nayaindia Hariyali Teej and Hartalika Vrat हरियाली तीज और हरतालिका व्रत
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हरियाली तीज और हरतालिका व्रत

Hindu

हरतालिका व्रत को श्रावणी तीज, कजली तीज और हरतालिका तीज या तीजा भी कहते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विशेष महत्व होता है इसलिए इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन किए जाने का विधान है। पुराणों के अनुसार इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। मान्यता यह भी है कि इस दिन को हरतालिका इसीलिए कहते हैं कि पार्वती की सहेली उनका हरण कर घनघोर जंगल में ले गई थी। हरत अर्थात हरण करना और आलिका अर्थात सहेली। इसलिए भी इसे हरतालिका नाम से जाना जाता है।

31 जुलाई- हरियाली तीज

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन अविवाहित कुंवारी (कुमारी) कन्याओं व सौभाग्यवती स्त्रियों के द्वारा हरतालिका व्रत मनाये जाने की परिपाटी है। हरतालिका व्रत को श्रावणी तीज, कजली तीज और हरतालिका तीज या तीजा भी कहते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन मनपसन्द वर पाने के लिए इस व्रत में गौरी-शंकर की पूजा करती हैं और उनसे अखंड सौभाग्य का वर मांगती हैं। यह व्रत अत्यंत कठिन है, और इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है। लोक मान्यता यह है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं।

पौराणिक मान्यतानुसार सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। माता पार्वती ने जंगल में निर्जला रहकर और पत्तियां चबाकर व्रत किया और तीज के दिन शिव को पति के रूप में पाया था। शिव जैसा वर पाने की आकांक्षा और अपने सौभाग्य को अखंड रखने के लिए स्त्रियां श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन इस व्रत को करती हैं। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं, और केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी-शंकर की प्रतिमा स्थापित करके विशेष रूप से गौरी−शंकर का पूजन करती हैं, और पार्वती को सुहाग का सारा सामान चढ़ाती हैं । व्रत करने वालियों के लिए उस रात्रि शयन का निषेध है। इसलिए रात्रि में भजन कीर्तन के साथ रात्रि जागरण करते हुए शिव- पार्वती की विवाह की कथा सुनकर प्रातः काल स्नान करने के पश्चात् श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक किसी सुपात्र सुहागिन महिला को श्रृंगार सामग्री ,वस्त्र ,खाद्य सामग्री ,फल ,मिष्ठान्न एवम यथा शक्ति आभूषण का दान करना चाहिए। इस व्रत की पात्र कुंवारी कन्यायें या सुहागिन महिलाएं दोनों ही हैं परन्तु एक बार व्रत रखने के बाद जीवन पर्यन्त इस व्रत को रखने की बाध्यता है ।

यदि व्रती महिला गंभीर रोगी हालात में हो तो उसके वदले में दूसरी महिला अथवा उसके पति द्वारा भी इस व्रत को रख सकने का पौराणिक विधान है। इस संबंध में हमारे पौराणिक ग्रन्थों में इसके लिए सधवा-विधवा सबको आज्ञा दी गई है। खास तौर पर नवविवाहित स्त्रियों के लिए विवाह पश्चात पड़ने वाले पहले श्रावण त्योहार का विशेष महत्व होता है और वे पूरे मनोयोग और विधि-विधान के साथ इस मास में आने वाले हरतालिका व्रत को करती हैं। उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में तीज का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। खासकर राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में महिलाएं इसे भावपूर्ण तरीके से मनाती हैं। वे दिन में व्रत रखती हैं, संध्याकाल पूजन करती हैं और रात्रि जागरण के साथ इस व्रत को पूर्णता देती हैं। इसी त्योहार को दूसरी ओर बूढ़ी तीज भी कहा जाता हैं। इस दिन सास अपनी बहुओं को सुहागी का सिंधारा देती हैं।  इस व्रत को करने से कुंआरी युवतियों को मनचाहा वर मिलता है और सुहागिन स्त्रियों के सौभाग्‍य में वृद्धि होती है तथा शिव-पार्वती उन्हें अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान देते हैं।

