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Wednesday, May 12, 2021
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बंगाल में हिंसा कब तक?

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विरला ही कोई ऐसा भारतीय  होगा जो किसी-न-किसी क्षेत्र में बंगाल की असाधारण प्रतिभा एवं तीक्ष्ण बौद्धिकता से प्रभावित न हुआ हो! पर कैसी विचित्र विडंबना है कि जो बंगाल कला, सिनेमा, संगीत, साहित्य, संस्कृति की समृद्ध विरासत और बौद्धिक श्रेष्ठता के लिए देश ही नहीं पूरी दुनिया में विख्यात रहा हो, वह आज चुनावी हिंसा, अराजकता, रक्तपात के लिए जाना जाने लगा है। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता हो जब वहाँ होने वाली हिंसक राजनीतिक झड़पें अख़बारों की सुर्खियाँ न बनती हों! राज्य विधानसभा के लिए चले रहे चुनाव-प्रचार के दौरान इस बार वहाँ भाषा की मर्यादा का जमकर उल्लंघन हुआ, नैतिकता एवं मनुष्यता को ताक पर रख दिया गया, संसदीय परंपराओं की जमकर धज्जियाँ उड़ाई गईं, एक-दूसरे पर अनर्गल आरोपों-प्रत्यारोपों की झड़ी लगा दी गई, कोविड-बचाव के दिशानिर्देशों की घनघोर उपेक्षा एवं अवमानना की गई। और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि सभी पक्षों ने किसी-न-किसी स्तर पर गंभीरता, जिम्मेदारी एवं सरोकारधर्मिता की कमी दर्शाई।

ममता बनर्जी और तृणमूल काँग्रेस ने तो सख़्ती किए जाने पर उलटे चुनाव-आयोग एवं केंद्रीय सुरक्षा बल जैसी संस्थाओं की साख़ एवं विश्वसनीयता पर ही सवाल उछाल दिया। वहाँ छिड़ी चुनावी रंजिशों से उठती हिंसक लपटों ने स्त्री-पुरुष-बाल-वृद्ध-जवान किसी को नहीं बख़्शा। 82 वर्षीय शोभा मजूमदार के सूजे हुए होठ और चोटिल चेहरा को भुला पाना कदाचित किसी संवेदनशील व्यक्ति के लिए संभव नहीं! चुनावी हिंसा की इससे क्रूर, विद्रूप एवं भयानक तस्वीर कोई अन्य नहीं याद आती!  उस बूढ़ी माँ का दोष केवल इतना था कि उसका बेटा सत्तारूढ़ दल की विचारधारा और नीतियों से असहमत था। इस असहमति के कारण ही  त्रिलोचन महतो, अशोक सरकार, गोकुल जेना गणपति मोहता, मनीष शुक्ला, देवेंद्र नाथ राय, गणेश राय, चंद्र हलदर, पूर्ण चरणदास, रॉबिन पाल, सुखदेव प्रामाणिक जैसे दर्जनों बीजेपी कार्यकर्त्ताओं-नेताओं की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। चाहे वह वामपंथी दल का शासन हो या उसके बाद सत्ता पर आरूढ़ तृणमूल काँग्रेस का, दोनों ने हिंसा और हत्या को राजनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया। क्या ऐसे ही बंगाल की कल्पना बंकिम-रवींद्र-सुभाष ने की होगी? क्या यह महाप्रभु चैतन्य, परमहंस रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद का बंगाल है?

क्या इन मनीषियों में अपार श्रद्धा रखने वाले तमाम बंगालियों एवं समस्त भारतवासियों ने सपने में भी ऐसे बंगाल की कल्पना की होगी? वामपंथियों के शासन-काल से भी अधिक भयावह-रक्तरंजित वर्तमान परिवेश में ममता बनर्जी द्वारा दिया गया ‘माँ, माटी, मानुष” का लोकप्रिय नारा क्या केवल छलावा नहीं लगता? बंगाली अस्मिता के नाम पर सत्ता की मंजिलें तय करने वाले दलों एवं नेताओं को क्या ऐसी हिंसा एवं अराजकता पर ग्लानि एवं पश्चाताप नहीं होना चाहिए? सोचने वाली बात है कि प्रतिभा एवं पांडित्य, आस्था एवं विश्वास, नव-जागरण एवं सामाजिक सुधारों की धरती बंगाल के भद्रलोक को ऐसी हिंसा एवं अराजकता से राज्य के बाहर अकारण कैसी-कैसी स्थितियों-टिप्पणियों का सामना करना पड़ता होगा?

