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कैसा वक्त और कैसी सियासी नैतिकता?

डॉ रामेश्वर मिश्र

राजनैतिक विचारधाराओं का अपना नैतिक मूल्य होता है। राजनीति विचारधारा के लिए जानी जाती है, हर राजनेता के अपने वैचारिक मन्वन्तर हुआ करते हैं लेकिन बदलते राजनैतिक दौर में राजनितिक विचारधारा का कोई नैतिक मूल्य नहीं रहा। राजनेता अपने निहित स्वार्थ के मुताबिक पार्टी का चयन करते हैं, चुनाव किसी पार्टी के सिंबल पर लड़ने के बाद दूसरी राजनैतिक विचारधारा में सम्मिलित हो जाते हैं। यही घटना हमें मध्य प्रदेश के सियासी राजनीति में देखने को मिल रही है। पंद्रह महीने पहले हुए विधान सभा चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई लेकिन पंद्रह वर्षों के बाद मध्य प्रदेश में राजनैतिक वापसी करने वाली कांग्रेस पार्टी को सत्ता सँभालने में कड़ी चुनौती मिल रही है।

पंद्रह महीने के अंतराल में कांग्रेस पार्टी को चार बार फ्लोर टेस्ट से गुजरना पड़ा है जिसमे कांग्रेस पार्टी ने सिद्दत से अपनी सत्ता को बचाए रखा है लेकिन 09 मार्च के बाद से मध्य प्रदेश की राजनीति में हुए सियासी उलटफेर में कांग्रेस पार्टी फंसती दिख रही है। आने वाले दिनों में जो फ्लोर टेस्ट होगा वह कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा। 11 मार्च को राजनैतिक विचारधारा में उलटफेर का सबसे बड़ा उदाहरण मध्य प्रदेश के कद्दावर कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देना और भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करना है।

सिंधिया ने 18 वर्षों तक कांग्रेसी विचारधारा का निर्वहन किया और अपने उदबोधनो द्वारा भारतीय जनता पार्टी के विचारों की तीखी आलोचना की। उनके द्वारा भारतीय जनता पार्टी की सदयस्ता ग्रहण करने के तुरंत बाद कांग्रेस पार्टी के विचारों की आलोचना करना वैचारिक मूल्यों के बदलते स्वरुप को रेखांकित करता है। राजनीति में व्यक्तिगत मतभेद होना या किसी विषय विशेष पर मतभिन्नता होना तो जायज है लेकिन उन्हीं मतभिन्नताओं को वैचारिक ढ़ाल बनाकर अपनी विचारधारा को शीघ्रतम तरीके से बदल लेना राजनैतिक विचारों का पतन मात्र है।

इन हुए बदलाव के बीच कांग्रेस पार्टी द्वारा अपने कुछ राजनैतिक सलाहकारों के माध्यम से राजनीति हवा को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया जा रहा है। इन सब घटनाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हाल के वर्षों में नवनिर्वाचित हुए कर्नाटक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य सरकार काफी विवादित रहीं। भारतीय जनता पार्टी द्वारा कर्नाटक राज्य में लगभग दो साल के भीतर कई बार सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया गया, वहाँ खरीद-फरोख्त का जो प्रयास हुआ वह व्यक्तिगत राजनैतिक आकांक्षा मात्र थी जिसमे भारतीय जनता पार्टी एक बार असफल होने के बाद अंततः सत्ता पर काबिज होने में सफलता रही। तीन महीने पहले महाराष्ट्र में नवनिर्वाचित विधान सभा पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा एनसीपी अध्यक्ष अजीत पवार के साथ गठबंधन करके सत्ता पर काबिज होने का असफल प्रयास किया गया जहाँ अंत में बहुमत होता न दिखाई देने पर चार दिन में ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया।

