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विवेकशील मुसलमान आगे आएं

विवेकशील मुसलमानों को आगे आना चाहिए। उन के जानकार सारा इतिहास बेहतर जानते हैं। क्योंकि भारी मात्रा में सभी तथ्य मुस्लिमों द्वारा लिखी व्यवस्थित तारीखों  में ही मिलते हैं। जो दुनिया के तमाम अभिलेखागारों, पुस्तकालयों में पांडुलिपियों, पुस्तकों,मूल एवं अनुवाद दोनों रूपों में विश्व की सभी बड़ी भाषाओं में उपलब्ध हैं। औरंगजेब का ही उदाहरण लें,तो दिल्ली तख्त पर काबिज होने के तेरह साल पहले ही उस ने बुत-शिकन रूप में शुरू किया था।

ज्ञानवापी सर्वे के बाद देश भर में सरगर्मी विचारणीय है। उस में सामने आई बात पहले ही जगजाहिर थी। इस्लामी आक्रमणकारियों के क्रिया-कलाप के तथ्यों पर कभी विशेष विवाद नहीं रहा। तथ्य सदियों से जगजाहिर  हैं। हाल में वामपंथी इतिहासकारों ने लीपापोती करने की कोशिश की, किन्तु विफल रहे। बल्कि इतिहास झुठलाने की कोशिशों ने उलटे मामला बिगाड़ा। मुसलमानों को अड़ने के लिए उकसाया गया,  और हिन्दुओं में आक्रोश बढ़ा।

अभी कुछ मुसलमानों ने कहा है कि यदि ज्ञानवापी मूलतः विश्वेश्वर मंदिर था तो वह हिन्दुओं को सौंप देना चाहिए। यही बात आरंभ में  अयोध्या पर भी कुछ मुस्लिमों ने कही थी। किन्तु उसे राजनीतिक स्वार्थ में दलीय छीन-झपट बना दिया गया। अंततः जान-माल और समय की नाहक बर्बादी हुई।

सच यह है कि घाव छिपाने से कोई स्वस्थ नहीं होता। उसे सामने लाकर ही उपचार होता है। इस में विवेकशील मुसलमानों को आगे आना चाहिए। उन के जानकार सारा इतिहास बेहतर जानते हैं। क्योंकि भारी मात्रा में सभी तथ्य मुस्लिमों द्वारा लिखी व्यवस्थित तारीखों  में ही मिलते हैं। जो दुनिया के तमाम अभिलेखागारों, पुस्तकालयों में पांडुलिपियों, पुस्तकों,मूल एवं अनुवाद दोनों रूपों में विश्व की सभी बड़ी भाषाओं में उपलब्ध हैं।

औरंगजेब का ही उदाहरण लें,तो दिल्ली तख्त पर काबिज होने के तेरह साल पहले ही उस ने बुत-शिकन रूप में शुरू किया था। गुजरात पर प्रसिद्ध इतिहास पुस्तक मीरत-ए-अहमदी के अनुसार सरसपुर के पास जवाहरात व्यापारी सीतलदास द्वारा बनवाया गया चिन्तामन मंदिर था। शहजादा औरंगजेब के हुक्म से 1645 ई. में उसे कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में बदल दिया गया। बादशाह बन जाने के बाद उसे  व्यवस्थित आम नीति बना डाली।  उस पर प्रमाणिक इतिहास मासिर-ए-आलमगीरी में दर्ज है,‘‘जिल कदा 1079 के 17वें रोज (9 अप्रैल 1669) मजहब के रक्षक बादशाह सलामत के कानों तक बाद पहुँची कि थत्ता, मुलतान और खासकर बनारस में बेवकूफ ब्राह्मण अपने स्कूलों में फूहड़ चीजें पढ़ाते हैं। वह दुष्टता भरी शिक्षा प्राप्त करने हिन्दू और मुस्लिम दोनों तरह के छात्र दूर-दूर से आते हैं। इसलिए बादशाह ने हुक्म दिया कि काफिरों के उन स्कूलों और मंदिरो को सख्ती से खत्म कर दें। रबीब-उल अखीर के 15वें (सितंबर अंत) को बादशाह को रिपोर्ट पेश की गई कि हुक्म की तामील में सरकार के अमलों  ने बनारस में बिसनाथ के मंदिर को तोड़ कर खत्म कर दिया है।’’

