Indian new education policy भारतीय ज्ञान परंपरा और शिक्षा में दूरी
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भारतीय ज्ञान परंपरा और शिक्षा में दूरी

Gurukul

Indian new education policy इधर ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ मुहावरा बार-बार सुना जा रहा है। इस का बड़ा श्रेय भाषा-साहित्य के विद्वान प्रो. कपिल कपूर को है। चार दशक पहले जब वे जेएनयू में प्रोफेसर थे, तभी उन्होंने हमारे शास्त्रीय ग्रंथों को ‘पवित्र’ ‘प्राचीन’ कहने के यूरोपीय चलन को अनुपयुक्त बता कर उन्हें ‘ज्ञान-ग्रंथ’ व सामयिक कहने की सिफारिश की। जिसे मामूली बहस के उपरांत केंद्र सरकार अधिकारियों ने मान लिया। इस प्रकार, लगभग 1984-85 से शैक्षिक दस्तावेजों में यह मुहावरा दिखने लगा।

लगभग सौ-सवा सौ वर्षों से भारत के महान ज्ञान-ग्रंथों के साथ विचित्र मजाक हुआ है। एक ओर पूरी दुनिया में उन का सतत निर्यात होता रहा, और हरेक देश के जिज्ञासुओं ने उन से लाभ उठाया। दूसरी ओर, स्वयं भारत में धीरे-धीरे औपचारिक शिक्षा से वे दूर होते गए। यह स्वतंत्र भारत में अधिक हुआ, जो अंग्रेज-राज में नही हुआ था। बल्कि, उन्हीं अंग्रेजों की सहायता से मैक्स मूलर जैसे विद्वान ने अनेक लुप्त संस्कृत ग्रंथों को प्रकाश में लाया। मैक्स मूलर ने 50 खंडों की ‘सैकरेड बुक्स ऑफ द ईस्ट’ द्वारा भारत की ज्ञान परंपरा से ही दुनिया को पुनः लाभान्वित किया।

किन्तु हैरत की बात कि वही महान ग्रंथ भारत में उपेक्षित होते गए। समाजवाद, उदारवाद, गाँधीवाद, मार्क्सवाद, आदि मतवादों ने हमें सम्मोहित कर लिया। स्वतंत्र भारत में तो भारतीय ज्ञान-भंडार पर खास चोट पड़ी, जिसे ‘धार्मिक’ कहकर शिक्षा बहिष्कृत कर दिया गया! मानो उस की कोई उपयोगिता न हो, बल्कि स्वयं धर्म भी व्यर्थ विषय हो! ऐसी विडंबना की कल्पना किसी विदेशी ने भी न की होगी, जो स्वतंत्र भारत में मजे से चल रही है।

क्या यह स्थिति बदलेगी? इस का उत्तर देना कठिन है। यद्यपि, इधर ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ मुहावरा बार-बार सुना जा रहा है। इस का बड़ा श्रेय भाषा-साहित्य के विद्वान प्रो. कपिल कपूर को है। चार दशक पहले जब वे जेएनयू में प्रोफेसर थे, तभी उन्होंने हमारे शास्त्रीय ग्रंथों को ‘पवित्र’ ‘प्राचीन’ कहने के यूरोपीय चलन को अनुपयुक्त बता कर उन्हें ‘ज्ञान-ग्रंथ’ व सामयिक कहने की सिफारिश की। जिसे मामूली बहस के उपरांत केंद्र सरकार अधिकारियों ने मान लिया। इस प्रकार, लगभग 1984-85 से शैक्षिक दस्तावेजों में यह मुहावरा दिखने लगा। प्रो. कपूर ने दो खंडों में ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम्स’ (2005) तैयार करके उस ज्ञान की प्रासंगिकता भी दिखाई। इन में ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र में महान भारतीय देन की वर्तमान उपयोगिता पर काफी जानकारी है। इस विषय़ पर आधुनिक भाषा में अभी यही सब से मानक सामग्री है।

