लुच्चों, टुच्चों, नुच्चों, कच्चों का धमाचौकड़ी दौर - Naya India
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लुच्चों, टुच्चों, नुच्चों, कच्चों का धमाचौकड़ी दौर

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क्या कभी आप ने सोचा कि प्रेमचंद, अमृता प्रीतम, कमलेश्वर और खुशवंत सिंह ने जन्म लेना क्यों बंद कर दिया? कबीर-रहीम तो छोड़िए; रवींद्र नाथ टैगोर, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद और रामधारी सिंह दिनकर भी अब क्यों पैदा नहीं होते? मीर और ग़ालिब को जाने दीजिए; फ़िराक़ गोरखपुरी, साहिर लुधियानवी और बशीर बद्र तक अब जन्म क्यों नहीं लेते? कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, पंडित रविशंकर और एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के गुण-सूत्र अब क्यों दिखाई नहीं देते? होमी जहांगीर भाभा और हरगोविंद खुराना के बाद हमारे विज्ञान-जगत की गर्भधारण क्षमता को क्या हो गया है?

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क्या आप ने कभी सोचा कि सियासत रेगिस्तानी क्यों होती जा रही है? छोटे हों या बड़े, जो राजनीतिक दल पहले हरे-भरे गुलमोहर हुआ करते थे, अब वे बबूल के ठूंठों में तब्दील क्यों होते जा रहे हैं? तमाम उठापटक के बावजूद अंतःसंबंधों का जो झरना राजनीतिक संगठनों के भीतर और बाहर बहता था, उसकी फुहारें सूखती क्यों जा रही हैं? परिवार और कुनबा-भाव आपसी छीना-झपटी की हवस से सराबोर क्यों होता जा रहा है? वैचारिक सिद्धांतों पर आधारित पारस्परिक जुड़ाव की ओस-बूंदें मतलबपरस्ती के अंगारों में क्यों बदलती जा रही हैं? आंखों का परिस्थितिजन्य तिरछापन नफ़रत के लाल डोरों को आकार क्यों देने लगा है?

यह किसी एक राजनीतिक दल का हाल नहीं है। हमारी समूची राजनीति का यही स्थायी भाव बनता जा रहा है। सियासी संगठनों में भीतर ही किसी को एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं है तो समान विचारों वाले दूसरे राजनीतिक संगठनों के विवेकवान लोगों से तालमेल की तो चिंता कौन करे? ऐसे में अपने प्रतिपक्ष से तो सीधे मुंह बात करने का सवाल ही कहां उठता है? सो, यह ख़ुद को सुल्तान समझ कर अपनी-अपनी मीनारों में बैठे रहने का युग है। यह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और दूसरों को हेय समझने का दौर है। यह अपने अलावा बाकी सब को तुच्छ मान कर नाक-भौं सिकोड़ने का वक़्त है। इसलिए हमारे समय की सियासत रेतीली होती जा रही है।

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जब सियासी संसार की कोपलें बर्छियों में तब्दील होती हैं तो सामाजिक संसार की हरियाली से भी लपटें निकलने लगती हैं। जब समाज की संवेदनाएं भोथरी होने लगती है तो संस्कृति और साहित्य के संस्कार भी उथले होने लगते हैं। बौनापन और क्षुद्रता जब पैर पसारते हैं तो वे हर आंगन में धमाचौकड़ी मचाते हैं। बड़ों का और बड़प्पन का दौर छीजते-छीजते आज उस पायदान पर आ गया है, जहां शकुनियों का अड्डा है। अब हर शिखर की शुरुआत इस सब से निचले पायदान से होती है। यही हमारी सियासत, समाज, साहित्य और संस्कृति का सर्वोच्च कंगूरा है। अब सारा बहाव इससे भी नीचे की तरफ़ जा रहा है।

ऐसा इसलिए हुआ कि हम ने अपनी जीवन-सत्ता की सारी डोरियां ना-लायकों के हवाले कर दीं। एक से बढ़ कर एक बदशक़्ल नायक-नायिकाएं चुन-चुन कर हम ने अपने सिर पर बैठा लिए। राजनीति को जाने दीजिए भाड़ में! गांधी-नेहरू-पटेल तो छोड़िए, अटल बिहारी वाजपेयी तक की अनुपस्थिति पर विलाप करने का भी यह समय नहीं है। मगर क्या कभी आप ने सोचा कि प्रेमचंद, अमृता प्रीतम, कमलेश्वर और खुशवंत सिंह ने जन्म लेना क्यों बंद कर दिया? कबीर-रहीम तो छोड़िए; रवींद्र नाथ टैगोर, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद और रामधारी सिंह दिनकर भी अब क्यों पैदा नहीं होते? मीर और ग़ालिब को जाने दीजिए; फ़िराक़ गोरखपुरी, साहिर लुधियानवी और बशीर बद्र तक अब जन्म क्यों नहीं लेते? कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, पंडित रविशंकर और एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के गुण-सूत्र अब क्यों दिखाई नहीं देते? होमी जहांगीर भाभा और हरगोविंद खुराना के बाद हमारे विज्ञान-जगत की गर्भधारण क्षमता को क्या हो गया है?

