हाथरस मामला: कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना

हाथरस घटनाक्रम में जिस प्रकार रोज नए-नए खुलासे हो रहे है और संबंधित दोनों पक्षों की ओर से दावे किए जा रहे है- उसने मामले को पेचीदा बना दिया है। देशभर में इस दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय घटना के खिलाफ जनआक्रोश है। मामले में विपक्षी दलों की आक्रमकता किसी से छिपी नहीं है। मीडिया भी उग्र रूप से इस घटना की रिपोर्टिंग भी कर रहा है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि बलात्कार जैसा घिनौना अपराध सभ्य समाज के लिए कलंक है।

इस बीभत्स कांड में तीन बातें तो स्पष्ट है। पहला- अपराध घोर जघन्य था। दूसरा- सरकार अपराधियों को सख्त से सख्त सजा और पीड़ित परिवार को दिलाने हेतु हरसंभव प्रयास कर रही है। तीसरा- राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक वर्ग, जो दशकों से भारत को कई टुकड़ों में खंडित करने और हिंदू समाज को बांटने का प्रयास कर रहा है- वह हाथरस की दुर्भाग्यपूर्ण घटना का उपयोग अपने एजेंडे की पूर्ति हेतु करने में व्यस्त है।

इस निंदनीय घटना की चर्चा करते हुए बार-बार पीड़िता और अभियुक्तों की जातीय पहचान पर विशेष बल दिया जा रहा है। यह विडंबना है कि जिस देश में यह कहा जाता हो- आतंक किसी मजहब या जाति से जुड़ा नहीं होता, आतंकवादियों की कोई मजहबी या जातीय पहचान नहीं होती और वह केवल एक आतंकवादी होता है- उस देश में एक बलात्कार के आरोपियों की जाति को लगातार महत्व दिए जाने का उद्देश्य क्या है?

यह स्थिति तब है, जब हाथरस घटनाक्रम में उत्तरप्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने वही कदम उठाए हैं- जिसकी मांग विपक्षी दल, समाज के प्रबुद्ध वर्ग और स्वघोषित सामाजिक कार्यकर्ता कर रहे थे। 29 सितंबर को पीड़िता के दम तोड़ने से पहले ही चारों आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए थे। लापरवाही बरतने के आरोपी पुलिसकर्मियों (अधिकारी सहित) को योगी सरकार निलंबित कर चुकी है। जांच हेतु पहले विशेष जांच दल का गठन किया, फिर प्रदेश सरकार की अनुशंसा पर सीबीआई जांच भी प्रारंभ हो गई। यहां तक, योगी सरकार सेवारत न्यायाधीश की निगरानी में सीबीआई जांच की भी वकालत कर चुकी है। जान को खतरे की आशंका के कारण पीड़ित परिवार को कड़ी सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है।

देश में एक विकृत वर्ग है, जिसका चिंतन विकृत है और स्वयं को वाम-उदारवादी और सेकुलरवादी कहलाना अधिक पसंद करता है- वह हाथरस मामले में जानबूझकर मृतक पीड़िता को “दलित युवती” और चारों आरोपियों को “उच्च-जाति के युवक” के रूप में संबोधित कर रहे है। मीडिया (अंतरराष्ट्रीय मीडिया सहित) का एक खेमा भी हाथरस की बेटी को न्याय दिलाने हेतु अपनी रिपोर्टिंग और आलेखों में इन शब्दावलियों का उपयोग मुखरता के साथ कर रहा है। क्या यह सब पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने हेतु है?- नहीं।

इस समूह का वास्तविक उद्देश्य किसी पीड़ित, शोषित या वंचित को “न्याय” दिलाना या उसके प्रति सहानुभूति रखना नहीं, अपितु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का “वैचारिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत” विरोध करते हुए भारत की छवि को शेष विश्व में कलंकित करना है। यह वर्ग अपने भारत-विरोधी एजेंडे की पूर्ति हेतु उसी प्रकार- इस्लाम के नाम पर मुस्लिमों को एकजुट और जाति के आधार पर हिंदू समाज को कई टुकड़ों में बांटने की कोशिश कर रहे है- जैसा अंग्रेजों ने अपनी विभाजनकारी “बांटो और राज करो” नीति के अंतर्गत किया था।