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अब, चूँकि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय ज्ञान का विशेष उल्लेख है, इसलिए मानसिक स्वतंत्रता की दिशा में बढ़ने की अपेक्षा स्वभाविक है। जो सब से बुनियादी काम होते हुए भी, सर्वाधिक उपेक्षित है। उन राष्ट्रवादियों द्वारा भी जो भारतीयता, आदि के प्रचार से ही राजनीति करते रहे। किन्तु दशकों से सत्ता में रह कर भी इस के लिए एक तिनका तक नहीं उठाया। उलटे, वामपंथी आग्रहों की नकल करते रहे।

फलतः, विविध राज्यों में भी बच्चों, युवाओं की शिक्षा उन्हें अपने ही देश की महान विरासत से अंधेरे में रखती है। बिना वह विरासत जाने ही उस के प्रति तिरस्कार-भाव भरती है। इस तरह, संस्कृति शिक्षा के बदले संस्कृति को नकारने का काम करती है। यह आज भी जारी है। नीति में लिख देने के बाद भी यह सुसुप्तावस्था चिंताजनक संकेत है।

इसलिए भी, क्योंकि अब पूरी आधुनिक सभ्यता दिग्भ्रमित है। पिछले साल अमेरिका में ‘वोक’ मतिहीनता की ताकत दिखी, और अब तालिबान से पूरे यूरोप-अमेरिका की लज्जास्पद हार हुई। मध्युयगीन इस्लामियों में अधिक मनोबल दिखा। इस से यह प्रमाणित हुआ कि मात्र तकनीक, और आर्थिक विकास की तुलना में चेतना व नैतिकता को उच्चतर बनाना अधिक आवश्यक है। अन्यथा तकनीक एक भ्रम भर बन कर रह जाएगा। इस बिन्दु पर भारतीय ज्ञान परंपरा निस्संदेह एक सभ्यतागत पुनर्जागरण कर सकती है। क्योकि इसी के पास वह गहन सांस्कृतिक संपदा आज भी बची है।

किन्तु दुर्योग से भारत में ही यहाँ के महान ऋषियों, योगियों, बोधिसत्वों, गुरुओं, अरिहन्तों की बातें नहीं पढ़ी-पढ़ाई जाती। केवल बाह्य जगत की जानकारी याद करने और आपा-धापी करते स्वार्थ-सिद्धि सिखाने का चलन है। अपने ही आत्म, धर्म, और कर्म की सीख छूटी हुई है। फलतः लोग दिगभ्रमित, खिन्न, चिंतित रहते जीवन व्यतीत करते हैं। क्योंकि शिक्षा उन्हें जीवन-उद्देश्य जानने से ही वंचित रखती है।

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वस्तुतः आधुनिक जीवन में भावनात्मक समस्याओं का कारण आत्म-विस्मरण ही है। व्यक्ति बाह्य-जगत पर नियंत्रण करके आर्थिक रूप से तो सुरक्षित हो जाता है। किन्तु आंतरिक-जगत रिक्त, या कुपोषित रह जाता है। सच्ची संतुष्टि के लिए आत्म-ज्ञान अनिवार्य है, जो केवल भारतीय ज्ञान परंपरा में पूरे वैभव के साथ उपलब्ध है। इसीलिए यह ज्ञान विश्व में समादृत हुआ, क्योंकि इस ने आत्मज्ञान के आधार पर विश्व-ज्ञान को स्थापित कर इन में सामंजस्य का मार्ग बताया था। इसी पर लौटकर हम संपूर्ण जगत को पकड़ सकते हैं। यही वेदान्त का महान रहस्य है, जिस से भारत को विश्व-गुरू कहा गया था। यह पश्चिमी लोगों ने ही कहा था, हमारे ज्ञानियों ने स्वयं यह संज्ञा नहीं गढ़ी।