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यह सूची बहुत लंबी हो सकती है। यह सूची बहुत लंबी है भी। लेकिन इसकी अनवरतता अब भंग-सी हो गई लगती है। गायन की दुनिया में, वादन की दुनिया में, नृत्य की दुनिया में, अभिनय की दुनिया में, अध्यापन की दुनिया में, खेलकूद की दुनिया में, हमारी पूरी दुनिया में जिन सितारों के भरोसे हम ने यहां तक का सफ़र तय किया, अब वैसे सितारे हमारी आकाशगंगा से अगर गायब होते जा रहे हैं तो क्या हमें चिंतित नहीं होना चाहिए? सो, सौ बरस बाद आई एक महामारी के इस दौर में थोड़ा वक़्त निकाल कर इस महामारी के बारे में भी सोचिए। मानव-शरीरों को चाट रही महामारी से तो हम निपट लेंगे, लेकिन भारतीय जीवन-तत्व को लील रही इस महामारी की भी कोई वैक्सीन बनाने का हम कभी सोचेंगे?

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मैं जानता हूं कि मेरे इस प्रलाप का कोई अर्थ नहीं है। राष्ट्र-निर्माण का अर्थ अब सवा तीन किलोमीटर लंबी केंद्रीय वीथी और 597 फुट ऊंची मूर्तियों के निर्माण तक सिमट गया है। तमाशा-प्रबंधन के इस युग में मानव-जीवन के बुनियादी आयामों के क्षरण की फ़िक़्र करने वालों को मूर्ख नहीं तो क्या कहेंगे? राजनीति लुच्चों के चंगुल में जाए तो जाए, समाज को टुच्चों की ठेकेदारी भाए तो भाए, धर्म-अध्यात्म नुच्चों के गले की कंठी-माला बने तो बने, साहित्य-संस्कृति कच्चों की बाहों में समाए तो समाए। हमें क्या? यही तटस्थता-भाव हमें देवत्व तक पहुंचाएगा, क्योंकि पक्षधरता के तो अपने खतरे हैं। हमारे आसपास का पानी इसलिए सूख रहा है कि हम तटस्थ हैं। हमारे चारों तरफ़ की ज़मीन इसलिए बंजर हो रही है कि हम तटस्थ हैं।

हमें किसी की परवाह नहीं है। जो पराए हैं, उनकी तो परवाह करें ही क्यों, हम ने तो अपनों की भी परवाह करना छोड़ दिया है। हम यह मानते ही नहीं हैं कि संसार के सारे बड़े काम एक-दूसरे का ख़्याल रखने से होते हैं। हम ने यह बात अपने दिमाग़ से निकाल कर बाहर फेंक दी है कि जो अपनों की परवाह नहीं करते, उनकी भी फिर कोई परवाह नहीं करता है। बेपरवाही को अपना जीवन-मंत्र बना लेने की इस सोच का नतीजा है कि हमारी सियासत रेगिस्तानी होती जा रही है। सहयोगियों को कठपुतलों में तब्दील करने का जो कारखाना हम ने अपने सियासी संसार के चप्पे-चप्पे पर लगाया है, उसी ने आज हमें इस दशा में पहुंचाया है।

यह शुष्कता एक दिन सब-कुछ ले बैठेगी। किसी भी देश की धमनियों में लोकतंत्र की धारा संसद और केंद्रीय वीथी की वैभवशाली इमारतों से नहीं बहती है। यह बहाव तो संवेदनाओं, हमजोलीपन और पारस्परिक सम्मान-भाव से ही त्वरा पाता है। शहाबुद्दीन मुहम्मद ख़ुर्रम को भले ही हम लालकिला और ताजमहल बनवाने वाले शाहजहां की तरह जानने लगे, मगर मीराबाई ने ऐसा क्या बनवाया था कि बच्चा-बच्चा उन्हें जानता है? लोग हाथी और ख़ुद की सैकड़ों मूर्तियां बनवाने वाले को याद रखते हैं या काशी के बाज़ार में परिवार सहित स्वयं को बेच डालने वाले सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को?

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गांधी ने कौन-से अचल-निर्माण कराए थे कि उनकी प्रतिमाएं दुनिया भर में लगी हुई हैं? बुद्ध को क्या हम किसी शाक्य राजा के तौर पर याद करते हैं? उनकी बनाई किसी इमारत का नाम आप जानते हैं? महावीर को क्या हम कुंडलपुर के क्षत्रिय राजा की तरह जानते हैं? उनके बनाए किसी भवन-वीथी की याद है आपको? दुनिया के सबसे बड़े मानव-निर्मित अचल निर्माण चीन की दीवार के सूत्रधार क्विन शी हुआंग को कोई जानता भी है? दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज़ ख़लीफ़ा बनाने वाले मुहम्मद अलाब्बार को जानते हैं आप? शंघाई टॉवर किसने बनवाया, कुछ पता है आपको?

सो, जिन्हें लगता है कि ईंट-गारे की सात तल्ली इमारतें बनवा कर वे इतिहास में अमर हो जाएंगे, उन्हें मूर्खों के स्वर्ग में निवास करने दीजिए। देश जिस ईंट-गारे से बनते हैं, वह कहां मिलता है, ये बेचारे जानते ही नहीं। इसका मतलब यह नहीं है कि कल को जो आएंगे, वे असली ईंट-गारे की विशेषज्ञता से पगे होंगे। मुझे तो लगता है कि वह मिट्टी ही ख़त्म हो रही है, जो ईंट-गारे की पहचान करने वालों का निर्माण करती थी। इसलिए पहली ज़रूरत तो उस मिट्टी को बचाने की है। वह मिट्टी इन में से किसी के भरोसे नहीं बचेगी। वह तो तब बचेगी, जब हम सब भीतर से बचे रहें।( लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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