कलीमात-ए-तैयबात के अनुसार,औरंगजेब ने जुल्फिकार खान व मुगल खान को लिखा था कि ‘‘मंदिर तोड़ना किसी भी समय संभव है, क्योंकि यह अपनी जगह से चल के कहीं नहीं जा सकता।’’ हालाँकि महाराष्ट्र के मंदिरों की मजबूती से औरंगजेब झल्लाया हुआ था। रुहुल्ला खान को भेजा उस का संदेश कलीमात-ए-औरंगजेब में उदधृत है, ‘‘इस देश के मकान अत्यधिक मजबूत हैं और केवल पत्थर व लोहे से बने हैं। मेरे अभियानों के दौरान कुल्हाड़ी-चलवाने वाले अधिकारियों के पास काफी आदमी और समय नहीं होता था कि रास्ते में दिखते काफिरों के मंदिर तोड़ सकें। तुम एक दारोगा नियुक्त करो जो बाद में समय लगाकर सब को नींव तक खोद कर पूरी तरह खत्म कर दे।’’

अपने मुन्तखाब-उल-लुबाव में खाफी खान ने दर्ज किया: ‘‘गोलकुंडा पर कब्जा के बाद बादशाह ने अब्दुर्रहीम खान को हैदराबाद का अधिकारी नियुक्त किया। उसे हुक्म था कि सारा कुफ्र चलन बंद कराए,और मंदिरों को तोड़कर वहाँ पर मस्जिदें बनवाए।’’ यह वर्ष 1687 ई. की बात है।

वस्तुतः यही परंपरा पीछे कई सदियों से चल रही थी।  12 वीं सदी में मुहमम्द घूरी का कारनामा देखिए। कवि, इतिहासकार  हसन निजामी ने अपनी ताज-उल-मासीर  में  खुशी जताते  हुए लिखा, ‘‘जब तक सुलतान अजमेर में रहा, उस ने मूर्ति मंदिरो की नींव और खम्भे तोड़ डाले और उन की जगह पर मस्जिदें व मदरसे बनवाए,और इस्लामी  कानून स्थापित किए। …  बनारस जो हिन्द देश का केन्द्र है, वहाँ उन्होंने एक हजार मंदिर तोड़े और उन की नींव पर मस्जिदें खड़ी की।’’

इब्न असीर की 13वीं सदी की क्लासिक पुस्तक कामिल-उत-तवारीख  के अनुसार, ‘‘वाराणसी में काफिरों का जबर्दस्त कत्लेआम हुआ, बच्चों स्त्रियों के सिवा किसी को नहीं छोड़ गया।  पुरुषों का संहार इतना चलता रहा कि जमीन थक गई।’’ स्त्रियाँ और बच्चे इसलिए बख्शे गए ताकि उन्हें गुलाम बना सारी इस्लामी दुनिया में बेचा जा सके। सारनाथ में बौद्ध परिसर भी ध्वस्त कर के  भिक्षुओं का कत्ल कर दिया गया।

वह परंपरा 8वीं सदी में मुहम्मद बिन कासिम से शुरू होकर 17वीं सदी में औरंगजेब और उस के बाद भी बदस्तूर चल रही है। जहाँ भी इस्लामी ताकतों को मौका मिला या मिलता है। सो, गत हजार वर्षों में मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने ही इस्लामी अत्याचारों का जो पैमाना दिया है, वह हरेक माप से बाहर है। अपवादों को छोड़, मुस्लिम शासक और सरदार हिन्दू प्रजा के लिए पूरे राक्षस ही रहे थे जो किसी अपराध से नहीं हिचकते थे।