वेद पूरे विश्व में इसलिए प्रसिद्ध हुए, क्योंकि इस में शाश्वत व नश्वर, परा और अपरा, दोनों पक्षों का समृद्ध ज्ञान है। भारतीय ज्ञान परंपरा ने सदैव दोनों का आकलन किया। एक के लिए दूसरे को कभी न छोड़ा। योग वेदान्त सर्वोपरि आत्म-ज्ञान है। किन्तु ऋगवेद (समाज), सामवेद (गाय़न), गंधर्ववेद (कला-संगीत), आयुर्वेद (चिकित्सा), धनुर्वेद (युद्ध-कौशल), स्थापत्यवेद (निर्माण), आदि में मानव जीवन के सभी पक्षों की प्रस्तुति है। उस संपूर्ण ज्ञान का सदुपयोग सदैव होना चाहिए। यह न केवल हमारे, वरन संपूर्ण मानवता के हित में है।

पर यह तो तब होगा जब पहले भारत अपनी महान विरासत की महत्ता समझे! हीरे-माणिक-रत्नों को कंकड़ समझ कर त्याज्य न बनाए रखे, जो स्वतंत्र भारत में हुआ। आज भी अधकचरी शिक्षा से नई पीढ़ियों की हानि करते जाना, लेकिन विश्व-गुरू बनने का नारा देना दोहरी लज्जा की बात है! इस अतंर्विरोध को कोई सामान्य व्यक्ति भी देख सकता है।

सच्चा विवेक मात्र सूचनाएं एकत्र करने से नहीं, अपितु प्रकृति और आत्म के नियमित अवलोकन, मनन, तथा अपनी भाषा व विश्व के महान साहित्य का कुछ न कुछ अध्ययन करते रहने से आता है। अपने आत्म-तत्व के प्रति सजग होना आवश्यक है, जो अनन्त आकाश में व्याप्त है। यही भारतीय योगियों और ऋषियों की महान सीख है।

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अभी तक ऐसी कोई दवा नहीं बनी जिस से व्यक्ति में सदगुण विकसित हो। दवाएं केवल रजोगुण व तमोगुण बढ़ा सकती हैं। पर अंतर्दृष्टि या शान्ति नहीं दे सकतीं। यह तो केवल साधना व चित्त-शुद्धि से मिलती है। इसीलिए, ध्यान व मनन की शक्ति विकसित करना ही शिक्षा का मूल आधार है। अन्यथा विचार क्षमता बाधित, और मौलिकता असंभव रहती है। इसीलिए, भारतीय शिक्षा पंरपरा में एकाग्रता और ध्यान का केंद्रीय महत्व रहा है।

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जबकि चालू आधुनिक शिक्षा में सदगुण-विकास लुप्तप्राय है। बच्चों, युवाओं में मुख्यतः मतवाद, अहंकार, और स्वार्थ भावना भरी जाती है। मतवादी दुष्प्रभाव में योग्यता के बदले प्रवंचना, दिखावा को बढ़ावा मिलता है। फिर, सब को उत्तीर्ण करने, बनावटी प्रमाणपत्र देने, आदि द्वारा आत्म-छलना का व्यापक चलन हो गया। फलतः हम अपने को भी जाने बिना सारी दुनिया पर टीका-टिप्पणी करते रहते हैं।

बहरहाल, समय रहते इस दिशा-हीन शिक्षा-तंत्र को सन्मार्ग पर लाने का यत्न होना चाहिए। भारत की मूल शक्ति इस की धर्म-चेतना और सांस्कृतिक एकता में रही है। उसी से यहाँ की भौगौलिक एकता और राज्यनीति को भी हजारों वर्षों से पोषण मिलता रहा। इसे भुला देना, और शिक्षा को पूरी तरह भौतिकवादी, मतलबी, रोजगारी बनाना आत्मघाती भूल हुई है। इसे अविलंब सुधारना आवश्यक है। शिक्षा-प्रणाली पर एकाधिकार किए हुए राजकीय कर्णधार अपनी मोहनिद्रा से जगें। वरना पहले ही काफी जमीन खोई जा चुकी, और बचे पर भी बर्बरता का मंसूबा बढ़ रहा है। Indian new education policy

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

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