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Monday, April 19, 2021
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न होली फीकी पड़ेगी, न गंगा जमनी तहजीब

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मनुष्य से ज्यादा गजब-विचित्र जीव कोई नहीं होता। वह परस्थितियों के मुताबिक इतने रूप बदलता है कि सारी धारणाएं ध्वस्त हो जाती हैं। शायद यही जीवन है और इसकी रंगीनी भी। नहीं तो एकरसता और एकरूपता जिन्दगीं को बहुत बोरिंग बना देते। होली पर अकेले बैठे यह सब याद रहा है। पहली होली होगी जो इस तरह घर में कैद होकर मनाई जा रही है। पिछले साल होली जल्दी  आ गई थी। कोरोना शुरू तो हो गया था, मगर डर इतना नहीं बना था। 10 मार्च को होली थी। खूब खेली गई। उसके दो हफ्ते बाद 24 मार्च से लाकडाउन लगा था।मगर इस साल तो कोरोना का प्रकोप कम होने के बाद अचानक मार्च में फिर इतनी तेजी से आया कि लोगों के शुभकामनाएं भेजने का उत्साह भी कमजोर पड़ गया। मध्यम वर्ग की नौकरियां जाने, तनखाएं कम होने, नई नौकरियां रुक जाने, छोटे मंझौले व्यापार धंधे ठप्प हो जाने और मजदूर, रोज खाने कमाने वालों के काम बंद हो जाने की वजह से पहले ही लोग टूटे पड़े थे, ऐसे में कोरोना की नई लहर ने फागुन के पूरे नशीलेपन को अवसाद और हताशा में बदल दिया।

मगर ऐसे में होली की एक ऐसी दिलखुश शुभकामना दिखी कि भारत की विविधता और मिलीजुली गंगा जमनी तहजीब की जड़ों पर यकीन और पुख्ता हो गया। ये शुभाकामना एक ऐसे प्रदेश के नेता की तरफ से आई जहां होली का उत्तर भारत के दूसरे राज्यों की तरह कोई गहरा असर नहीं रहा। और वहां के बड़े त्यौहारों में शामिल नहीं रही। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर के जरिए सबको होली की शुभकामनाएं दी हैं। हो सकता है वे पहले भी देते रहें हों, और हमारी निगाह न पड़ी हो। क्योंकि उस समय होली मनाने का जोश ज्यादा होता था, शुभकामनाओं की औपचारिकता से आदमी नहीं बहलता था। अब तो लगता है तस्वीर से दिल बहलाने का वक्त आ गया!

खैर तो उमर की शुभकामना में एक तो उनकी खानदानी खुशमिजाजी और भाईचारे की खुशबू बसी थी तो दूसरी तरफ उस उल्लास में कश्मीर के शामिल होने के संकेत जिसे पहले वह राज्य ज्यादा नहीं जानता था। कश्मीर में ईद और बकरीद तो बाकी देश की तरह मनाए ही जाते हैं ,मगर यहां महाशिवरात्रि बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है। कश्मीरी पंडितों का यह सबसे बड़ा त्यौहार होता है। कश्मीर में दरार डालने की पाकिस्तान ने बहुत कोशिश की। मगर आज भी वहां कोई कश्मीरी मुसलमान ऐसा नहीं होगा जो कश्मीरी पंडित को है रथ (शिवरात्रि) मुबारक ने कहे। और न ही ऐसा कोई कश्मीरी पंडित होगा जो कश्मीरी मुसलमान को ईद की मुबारकबाद न दे। आतंकवाद से पहले वहां अखबारों, रेडियो, दूरदर्शन पर ईद पर मुख्य लेख, टाक, कार्यक्रम कश्मीरी पंडित ही लिखते, बनाते थे। और महाशिवरात्रि पर इसी तरह पहला लेख, टीवी प्रोग्राम और रेडियो की वार्ता कश्मीरी मुसलमान लेखक, टीवी प्रोड्युसर बनाते थे।

आतंकवाद के उन दिनों 1990 से 2000 तक जब हम वहीं से रिपोर्टिंग कर रहे थे तो कई बड़े आतंकवादी नेताओं से बात होती थी। जेल में बंद आतंकवादियों से भी और समर्पित आतंकवादियों से भी जो सुरक्षा बलों के साथ मिलकर पाक समर्थित आतंकवादियों से लड़ रहे थे, उनसे भी। सब बताते थे कि पाकिस्तान द्वारा दी जा रही ट्रेनिंग का मुख्य जोर हिन्दु मुसलमान के बीच नफरत बढ़ाने पर है।कश्मीर, जहां सूफी कल्चर रहा है और धार्मिक कट्टरता का कहीं नामोनिशान नहीं है, वहां पाकिस्तान के लिए हिन्दु मुसलमान का विभाजन पैदा करना सबसे मुश्किल काम रहा। उसने हथियार दिए, पैसा दिया, ट्रेनिंग दी मगर सबके बावजूद वह दोनों के बीच की साझी संस्कृति को खत्म नहीं कर पाया। यह उसकी सबसे बड़ी हार रही।आतंकवाद के बुरे से बुरे दौर में भी अमरनाथ यात्रा बंद नहीं हुई। एक बार पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन ने यात्रा को रोकने की धमकी दी। दूसरे दिन ही एक दूसरे आतंकवादी संगठन जेकेएलएफ ने इस संगठन को जो उस समय टाप पर था सीधे चुनौती दी कि यह गलती मत करना। हम यात्रियों की सुरक्षा में रहेंगे।

