मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय सरकारी भवन में

गिरिजाशंकर

मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय किराये के भवन से उठकर संस्कृति विभाग के भवन में आ गया है या कहें यहां उसे स्थानांतरित कर दिया गया है। लगभग 2 माह में ही यह निर्णय लेने से नये भवन में विद्यालय का कार्य आरंभ होने की प्रक्रिया पूरी हो गई। अपनी स्थापना के बाद 9 साल तक यह विद्यालय लिटिल बैले टूªप को सरकार द्वारा रियायती दर पर उपलब्ध कराई गई भूमि पर बने भवन मंे लगभग 12 लाख रुपये साल किराये पर संचालित हो रही थी।

जबकि विभाग के संस्कृति भवन में जगह खाली पड़ी थी। नये संस्कृति संचालक ने यह निर्णय लिया कि इस खाली पड़े स्थान का बेहतर उपयोग नाट्य विद्यालय के लिये किया जाना चाहिए और विद्यालय यहां स्थानांतरित हो गया तथा काम भी करना शुरू कर दिया। कोरोना व लाकडाउन के चलते पिछले 4 माह से विद्यालय में अध्यापन कार्य वैसे ही बंद है अतः शिफ्टिंग का कोई विशेष प्रभाव विद्यालय के कामकाज पर नहीं पड़ा।

नाट्य विद्यालय के भवन स्थानांतरण पर राजधानी के रंगकर्मियों की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई जो स्वाभाविक ही था। कारण स्पष्ट है कि नाट्य विद्यालय किराये के भवन में संचालित हो या सरकारी भवन में, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें रिहर्सल के लिये जगह नहीं मिलती, नाट्य प्रदर्षन के लिये सस्ते हाल उपलब्ध नहीं होते आदि आदि और भी सवाल हैं जिसका कोई हल नाट्य विद्यालय से जुड़ा नहीं है। ऐसा भी नहीं हुआ कि अपने 9-10 साल की उम्र तक नाट्य विद्यालय का स्थानीय या प्रदेश के रंगकर्मियों से कोई नाता रिश्ता बना हो। प्रदेश का नाट्य विद्यालय होने के बाद भी कभी कभार यहां के किसी रंगकर्मी को यहां किसी काम में भागीदारी दी गई अन्यथा नाट्य विद्यालय का पूरा संचालन बाहरी रंगकर्मियों पर आश्रित रहा है। यहां तक कि नाट्य विद्यालय की सलाहकार समिति में भी राज्य के रंगकर्मियों को स्थान देने से सर्वथा परहेज किया जाता रहा। ऐसे में प्रदेश के रंगकर्मियों को कभी यह लगा ही नहीं कि यह हमारे प्रदेश का नाट्य विद्यालय है।

राजधानी के रंगकर्मियों की कोई प्रतिक्रिया भले ही न आई हो लेकिन देश के मशहूर रंग निदेशक बंशी कौल ने नाट्य विद्यालय को स्थानांतरित किये जाने को लिटिल बैले ट्रूप के लिहाज से अच्छा निर्णय नहीं माना। वे सरकार के इस निर्णय को स्थगित कराने का काफी प्रयास करते रहे लेकिन उन्हें अन्य लोगों का यथोचित सहयोग नहीं मिलने से कोई सफलता नहीं मिली। एलबीटी ट्रस्ट के अन्य ट्रस्टियों ने भी इस दिशा में कोई सक्रिय दिलचस्पी दिखाई हो, ऐसा नहीं लगा। बंशी कौल ने इस संबंध में मुझसे भी संपर्क किया था और नाट्य विद्यालय को यथावत रखने में सहयोग की बात की थी। मैंने जब कुछ और लोगों से भी इस दिशा में सहयोग लेने की बात की तो उनका कहना था कि उनकी बात पर सहमति सब व्यक्त करते हैं लेकिन पहल करने को कोई तैयार नहीं।

बंशी कौल का तर्क था कि नाट्य विद्यालय से मिलने वाले किराये की राशि से संस्था को आर्थिक मदद हो जाती है जो अब नहीं होगी जिससे संस्था का संचालन मुश्किल हो जायेगा। मैं इसे उनका इमानदारी बयान मानता हूँ लेकिन यह तर्क बहुत औचित्यपूर्ण नहीं लगता कि किसी संस्था जो भले ही अतिप्रतिष्ठित हो, को चलाने के लिये सरकारी भवन खाली रहने के बाद भी किराये के भवन में नाट्य विद्यालय को संचालित किया जाये। संभवतः वे भी मेरी इस बात से सहमत रहे होंगे। इसीलिये उन्होंने सरकार से फैसला बदलने की गुहार तो लगाई लेकिन कोई आरोप प्रत्यारोप नहीं किया और न कोई शिकवा षिकायत। उन्होंने किसी राजनीतिक मंशा का भी सवाल नहीं उठाया। मैंने उनसे कहा कि यदि सरकार का फैसला बदलवाना या स्थगित कराना है तो इसके लिये कोई आवेदन दिया जाना चाहिए ताकि उस आधार पर सरकार से बात की जा सके लेकिन दिल्ली में रहते हुए वे इतना भी नहीं करवा सके जबकि एलबीटी ट्रस्ट के अधिकांश ट्रस्टी भोपाल में ही रहते हैं।

