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नीचा दिखाना अपनी हॉकी की आदत!

पता नहीं क्यों कंगारुओं को देख कर हमारे ब्ल्यू टाइगर्स को क्या हो जाता है? फाइनल से पहले हमारे खिलाडी और कमेंटेटर कह रहे थे कि भारत पहला गोल्ड जीतने जा रहा है। लेकिन हुआ वही जोकि पिछले कई सालों से होता आ रहा है। जिन हॉकी प्रेमियों ने मैच देखा है उन्हें पता होगा कि पूरे  मैच में हमारे खिलाड़ी कहीं नजर नहीं आए। फारवर्ड चल नहीं पाए, मिड फील्ड से सप्लाई नहीं मिली और बोझ तले दबी  रक्षा पंक्ति बार बार फ्लॉप हुई।

‘हमने खुद को नीचा दिखाया’,  भारतीय हॉकी टीम के कोच ग्राहम रीड ने कॉमनवेल्थ हॉकी फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों हुई शर्मनाक हार के बाद यह प्रतिक्रिया दी। बेशक रीड की बात में दम है क्योंकि जो भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध खेल रही थी वह रीढ़विहीन थी। हाँ यदि किसी को माफ़ किया जा सकता है तो वह है वेटरन गोलकीपर श्रीजेश, जोकि शुरू से आखिर तक चट्टान की तरह डटा रहा और अपने खिलाडियों के शर्मनाक खेल की कीमत चुकाता रहा।

हॉकी जानकारों और विशेषज्ञों की मानें तो उन्हें श्रीजेश को छोड़ बाकी भारतीय खिलाडी स्कूली बच्चे या नौसिखिया नजर आए, जिन्होंने बाल रोकना और पास देना भी ढंग से नहीं सीखा हो। भला हो श्रीजेश का जिसने भारतीय टीम को दर्जन भर गोलों की हार से बचा लिया। लेकिन जब कभी भारतीय हॉकी का इतिहास लिखा जाएगा और  बर्मिंघम कॉमनवेल्थ खेलों के फाइनल में भारत की शर्मनाक हार की चर्चा होगी तो श्रीजेश को खलनायक के रूप में पेश किया जाएगा।

ठीक ऐसे ही जैसे की एशियाड 82 के फाइनल में पकिस्तान के हाथों हुई दर्दनाक हार के लिए सालों साल मीर रंजन नेगी को कोसा गया। 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों के बाद टोक्यो ओलम्पिक और अब बर्मिंघम में भारतीय हॉकी की जिस प्रकार फजीहत हुई है उसके लिए सिर्फ और सिर्फ खिलाड़ी जिम्मेदार हैं। कोच और सपोर्ट स्टाफ हमेशा से बेहतर काम करते आ रहे हैं लेकिन पता नहीं क्यों कंगारुओं को देख कर हमारे ब्ल्यू टाइगर्स को क्या हो जाता है? फाइनल से पहले हमारे खिलाडी और कमेंटेटर कह रहे थे कि भारत पहला गोल्ड जीतने जा रहा है। लेकिन हुआ वही जोकि पिछले कई सालों से होता आ रहा है।

जिन हॉकी प्रेमियों ने मैच देखा है उन्हें पता होगा कि पूरे  मैच में हमारे खिलाड़ी कहीं नजर नहीं आए। फारवर्ड चल नहीं पाए, मिड फील्ड से सप्लाई नहीं मिली और बोझ तले दबी  रक्षा पंक्ति बार बार फ्लॉप हुई। सबके चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं। बेचारा श्रीजेश भी आखिर कब तक अडिग रह पाता! उसने भरसक प्रयास किया लेकिन जब बाकी टीम हथियार डाल चुकी थी तो उसकी कोशिश भी बेकार गई। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि आखिर ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध ही ऐसा क्यों होता है?

क्यों कंगारुओं को देखते ही हमारे खिलाड़ियों के होश फाख्ता हो जाते हैं? क्यों वे खेलना भूल जाते हैं? क्या किसी झाड़ फूंक की जरुरत है या किसी तांत्रिक को बुलाना पड़ेगा? बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब भारतीय हॉकी के कर्णधारों को देने हैं। बेशक हार जीत खेल का हिस्सा हैं लेकिन हारने का भी कोई स्तर होता है। शायद कोई चारा भी नहीं बचा।

भंग हॉकी इंडिया के अधिकारी, टीम कोच और खिलाडी अपने अपने बचाव के लिए बहाने तलाश रहे हैं। कुछ एक मुंह छुपाते फिरेंगे लेकिन एक बात सिद्ध हो गई है कि श्रीजेश को छोड़ एक भी खिलाड़ी सहानुभूति का पात्र नहीं है। और हाँ, आपने खुद को तो नीचा दिखाया ही, देशवासियों को भी शर्मसार किया है।

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