तो यह सर्वधर्म समभाव कश्मीर की खासियत रही है। जो उमर के संदेश के बाद और निखर के सामने आई है। जैसा कश्मीर के बारे में जिक्र किया कि वहां हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार महाशिवरात्रि था तो जम्मू में लोहड़ी और रक्खड़ी। डोगरी में राखी को रक्खड़ी कहते हैं। होली जम्मू में भी उत्तर भारतियों की तरह नहीं मनाई जाती थी। पंजाब का असर ज्यादा होने की वजह से दीवाली भी उस तरह का बड़ा त्यौहार नहीं था, जैसा यूपी, एमपी, राजस्थान में होता है।एक मजेदार किस्सा बताते हैं। उन दिनों हमारे यहां गांव से आया हुआ लड़का बहादुर था। होली पर उसे थोड़ा लगा कि यहां फाग वाग तो कोई गा ही नहीं रहा। हुल्लड़ भी वैसा नहीं है। मगर फिर भी थोड़ी बहुत होली का मजा लिया। मगर असली समस्या तो तब आई जब उसे गुजिया नहीं मिली। होली पर गुजिया नहीं, तो कैसी होली। पूरा जम्मू का बाजार छान मारा। पहलवान की हट्टी से लेकर केसी प्लाजा तक। मगर गुजिया कहां!

तो यह धारणा, मनोविश्व का मामला है और भारत की विविधता का। जैसे जयपुर में जिसने मकर संक्रान्ति नहीं देखी वह मान नहीं सकता कि उस दिन वाकई आसमान नहीं दिखता। सारा आकाश पतंगों से ढक जाता है। औरत, आदमी, बच्चे, बुजुर्ग सब छतों पर होते हैं। दिन भर सिर्फ पतंगबाजी। खाना पीना सब वहीं। और वहींपहली बार देखा कि मकर सक्रांति की अख़बार की दो दिन की छुट्टी। होली, दीवाली पर भी अख़बार दो दिन नहीं आता था। मतलब पत्रकारों को दो दिन की छुट्टी। दिल्ली वालों के लिए तो इससे बड़ी खुशी की कोई बात हो ही नहीं सकती थी। दिल्ली में साल में सिर्फ दो दिन होली, दीवाली पर अख़बार बंद रहता है। और हिन्दु ( द हिन्दु अख़बार) की छुट्टी तो होली दीवाली पर भी नहीं होती थी। जबकि यहां जयपुर में हर त्यौहार पर दो दिन।यह रंग हैं भारत की विविध संस्कृति के। बहुत पहले एक बार छठ पर बिहार में था। तब तक बाकि देश में छठ पर अधिक हल्ला नहीं था। वहा हैरान हो गया छठ की

रौनको को देखकर। ऐसे ही गणेश उत्सव पहले केवल महाराष्ट्र में ही मनायाजाता था। हम मध्य प्रदेश वाले जो इन्दौर को, मालवा को जानते हैं, वे जरूर गणेश उत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से परिचित थे। मगर बाकी मप्र और देश ने बहुत बाद में इसे जाना। इसी तरह मप्र के मालवा इलाके में होली की तरह ही रंगपंचमी मनाई जाती है। होली के पांच दिन बाद। जबकि मप्र के बुंदेलखंड में परमा ( धुलेंडी, प्रथमा) को कीच गिलाए ( धींगा मुश्ती, कीचड़) की होली खेली जाती है। दोज को रंग गुलाल की होली होती है। तो यह है भारत में त्यौहारों की विविधता। यहां दक्षिण के, उत्तर पूर्व के राज्यों का जिक्र ही नहीं कर रहे जिनके तीज त्यौहार बिल्कुल अलग ही रंगके होते हैं।

तो ऐसे में प्रेम का, उल्लास का हर संदेश खुशी देता है, उम्मीद देता है। यहां नजीर अकबराबादी से लेकर अजमेर शरीफ, निजामउद्दीन ओलिया और मुगलों की होली की मिसालें देने की कोई जरूरत नहीं है। उन्हें सब जानते हैं। मगर कोरोना के इस दौर के साथ जब हर रंग की धार्मिक कट्टरता देश की गंगा जमनी संस्कृति पर हमले कर रही हो तो कश्मीर से आया उमर का संदेश हमें इसलिए रोमांचित कर गया कि यह भारत की विरासत का अंश है। कश्मीरियत का!

कैसे? इसे बताकर बस बात खत्म करते हैं। उमर के दादा शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे। जमाते इस्लामी के सैयद अली शाह गिलानी उनके पास पहुंचे। बोले, ये बहुत गलत हो रहा है। कश्मीर में शराब बिक रही है। सब दोजख में जाएंगे। शेख साहब ने कहा जाने दो। हम और तुम तो नहीं जाएंगे। पीने वाला ही जाएगा ना! आपका पीछा छूटेगा! जन्नत में भीड़ कम होगी।

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