किन्तु ध्यान देने की बात उन सबों में जिहाद का समरूप तरीका था। जिस में इस्लाम का गाजी 1. काफिरों की भूमि पर हमला करता है; 2. जीत  कर अधिकाधिक संख्या में काफिर पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों, खासकर ब्राह्मणों का कत्ल करता है; 3. बचे हुओं को गुलाम बना कर बेचने के लिए बंदी बनाता है; 4. हर जगह और हर व्यक्ति को लूटता है; 5. सभी मूर्ति-मंदिरों  को  तोड़ता और वहाँ पर मस्जिदें बनाता है; तथा 6. देव-प्रतिमाओं को अपवित्र करता है, जिन्हें आम चौराहे पर फेंक देता या मस्जिद जाने के रास्ते की सीढ़ियाँ बनवाता है।

साथ ही यह तथ्य भी नोट करने योग्य है कि उपर्युक्त तरीका हू-ब-हू 1. कुरान में बताया गया है; 2. प्रोफेट मुहम्मद द्वारा अपने जीवन-काल में किया गया,और दूसरों को करने के लिए कहा गया; 3. इस्लामी साम्राज्यवाद के प्रथम पैंतीस वर्षों में चार सब से मजहबी खलीफाओं द्वारा अनुकरण किया गया; 4. हदीस और सैकड़ों अन्य व्याख्याओं में सविस्तार बताया गया; 5. हरेक जमाने में और आज तक उलेमा और सूफियों द्वारा वह सब  सही ठहराया गया; तथा 6. उन का पालन उन तमाम मुस्लिम शासकों सरदारों द्वारा किया गया, जो इस जीवन में सत्ता-शोहरत चाहते थे, फिर जन्नत में हूरियाँ और कमसिन लड़के चाहते थे।

यह सब सचेत रूप से हुए काम थे। हर कहीं  वे एक समान इसीलिए मिलते हैं, क्योंकि वह एक सुगठित मतवाद द्वारा निर्दिष्ट पैटर्न से प्रेरित थे। सारी बातें स्वयं इस्लामी स्त्रोतों से ही प्रमाणित हैं।

अब ज्ञानवापी विवाद का  संकेत है कि हिन्दू तीर्थो, स्थलों पर बनाई मस्जिदों, दरगाहों, आदि इमारतों के मामले का सामना करना ही होगा। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पतन बाद उन की बनाई इमारतों को हम ने जैसा उचित समझा, वैसा व्यवहार में लाया या खत्म किया। इस्लामी साम्राज्यवाद  की बनाई चीजों के प्रति वही भाव और भी  सुसंगत है।

इस्लामी साम्राज्यवाद की इमारतें घोर अपमानजनक हैं, क्योंकि वह जानबूझ कर हिन्दू धर्म को अपमानित करने (जो अंग्रेजों ने कभी न किया)  के लिए ही बनाई गई थीं। सदियों पहले हजारों मील तक खाली जमीनें होती थीं। तब भी  खाली जमीनों पर मस्जिदें, मदरसे, दरगा बनाने के बदले  हमेशा चुन-चुन कर हिन्दू मंदिरों, तीर्थों को ध्वस्त कर वहीं मस्जिदें बनाना क्रूर अपमान की  मंशा से हुआ था। अतः उन स्थानों को वापस लेना हिन्दू समाज का अधिकार व कर्तव्य  है। वरना  इस्लामी साम्राज्यवाद का दिया घाव रिसता रहेगा, और आगे भी नए घाव खाने की स्थिति बनी रहेगी।

यह विवेकशील मुसलमान समझते हैं। जिन्हें आगे आकर न्यायोचित करना चाहिए। मुसलमान स्वयं इस्लाम द्वारा प्रथम पीड़ितों के वंशज हैं। फिर  जब कहा जाता है कि गजनवी, औरंगजेब, आदि के दुष्ट  कारनामों के लिए आज के मुसलमान जिम्मेदार नहीं, तो उन दुष्टता-प्रतीकों को बचाने के लिए भी उन्हें नहीं अड़ना चाहिए। अयोध्या, मथुरा, काशी, भोजशाला, आदि हिन्दू तीर्थों पर बनाई गई मस्जिदें धर्म  नहीं, राजनीतिक दबदबे के लिए थीं। इसलिए भी उन्हें हिन्दुओं को वापस करना सच्चा धर्म-कार्य होगा।

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

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