बंशी कौल अपनी बात एलबीटी को बचाने के नाम पर करते रहे लेकिन एलबीटी के ट्रस्टियों में कोई बेचैनी या चिंता मुझे देखने में नहीं मिली और इसीलिये वे सब बंशी कौल के साथ उतनी सक्रियता से पहल करते नहीं दिखे। एलबीटी रामप्रकाश जरूर मेरे पास आये थे लेकिन उसके बाद वे नहीं आये। बंशी कौल की चिंता का सबब इसलिये भी हो सकता है कि उनकी संस्था ’रंग विदूशक’ को एलवीटी परिसर में जगह मिली हुई है जहां से उसका संचालन होता है। मुझे नहीं मालूम कि एलबीटी और रंग विदूशक के बीच आर्थिक स्तर पर क्या समझौता है लेकिन हो सकता है कि किराये का नौ दस लाख रुपये नहीं मिलने से एलबीटी के साथ-साथ रंग विदूशक पर असर पड़ रहा हो और इसके चलते बंशी कौल अधिक चिंतित नजर आये हों। चाहे जो हो लेकिन मैं बंशी कौल के इस तर्क से पूरी तरह सहमत हूँ कि एलबीटी जैसे प्रतिष्ठित और सात दशक पुरानी सांस्कृतिक संस्था को राज्य का संरक्षण मिलना चाहिए। सरकार द्वारा रियायती दर पर कई संस्थाओं को जमीनें दी गई हैं जिन पर भवन बनाकर गैर सांस्कृतिक कार्यों के लिये उनका उपयोग कर पैसा कमाया जा रहा है।

इसके उलट एलबीटी को रियायती दर पर आवंटित भूमि पर कलाकारों के सहयोग से गुलबर्धन दी ने भवन खड़ा किया और कभी इसका उपयोग किराया वसूलने के लिये नहीं किया गया। एक पवित्र उद्देश्य से स्थापित एलबीटी सात दशक बाद भी उसी उद्देश्य पर कायम है। गुल दी की निष्ठा और लगन को वर्तमान संचालन समिति के लोग जो खुद प्रतिष्ठित रचनाकार है, कायम रखे हुए हैं। इस नाते इस संस्था को धरोहर मानकर मदद किया जाना चाहिए लेकिन किराया उसका बेहतर विकल्प नहीं है।

जहां तक रंग विदूशक का प्रश्न है तो इस संस्था के माध्यम से बंशी कौल ने मध्यप्रदेश की रंग गतिविधियों में अभूतपूर्व योगदान दिया है। बंशी कौल मूलतः मध्यप्रदेश के नहीं है लेकिन भोपाल में लगभग 4 दशक से वे अपनी संस्था संचालित कर रहे हैं और उन्होंने सैकड़ों रंगकर्मियों की टीम यहां से तैयार की है। एलबीटी व रंग विदूशक को सरकार से अनुदान के रूप में कितनी विलीय सहायता प्राप्त होती है, यह तो पता नहीं लेकिन ऐसी संस्थाओं को पूरी गति से संचालित किये जाने की व्यवस्था होना चाहिए। सरकारी सहायता की अपनी मर्यादा होती है और उस पर पूरी तरह किसी संस्था को आश्रित भी नहीं होना चाहिए। इसीलिये मैं प्रदर्षनकारी कलाओं के पेशेवर होने की लगातार वकालत करता रहता हूँ ताकि वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें। बंशी कौल निराश लहजे में कहते हैं कि कुछ नहीं होगा तो संस्था बंद कर देंगे। मैं यह आशा करता हूँ कि ऐसी नौबत नहीं आये तथा सभी कलाकार मिलकर कुछ ऐसा प्रयास करें कि एलबीटी व रंग विदूषक दोनों अपनी सक्रियता बनाये रख सकें।

जहां तक नाट्य विद्यालय का सवाल है तो उसके सरकारी भवन में आ जाने से सरकारी खजाने में किराये की राशि बचत जरूर होगी लेकिन उसके स्वरूप और उसकी कार्यप्रणाली में कोई अंतर नहीं पड़ने वाला जो अधिक जरूरी है और संस्कृति विभाग से अपेक्षा है कि इस विद्यालय की कार्यप्रणाली में ऐसा परिवर्तन लाये 30-35 लाख के नाटक तैयार करने की फिजूलखर्ची न हो तथा विद्यालय प्रदेष के रंगकर्म को गति देने वाली संस्था के रूप में उभरे।

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