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घाटी में यदि आंतकी हिंदू को मारे तो…

36 वर्षीय राहुल भट की 12 मई को बडगाम के चडूरा गांव स्थित तहसीलदार कार्यालय में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने घुसकर राहुल को मारा तो  आहत हिंदू सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने लगा और सोशल मीडिया पर आक्रोशित हो गया।,,…यदि राहुल भट की हत्या से आक्रोशित हुए लोग सरकार को गरियाने के बजाय ‘काफिर-कुफ्र’ चिंतन और भारत में इस दर्शन के समर्थकों के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए “तुम कितने राहुल मारोगे, हर घर से राहुल निकलेगा” जैसे नारे बुलंद करते, तब संभवत: आतंकवादियों और जिहादी मानसिकता के संरक्षकों का मनोबल अवश्य पस्त होता।

पिछले दिनों आतंकवादियों ने घाटी में कश्मीरी हिंदू राहुल भट की गोली मारकर हत्या की। वे कश्मीर में प्रधानमंत्री योजना के अंतर्गत सार्वजनिक विभाग में कार्यरत थे। इस दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद घटनाक्रम पर एक जीवंत समाज की क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी- पहले से अधिक इच्छाशक्ति के साथ इस्लामी आतंकवाद का मुकाबला करने का संकल्प या फिर पलायन की भाषा बोलना? हम लोग शताब्दियों से एक सांस्कृतिक युद्ध लड़ रहे है। एक ओर जहां भारत के सनातन जीवनमूल्य- बहुलतावाद, लोकतंत्र और सह-अस्तित्व की भावना है, तो दूसरी तरफ इस्लामी कट्टरवाद है, जिसमें ‘काफिरों’ को जीने या सम्मान के साथ रहने का कोई अधिकार नहीं होता। यह केवल कश्मीर क्षेत्र या फिर कश्मीरी हिंदुओं की लड़ाई नहीं, अपितु उन सभी भारतीयों का युद्ध है, जो भारत की मौलिक सनातन संस्कृति में विश्वास रखते है। भारतीय सेना और अर्धसैनिक बल के जवान/अधिकारी देश के अलग-अलग हिस्सों से आते है और वे सभी इन शाश्वत मूल्यों की रक्षा हेतु अपना बलिदान देने में संकोच नहीं करते- क्योंकि बलिदान किसी भी युद्ध की अपरिहार्य कीमत है।

राहुल भट की नृशंस हत्या पर गुस्सा आना स्वाभाविक है। परंतु वह आक्रोश किसके खिलाफ होना चाहिए? क्या उनके खिलाफ, जो राहुल के साथ खड़े है या फिर उनके विरुद्ध, जिन्होंने 1989-91 से अबतक हजारों राहुलों की निर्मम हत्या की, बंदूक के बल पर स्थानीय निवासियों को घाटी छोड़ने के लिए विवश किया। आत्म-सम्मान और जन्मभूमि की रक्षा अपनी कीमत मांगती है और यदि कश्मीर में यह सांस्कृतिक युद्ध अब भी जारी है, तो वह केवल इसलिए है, क्योंकि सदियों से इस भूखंड के मूल निवासी अपने प्राणों की आहुति देते आ रहे है। नवंबर 1675 में सिख पंथ के नौंवे गुरु तेग बहादुरजी ने उन्हीं मूल्यों की रक्षा हेतु दिल्ली के मुगल दरबार में अपना शीश कटाना स्वीकार किया था।

इसी तरह अक्टूबर 1947 में जम्मू-कश्मीर रियासत के तत्कालीन प्रधान सेनाप्रमुख ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह (सर्वोच्च महावीर चक्र से सम्मानित) ने “आखिरी व्यक्ति, अंतिम गोली…” की भावना के साथ उरी में पाकिस्तानी पिट्ठुओं से लोहा लेते हुए बलिदान दिया था। ऐसे शूरवीरों की एक लंबी सूची है, जिसमें अब राहुल भट का भी नाम जुड़ गया है। इनमें से किसी ने भी पलायन की बात नहीं की थी। इस्लामी आतंकवाद का मुकाबला किया, अपने प्राण दिए। यदि इनमें से किसी ने भी पलायन की सोची होती, तो यह सांस्कृतिक युद्ध कब का समाप्त हो गया होता और जिहादी विजयी हो गए होते। वास्तव में, पलायन की बात असंख्य हुतात्माओं का अपमान है।

क्या सरकार राहुल भट से पहले आतंकवाद के शिकार हुए लोगों की रक्षा नहीं कर सकती थी? क्या मजहबी दर्शन प्रेरित उग्रवाद से हम समाज को शत-प्रतिशत सुरक्षित रख सकते है? क्या ऐसा संभव है? यदि ऐसा हो पाता, तो वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ वर्ष 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह सहित 17 निरापराध खालिस्तानी आतंकवाद का शिकार नहीं होते। क्या आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई एकतरफा हो सकती है?