ऐसे ही घटनाक्रम मध्य प्रदेश में देखने को मिल रहे हैं जहाँ कांग्रेस पार्टी की सरकार को कई बार अस्थिर करने का प्रयास किया गया जिसे मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी राजनैतिक सूझ-बूझ से असफल करने में सक्षम रहे। इन गतिविधियों के लिए चाहे विधायकों की खरीद-फरोख्त जिम्मेदार रही हो या खुद राजनैतिक पंडितों की आकांक्षाऐं परन्तु इससे राजनेताओं की जो छवि हाल के वर्षो में बनी है वह गौर करने के काबिल है। जनप्रतिनिधियों का इस प्रकार से धर-पकड़ करना, रेकी करना, स्थानांतरण करना और उन राजनेताओं में भी पार्टी के प्रति निष्ठा की कमी होना आदि ऐसे तथ्य हैं जो भारतीय राजनीति के पतन के द्योतक हैं। ऐसे मौकापरस्त, स्वार्थी, पदातुर नेताओं के लिए भारतीय राजनीति में 1991 से हॉर्स ट्रेडिंग जैसे शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा।

दरअसल, हॉर्स ट्रेडिंग का मतलब घोड़ों की बिक्री से है, करीब 18वीं शताब्दी में इस शब्द का इस्तेमाल घोड़ों की बिक्री के दौरान व्यापारी करते थे, इस दौरान व्यापारी अपने घोड़ों को कहीं पर छुपा देते थे, कहीं पर बांध देते थे या फिर किसी और अस्तबल में पहुंचा देते थे और फिर अपनी चालाकी से पैसों के लेन-देन के दमपर सौदा किया करते थे। आज के राजनैतिक परिदृश्य में कुछ इसी प्रकार की घटनाएं तकरीबन हर राज्यों के विधान सभाओं के गठन से लेकर पूर्ण संचालन तक में देखने को मिल रही है। कर्नाटक विधान सभा के सन्दर्भ जुलाई 2019 में हॉर्स ट्रेडिंग के खिलाफ कांग्रेस पार्टी द्वारा मौन विरोध प्रकट किया गया था।

इन सब कार्यों से इन नेताओं द्वारा जनता की भावना को पूर्णतया ताक पर रखा जाता है। जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा अपने नैतिक विचारों का सौदा तो किया जाता ही है साथ ही साथ महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जनता की भावनाओं का भी सौदा किया जा रहा है। हाल ही में इन सबके साथ-साथ राज्य सभा के कुछ सांसद जिसमे कांग्रेस के केसी राममूर्ति, भुनेश्वर कालिता, संजय सिंह एवं समाजवादी पार्टी के सुरेन्द्र सिंह नागर, संजय सेठ, नीरज शेखर द्वारा अपनी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दिया गया और अपने व्यक्तिगत हित के लिए भारतीय जनता पार्टी का दामन पकड़ा गया। बदलते दौर में बदलती हुई राजनैतिक विचारों का प्रतिफल ही है कि जनप्रतिनिधियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पक्ष-विपक्ष दोनों के द्वारा अपने-अपने विधायकों को महफूस रखने का प्रयास किया जा रहा है, यह किस प्रकार की राजनैतिक संस्कृति का द्योतक है। कहाँ है इनकी राजनैतिक नैतिकता ?

क्या चुनाव में जीत के लिए जनता से नए-नए वादे करने वाले नेता चुनाव में जीतने तक ही अपनी नैतिकता रखते हैं? क्या इससे उपर इनका वजूद नही है? पहले राजनैतिक विचारों के मूल्यों के लिए लोग अपने परिवारों से अलग होकर उसकी रक्षा करते थे, कुछ राजनीतिज्ञों का नाम सुनते ही यह सुनिश्चित हो जाता था कि अमुक नेता समाजवादी है, कांग्रेसी है, बामपंथी है या दक्षिणपंथी है लेकिन बदलते दौर में यह कहना बहुत मुश्किल होगा कि कौन सा राजनेता किस विचारधारा का है।

भारतीय राजनीति में विचारधारा का जिस प्रकार से पतन हो रहा है वह लोकतंत्र पर सबसे बड़ा धब्बा है। आज के बदलते दौर में विचारधारा का स्थान पद और व्यक्तिगत आकाँक्षाओं ने ले लिया है, नेताओं की अपनी कोई विचारधारा नही रह गयी है। इस माहौल में जनता को अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव बड़ी सावधानी और बुद्धिमत्ता से करना होगा। इन राजनेताओं के बदलते चरित्र से नोटा के महत्व को बल मिलता है जो बदलती हुई राजनैतिक विचारधारा का प्रतिफल मात्र है।

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