में खुशी का माहौल शिवराज एक बार फिर सियासत से ज्यादा खेल के मैदान में नजर आए उन्होंने अन्याय की हार सुनिश्चित बताई तो नरोत्तम मिश्रा का शायराना अंदाज भी खूब देखने को मिला जिन्होंने कहा कि जिस दिए में तेल होगा वही जलेगा रात भर.. देखना दिलचस्प होगा किस रोड टेस्ट मध्य प्रदेश की सियासत को कौन सी दिशा देता है.. कमलनाथ और उनकी सरकार जिस फ्लोर टेस्ट से दूरी बनाती हुई नजर आ रही थी वह संभव नहीं हुआ तो किसी ने खूब कहा कि ये तो होना ही था।

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