अभी 36 वर्षीय राहुल भट के मामले में क्या हुआ? जब 12 मई को बडगाम के चडूरा गांव स्थित तहसीलदार कार्यालय में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने घुसकर राहुल पर गोलियां बरसाकर मार डाला और रक्त से सने पवित्र जनेऊ के साथ उनके शव की तस्वीर वायरल हुई, तब इससे आहत हिंदू सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने लगा और सोशल मीडिया पर आक्रोशित हो गया। अधिकांश सरकार की आलोचना कर रहे थे। कश्मीरी हिंदुओं में से कई ने सुरक्षित जम्मू लौटने की मांग तक कर दी। क्या इनके पलायन से कश्मीर आतंकवाद से मुक्त हो जाएगा? क्या ऐसे रवैये से वे सभी जिहादियों को उनके उसी विषाक्त मजहबी उद्देश्य को सफल बनाने में प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से सहयोग नहीं कर रहे है, जिसमें हिंदू-विहीन कश्मीर और खालिस शरीयत की कल्पना निहित है?

जिस वर्तमान सरकार-प्रशासन के खिलाफ पीड़ित हिंदू समाज विरोध-प्रदर्शन कर रहा है, उसने विगत सात दशकों में पहली बार जम्मू-कश्मीर को न केवल धारा 370-35ए जैसे विषैली अधिनियमों से मुक्त किया है, साथ ही वह 1989-91 में जिहादी दंश के कारण विस्थापित हुए कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास और जिहादियों का चुन-चुनकर मारने के साथ घाटी में बहुलतावाद, समरसता और समृद्ध जीवनशैली को पुनर्स्थापित करने का हरसंभव प्रयास भी कर रही है। यह बात राहुल के हत्यारों को बांदीपुरा में सुरक्षाबलों द्वारा अगले दिन ही ढेर और आतंकवादियों से निकटवर्ती संबंध रखने वाले शिक्षकों-पुलिसकर्मियों को पदच्युत करने से भी स्पष्ट है।

तीन दशक पहले क्या स्थिति थी, उससे कश्मीरी हिंदू सहित करोड़ों भारतीय भली-भांति परिचित है। आतंकी फारूक अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे और यासीन मलिक, जो कश्मीर में 1989-91 के हिंदू विरोधी जिहाद का चेहरे थे, जो अपने किए की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति के बाद भी तत्कालीन सरकारों की उदासीनता और वामपंथियों के वैचारिक सहयोग के कारण खुले घूमते रहे और अपने दुष्कर्मों पर शर्मिंदा होने के स्थान पर गाल बजाते रहे। उस समय वे ‘यूथ आइकॉन’ थे, आज सलाखों के पीछे है। क्या यह सब वर्तमान सरकार की सख्त आतंकवाद विरोधी नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव होता?

राहुल भट हत्याकांड पर हमारा रवैया क्या होना चाहिए था? वर्ष 2001 के संसद भवन आतंकवादी हमला मामले में फांसी पर लटकाए गए आतंकी अफजल गुरु को लेकर देश में क्या प्रतिक्रिया सामने आई थी? तब वामपंथियों-नक्सलियों के वैचारिक गढ़ दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से लेकर श्रीनगर आदि कश्मीरी क्षेत्रों पर जमा उन्मादी भीड़ द्वारा नारा लगाया गया था, “तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा”। इसी से प्रेरित होकर कई मानसबंधु भी मजहब के लिए गाजी बन जाते है। इसके सैंकड़ों उदाहरण है। इस पृष्ठभूमि में यदि राहुल भट की हत्या से आक्रोशित हुए लोग सरकार को गरियाने के बजाय ‘काफिर-कुफ्र’ चिंतन और भारत में इस दर्शन के समर्थकों के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए “तुम कितने राहुल मारोगे, हर घर से राहुल निकलेगा” जैसे नारे बुलंद करते, तब संभवत: आतंकवादियों और जिहादी मानसिकता के संरक्षकों का मनोबल अवश्य पस्त होता।

राहुल भट हत्याकांड पर हिंदू समाज की वर्तमान प्रतिक्रिया से देश का वही वामपंथी-जिहादी-सेकुलर कुनबा अति-उत्साहित है, जिसने अपने ‘इको-सिस्टम’ के बल पर वर्षों तक या यूं कहे कि आज भी कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार, पलायन और मजहबी विभीषका को शोषण, गरीबी, क्षेत्रीय असंतुलन और भेदभाव की संज्ञा देकर न्यायोचित ठहराने का प्रयास कर रहे है। इसी वर्ग द्वारा कश्मीरी हिंदुओं की वेदना को चरितार्थ करती और सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म “द कश्मीर फाइल्स” को भी राहुल की मौत से जोड़कर प्रस्तुत कर रहा है। यह जमात प्रारंभ से ही इस फिल्म को झूठा, काल्पनिक, प्रोपेगेंडा, इस्लामोफोबिया और घृणा फैलाने वाला आदि घोषित करने का असफल प्रयास कर रहा है। क्या फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ से पहले कश्मीर में गैर-मुस्लिमों- विशेषकर हिंदुओं के साथ भारतपरस्त मुसलमानों को निशाना नहीं बनाया जा रहा था?

भारत को जिहादी इस्लाम के खिलाफ यह सांस्कृतिक युद्ध निश्चित रूप से जीतना ही होगा। यह काम केवल सेना-पुलिस नहीं कर सकती, इसमें सबका सहयोग चाहिए। ऐसे प्रत्येक आतंकी हमले के बाद हमारा मंत्र वही होना चाहिए, जो महाभारतकाल में श्रीकृष्ण द्वारा मिले श्रीमद्भगवद्गीता संदेश के उपरांत अर्जुन का था- ‘न दैन्यं, न पलायनम्’ अर्थात्- कभी असहाय न होना और न कभी भागना।

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