भारतीय परम्पराओं के अनुसार हरतालिका तीज को पर्वों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। श्रावणी तीज के साथ ही भारतीय पर्वों का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो होली पर्व तक निरंतर चलता है। हरतालिका तीज पर स्त्रियां निर्जला व्रत करती हैं। हाथों में नई चूड़ियां, मेहंदी और पैरों में आलता लगाती हैं और नए वस्त्र धारण कर उल्लास से व्रत करती हैं। इस दिन विवाहित स्त्रियां अपने नैहर अर्थात पीहर (मायके) से आए वस्त्र धारण करती हैं, और श्रृंगार सहित भगवान शंकर और मां पार्वती की पूजा करती हैं। पूजन के अंत में तीज की कथा सुनी जाती है कि किस तरह मां पार्वती ने कष्ट सहकर शंकर को पति रूप में प्राप्त किया। तीज की रात स्त्रियां सामूहिक रूप से पूजन करने के पश्चात रात्रि जागरण भी करती हैं। तीज पर सामूहिक रूप से पूजन करने का एक महत्व यह भी है कि इस तरह स्त्रियां आपस में एक-दूसरे से घनिष्ठता के साथ जुड़ भी पाती हैं। तीज के दिन तीज मिलन का आयोजन भी आपसी जुड़ाव बनाने का ही एक प्रयोजन है। महिलाएं गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं, हास-परिहास करती हैं। इस तरह वे हंसी-खुशी से तीज का उत्सव मनाती हैं। राजस्थान में तीज पर्व का विशेष महत्व है और इस दिन स्त्रियां दूर देश गए अपने पति के लौटने की कामना करती हैं। अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं। मां पार्वती की सवारी बड़ी ही धूमधाम से निकाली जाती है। हरियाली तीज के लिए अक्सर विवाहित लड़कियां ससुराल से मायके आ जाती हैं। इस त्योहार पर वे हाथों में मेहंदी रचाती हैं। रंग-बिरंगी चूड़ियां पहनती हैं। नवविवाहित स्त्री के लिए उसके ससुराल से उसके लिए सिंगार आता है। तीज पर वृक्ष पर झूला डालकर झूलने की परंपरा भी रही है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार तीज के व्रत के प्रताप से ही माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। कथा के अनुसार हिमाचल की कन्या पार्वती ने मौसम की प्रतिकूलताओं की परवाह किए बिना, सूखे पत्ते चबाकर, निर्जला रहकर शिव को पति रूप में पाने के लिए व्रत किया। इस कठिन व्रत को देख नारदजी भगवान विष्णु का विवाह प्रस्ताव लेकर हिमाचल के घर पहुंचे। हिमाचल ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकृति दे दी। लेकिन जब पार्वती को इस बात की सूचना मिली तो वे दुखी हो गई। कारण यह था कि वह मन ही मन शिव को अपना पति मान चुकी थीं। पार्वती के दुःख को देख उनकी सहेली चिंतित हो उठी और उस सहेली ने सुझाव दिया कि वह उन्हें घनघोर वन में छुपा देगी, जहाँ वह शिव को वर रूप में पाने के लिए आराधना कर सकती हैं। बियाबान जंगल में भाद्रपद तृतीय शुक्ल को पार्वती ने रेत से एक शिवलिंग बनाकर पूजन किया और भगवान भोलेनाथ से उन्हें अपने वर के रूप में मांगा। अंतत: पिता भी पार्वती की इच्छा के सम्मुख झुके और शिव से उनके विवाह के लिए सहमत हुए। कथाओं के अनुसार  पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर श्रावणी तीज के दिन ही शिव ने उन्हें अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था इसलिए कुंवारी कन्याएं शिव जैसा वर पाने की कामना से हरतालिका तीज व्रत करती हैं और विवाहित स्त्रियां अखंड सौभाग्य पाने के लिए।

लोक मान्यतानुसार सुहागिनों के लिए सबसे बड़े पर्वों में से एक हरतालिका व्रतमें भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विशेष महत्व होता है इसलिए इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन किए जाने का विधान है। पुराणों के अनुसार इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवी पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया और वरदान में उन्हें ही मांग लिया। मान्यता यह भी है कि इस दिन को हरतालिका इसीलिए कहते हैं कि पार्वती की सहेली उनका हरण कर घनघोर जंगल में ले गई थी। हरत अर्थात हरण करना और आलिका अर्थात सहेली। इसलिए भी इसे हरतालिका नाम से जाना जाता है। इस दिन विशेष रूप से गौरी−शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो स्त्री पूरे विधि-विधान से इस व्रत को संपन्न करती है, वह इस व्रत के प्रताप से सफल पूर्वक अखंड सौभग्य के साथ पति के साथ लम्बी आयु जीते हुए शिवलोक को जाती है।

हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात् दिन-रात के मिलने का समय। संध्या के समय स्नान करके शुद्ध व उज्ज्वल वस्त्र धारण कर पार्वती तथा शिव की सुवर्णयुक्त (यदि यह संभव न हो तो मिट्टी की) प्रतिमा बनाकर विधि-विधान से पूजा करना चाहिए। बालू रेत अथवा काली मिट्टी से शिव-पार्वती एवं गणेशजी की प्रतिमा अपने हाथों से बनाना चाहिए । इसके बाद सुहाग की पिटारी में सुहाग की सारी सामग्री सजा कर इन वस्तुओं को पार्वती को अर्पित करना चाहिए ।शिव को धोती तथा अंगोछा अर्पित करने के पश्चात सुहाग सामग्री किसी ब्राह्मणी को तथा धोती-अंगोछा ब्राह्मण को दे देना चाहिए । इस प्रकार पार्वती तथा शिव का पूजन-आराधना कर हरतालिका व्रत कथा सुनना चाहिए। फिर सर्वप्रथम विघ्न विनाशक गणेश की आरती, फिर शिव और तत्पश्चात माता पार्वती की आरती करना चाहिए । तत्पश्चात भगवान की परिक्रमा कर रात्रि जागरण करके सुबह पूजा के बाद माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाना चाहिए । ककड़ी-हलवे का भोग लगा फिर ककड़ी खाकर उपवास तोड़ना चाहिए, अंत में समस्त सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी या किसी कुंड में विसर्जित कर देना चाहिए।

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