स्वतंत्रता पूर्व अंग्रेजों ने मुसलमानों और दलितों को एकजुट करके शेष हिंदू समाज के खिलाफ खड़ा करने का असफल कुप्रयास किया था। अगस्त 1947 के बाद अंग्रेज तो चले गए, किंतु उनकी इस कुटिल नीति का अनुसरण वामपंथी, मुस्लिम जनप्रतिनिधि और स्वघोषित सेकुलरवादी दशकों से कर रहे है। यह स्थिति तब है, जब “दलित-मुस्लिम” गठजोड़ का बुलबुला 1947-50 में ही फूट गया था। रक्तरंजित विभाजन पश्चात पाकिस्तान गए और वहां मंत्री बने दलित जोगिंदरनाथ मंडल, जिनकी गत 5 अक्टूबर को 52वीं पुण्यतिथि भी थी- वह नए इस्लामी राष्ट्र में दलितों पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के भयावह उत्पीड़न के साक्षी बनने के बाद एक निराश और टूटे हुए व्यक्ति के रूप में भारत लौट आए। सच तो यह है कि एक दलित के अधिकार भी इस्लामी शासन-व्यवस्था में अन्य “काफिर-कुफ्रों” की भांति पहले से निर्धारित है। पाकिस्तान और बांग्लादेश- इस त्रासदी के जीवंत उदाहरण है, जहां अधिकांश शेष हिंदू दलित समाज से ही है और वे केवल निचले दर्जे का काम करने तक सीमित है। जबकि हिंदू बहुल भारत में उनके लिए स्वतंत्रता के बाद शिक्षा और रोजगार में आरक्षण की व्यवस्था है और सभी नागरिकों की भांति उन्हें समान अधिकार प्राप्त है।

इसी विफल “दलित-मुस्लिम गठजोड़” की आहट हाथरस में भी सुनाई दे रही है। कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी का हालिया ट्वीट- इसकी बानगी है। वह लिखते हैं, “कई भारतीय- दलित, मुसलमान और आदिवासियों को इंसान समझते ही नहीं है।” क्या इस विकृत विचार की परिकल्पना में सत्ता प्राप्ति हेतु मजहब/जाति के नाम पर देश को फिर से तोड़ना नहीं है?इसी विषाक्त विचार के अंतर्गत हाथरस मामले में न्याय दिलाने के नाम पर, इस्लामी कट्टरपंथी संगठन “पीएफआई” द्वारा उत्तरप्रदेश को जातीय हिंसा में झोंकने की साजिश का भी खुलासा हो चुका है। इस संबंध में प्रवर्तन निदेशालय को पीएफआई के खाते में विदेश से 50 करोड़ मिलने का साक्ष्य मिला है। यही नहीं, “फर्जी रिश्तेदार” बनकर पीड़िता के घर कई दिनों से रूकी महिला के नक्सलियों से संबंध होने का रहस्योद्घाटन हुआ है। आरोप है कि वह पीड़िता के घरवालों को बरगला रही थी।

यदि हाथरस मामले में इस पूरे कुनबे की नीयत वाकई पीड़ित परिवार को “न्याय” दिलाने की होती, तो वह उत्तरप्रदेश के ही बलरामपुर में सामने आए ऐसे ही मामले में भी मुखरता के साथ अपनी आवाज बुलंद करते और आंदोलन करते। क्या ऐसा हुआ? नहीं। क्यों? क्योंकि यह मामला उनके द्वारा स्थापित विमर्श/नैरेटिव के अनुकूल बिल्कुल भी नहीं है। इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों के नाम शाहिद और साहिल है। अब जिन लोगों ने हाथरस में दुष्कर्म आरोपियों की “जाति” ढूंढ ली थी, उन्हे बलरामपुर में बलात्कार आरोपियों की “पहचान” उजागर करने में एकाएक लकवा मार गया। यह विकृति हम जनवरी 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला द्वारा आत्महत्या किए जाने में भी देख चुके है, जिसे विकृत तथ्यों के आधार पर और उसके सुसाइड नोट, जिसमें उसने अपनी आत्महत्या के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया था- उसे छिपाकर जातीय रंग दे दिया था।

दिल्ली के आदर्श नगर में विगत 7 अक्टूबर को 18 वर्षीय राहुल राजपूत की हत्या कर दी गई। उसका दोष केवल इतना था कि उसने एक मुस्लिम लड़की से प्रेम करने का “जघन्य अपराध” किया था। मामले में पांच आरोपी- लड़की के भाई मोहम्‍मद राज, रिश्‍तेदार मानवर हुसैन और उसके तीन नाबालिग दोस्‍त गिरफ्तार किए गए है। अब देश-विदेश तो छोड़िए, इस नृशंस अपराध को जहां अधिकांश समाचारपत्रों ने केवल एक “समाचार” तक सीमित कर दिया, तो कुछ न्यूज़ चैनलों को छोड़कर बाकी चैनल इस खबर के प्रति उदासीन रहे।राहुल की निर्मम हत्या और हाथरस में हैवानियत की शिकार पीड़िता की हत्या पर प्रतिक्रिया देने में इतना भारी अंतर होने का कारण क्या है? क्या इसका दिल्ली में मृतक राहुल का हिंदू और हत्यारोपियों का मुस्लिम होना है? किसी भी अपराध (जघन्य सहित) पर प्रतिक्रिया का आधार पीड़िता-आरोपी की जाति या मजहब होना- क्या सभ्य समाज को स्वीकार्य होगा?

यदि हम सभ्य समाज होने का दावा करते है, तो अपराध और अपराधी पर प्रतिक्रिया उसके द्वारा किए अपराध से तय होना चाहिए- ना कि यह देखकर अपराधी-पीड़ित की जाति-मजहब क्या है।( लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद और भाजपा पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।)

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