एक दौर में जब बिहार में अपहरण उद्योगों की तरह फल-फूल रहा था, शासन के संरक्षण में मतदान केंद्रों पर हिंसा-लूटपाट आम बात थी,  मसखरेबाजी को जनप्रिय राजनीति का प्रतीक बना दिया गया था और जाने-अनजाने भाषा के भदेस-मनमाने-नाटकीय प्रयोग को ही बिहारियों की पहचान समझा जाने लगा था, उसकी टीस आज भी हर उस बिहारी के हृदय में रह-रह उठती है जो हर प्रकार की प्रतिभा-सामर्थ्य से परिपूर्ण एवं शुद्ध-सुसंस्कृत भाषा के विज्ञ होने के पश्चात भी प्रदेश के बाहर या तो वैसी ही मूढ़ता के पर्याय मान लिए गए या राजनीतिक लाभ लेने के लिए योजनापूर्वक बनाई गई उस पहचान का भार ढोने को अभिशप्त हुए। ममता बनर्जी हों या कोई अन्य, उन्हें सोचना होगा कि प्रदेश की सार्वजनिक छवि या नेताओं के अटपटे बयानों एवं व्यवहारों का दंश और हानि-लाभ अंततः वहाँ की जनता को ही भुगतना पड़ता है।

दरअसल पश्चिम बंगाल के राजनीतिक चाल-चरित्र में बीते छह दशकों से व्याप्त हिंसा के उत्तरदायी मूल कारणों और कारकों की कभी खुली, स्पष्ट एवं ईमानदार विवेचना ही नहीं की गई? क्योंकि इस देश के अधिकांश बुद्धिजीवियों में अपने वामपंथी झुकाव या वैचारिक ख़ेमेबाजी के कारण उसके विरुद्ध बोलने का साहस ही नहीं है। ऐसा करते ही उन्हें सत्ता-संस्थान में वर्षों से प्रतिष्ठापित वामपंथी ‘दिग्गजों’ का कोप-भाजन बनने या प्रशंसा-प्रसिद्धि- पहचान-पुरस्कार से वंचित होने का डर सताने लगता है।   इसलिए वे हिंसा एवं ख़ूनी क्रांति में विश्वास रखने वाले वामपंथियों को कठघरे में खड़ा करने या उनसे तीखे सवाल पूछने से बचते हैं? सच यही है कि 1977 में वाममोर्चे की सरकार बनने के बाद से ही वहाँ की सरकारी मशीनरी का भारी पैमाने पर राजनीतिकरण होता चला गया।

पुलिस-प्रशासन से लेकर अधिकतर सरकारी विभाग व अधिकारी कम्युनिस्ट कैडर की तरह काम करने लगे। गैस-बिजली-पानी कनेक्शन से लेकर राशन कार्ड, आवास प्रमाण-पत्र बनवाने या रोज़मर्रा की तमाम ज़रूरतों के लिए आम-निष्पक्ष नागरिकों को कम्युनिस्ट कैडरों, स्थानीय नेताओं, दबंगों पर निर्भर रहना पड़ता था। जिसने भी इन वामपंथी निरंकुशता या मनमानेपन के विरुद्ध मुखर एवं निर्णायक आवाज उठाई उसे या तो भय दिखाकर चुप करा दिया गया या हमेशा-हमेशा के लिए उसके जीवन का ही पटाक्षेप कर दिया गया। 1977 से 2011 के बीच कम्युनिस्टों के शासनकाल में ही हिंसा बंगाल का प्रमुख राजनीतिक चरित्र बना।

ममता बनर्जी खुद अनेक बार वामपंथी हिंसा की शिकार हुईं। 2011 में जब वे सत्तासीन हुईं तो हिंसक दौर  के अंत एवं अवसान की उम्मीद जगी। पर हुआ इसके ठीक विपरीत। सत्ता से अपदस्थ होने के पश्चात सरकारी सुविधाओं एवं पैसों की मलाई खाने के अभ्यस्त वामपंथी कैडरों और स्थानीय नेताओं-दबंगों ने तृणमूल का दामन थाम लिया। परिणामतः बंगाल की सत्ता बदली, पर हिंसक चरित्र नहीं बदला। वस्तुतः नेतृत्व के पास यदि नीति, नीयत और दृष्टि हो तो कार्यकर्त्ताओं को दिशा मिलती है। पर दिशा और दृष्टि तो दूर, ममता बनर्जी का तल्ख़ तेवर, आक्रामक अंदाज़ और गुस्सैल मिज़ाज कई बार हिंसा के लिए उनके कार्यकर्त्ताओं को उकसाने-भड़काने का ही काम करता आया है।

और कोढ़ में खाज जैसी स्थिति हाल के वर्षों में तेजी से बदलती वहाँ की डेमोग्राफी, रोहिंगयाओं व बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ती तादाद, सत्तारूढ़ दल द्वारा वोट-बैंक के लालच में उनका भयानक पोषण-संरक्षण-तुष्टिकरण से निर्मित होती चली गई। वस्तुतः आज वहाँ जो संघर्ष दिख रहा है, वह प्रतिगामी-यथास्थितिवादी और प्रगत-परिवर्तनकामी शक्तियों के मध्य है। आज संपूर्ण देश और दुनिया की दृष्टि वहाँ चल रहे चुनाव और उसके परिणाम पर टिकी है। पश्चिम बंगाल के हितों और सरोकारों से जुड़े हर जागरूक एवं संवेदनशील व्यक्ति की यही इच्छा है कि चाहे कोई जीते, कोई हारे, पर हिंसा व अराजकता के दशकों पुराने खेल पर अब अविलंब अंकुश लगना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होता।

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