जांच तो बहाना है, हमें तो सिर्फ अपनों को बचाना है!

विगत 15 माह में विपक्ष की भूमिका में रही भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस सरकार तथा उनके तमाम मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये, लेकिन जब सत्ता का उलटफेर हुआ और जॉच की बात आई तो उन्ही मंत्रियों को जॉच का जिम्मा दिया जिन्हें कभी हासिये पर लिया जाता था, आखिर ऐसा क्यों ?

कमलनाथ सरकार में रहे छह मंत्रियों ने भाजपा का दामन थामा, ये वही मंत्री थे जो कमलनाथ सरकार के तमाम फैसलों में शामिल रहे। भाजपा ने सरकार बनाते ही कमलनाथ सरकार के निर्णयों की जांच का फैसला लिया लेकिन ज्ाांच समिति के नाम पर बनाई गई ग्रुप ऑफ मिनिस्टार्स में कांग्रेस सरकार में स्वास्थ मंत्री रहे एवं वर्तमान मेें जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट को जगह दी गई।

सवाल ये है कि क्या तुलसी सिलावट अपनी ही उपस्थिति में लिए हुए निर्णय को गलत ठहरायेंगे या अपने पांच अन्य मंत्री साथीगण के विभागों में हुए कथित भ्रष्टाचार को उजागर करेंगे ? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि सियासी उठापठाक में सरकार की अस्थिरता देख जाने-अनजाने मेें हुए कृत्य पर पर्दा डालेंगे।

जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट पर पूर्व में तत्कालीन कांग्रेस विधायक कमलेश जाटव तथा रणवीर जाटव ने तबदलों में लेन-देन के आरोप लगाये थे। स्कूली शिक्षा मंत्री रहे प्रभुराम चौधरी पर भी शिक्षकों के तबदलों में लेन-देन के आरोप लगे। अन्य साथी मंत्रियों के पास भी राजस्व, परिवहन, श्रम और महिला एवं बाल विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग थे। अगर कमलनाथ सरकार के मंत्री परिषद के निर्णय गलत थे या विभागों में भ्रष्टाचार हुआ है तो ये सभी भी उसके जिम्मेदार रहेंगे।

जांच के मामले में कमलनाथ सरकार के तेवर तो नरम रहे, चुनावी भाषण में हमेशा उल्लेखित होने वाले ई-टेंडर घोटाला, डंफर घोटाला तथा व्यापाम घोटाला पर कार्यवाही तो दूर की बात सरकार बनने के बाद जिक्र भी नहीं लिया, हनीट्रेप जैसे मामलों को ठंडे बस्ते में रखा गया। शायद आज इसी बात का परिणाम कांग्रेस भुगत रही है।

सैयां भये कोतवाल फिर काहे का डर” के तर्ज पर चल रही जांच के माध्यम से शिवराज सरकार कांग्रेस को हाशिये पर लेना चाहती है या कांग्रेस से भाजपा में शामिल मंत्रीयों को क्लीनचिट देना चाहती है। खैर, ये तो आने वाला समय बतायेगा कि इस जांच का उद्देश्य भ्रष्टाचार उजागर करना है या अपनों को बचाना है।

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