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न किसी से ईर्ष्या, न किसी से होड़… मेरी अपनी मंजिल, मेरी अपनी दौड़…

दोस्तों की जुबानी तोमर की कहानी..बचपन से नरेंद्र तोमर के साथ रहने वाले ग्वालियर विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष जयसिंह कुशवाह बताते हैं कि छात्र जीवन से ही नरेंद्र शांत स्वभाव,मिलनसार व्यक्तित्व और तीक्ष्ण बुद्धि वाले रहे.हर बात का जबाव तोल मोल कर और सटीक लहज़े में समय पर देने की जो आदत उनकी बचपन में थी वही आज भी है।

संघ और एबीवीपी से जुड़ाव होने के साथ नरेंद्र सिंह तोमर की पढ़ने से ज्यादा छात्र राजनीति में बेहद रुचि थी.वर्ष 1976 में जब देश में जयप्रकाश नारायण आंदोलन चरम पर था तब नरेंद्र और उनके मित्रों की सक्रिय भूमिका रही.1977 में जनता पार्टी बनी और धीर सिंह तोमर को युवा विंग का जिलाध्यक्ष बनाया गया।

धीर सिंह तोमर बताते हैं कि नरेंद की सक्रियता और छात्र राजनीति से जुड़ाव के चलते उस दौर में नरेंद्र तोमर को मोरार मंडल की युवा विंग की जिम्मेदारी सौंपी गई.इसके बाद 1980 में नरेंद्र तोमर एसएलपी कॉलेज के छात्र अध्यक्ष चुने गए.जयसिंह कुशवाह ने बताया कि कुछ कारणों के चलते नरेंद्र की कॉलेज पढ़ाई में व्यवधान भी आया पर सभी मित्रों ने मिलकर इसका भी निराकरण कर लिया था.1980 में जीवाजी विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव हारने के बाद 1982-83 में जनता पार्टी का युवा जिलाध्यक्ष बनाया गया.वो कहते हैं न…
‘मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है।
पंख से कुछ नहीँ होता, हौंसलों में उड़ान होती है.’
बस यहीं से मुन्ना भैया यानी तोमर का सियासी सफर परवान चढ़ा और 1983 में नगर निगम चुनाव में वो ग्वालियर के वार्ड नंबर 20 से पार्षद चुने गए.विधानसभा का चुनाव हो या फिर युवा मोर्चा,भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी हर मौर्चे पर अपने आप को साबित कर छोटे ठाकुर भाजपा के बड़े नेता बन गए और प्रदेश की राजनीति में तीन बार भाजपा की सरकार बनाने वाले किंगमेकर।
जब किस्तों में खरीदी साइकिल…
जयसिंह कुशवाह ने बताया कि वर्ष 1977 से 1980 की बात है जब नरेंद्र तोमर सहित उन्हें भी राजनीति का जुनून था और सभी युवा मौर्चा की राजनीति में आ चुके थे पर जेब में पैसा नहीं रहता था तो ग्वालियर में ही पैदल घूम घूम कर छात्र संघ और फिर पार्टी के लिए काम करना पड़ता था.एक दिन सभी दोस्त एकत्र हुए तो तय हुआ कि मित्र रमेश पठारिया जिनको टाइपिंग आती थी वो महल में 300 रुपए महीने की नॉकरी करने लगे.तीनों मित्रों ने तय किया कि एक साइकिल (जो उस समय करीब 400 रुपए की आती थी) ली जाए.इसके लिए सभी मित्र महल गए और सरदार संभाजी राव आंग्रे जो राजमाता का पूरा कामकाज सम्हालते थे आग्रह किया।

छात्र राजनीति में सक्रियता और संघ से जुड़ाव के चलते नरेंद्र तोमर,जयसिंह कुशवाह का महल से जुड़ाव और सरदार आंग्रे सम्भाजीराव से नज़दीकियां थीं सो उन्होंने भी सशर्त एक साइकिल रमेश पठारिया को दिला दी और हर माह उनकी वेतन से 50 रुपए काटने को बोला जिस पर सब राजी हो गए.बस फिर क्या सुबह से मोरार से टेम्पो पकड़कर जयसिंह और नरेंद्र महल जाते और साइकिल उठाकर पूरे ग्वालियर और आस पास के क्षेत्रों में जाकर पार्टी का काम करते.शाम को साइकिल वापस मित्र रमेश पठारिया को देना काम रहता था.रमेश भी शाम से रात तक महल में आयोजनों,निर्णयों की नोट तैयार कर साइकिल से बांट आते थे।

…मां हमेशा चिंतित ही रहतीं थीं

धीर सिंह तोमर ने बताया कि नरेंद्र तोमर छात्र जीवन से बहुत सक्रिय भूमिका रहते थे और घर के कामकाज से ज्यादा बाहर के लोगों से मिलना जुलना,उनके काम कराना,सबसे मीठे बोलना,किसी से ईर्ष्या नहीं कर संगठन के साथ खड़े रहकर पार्टी के काम करने देर रात तक घर नहीं जाने की आदत इनकी रही। सुबह से घर से निकल जाना और रात को देरी से घर पहुंचने को लेकर उनकी मां बहुत चिंतित रहतीं थीं पर कम बोलने वाले इस युवा की दूरदर्शी सोच ने ही नरेंद्र को ये मुकाम दिलाया कि एक छोटे घर का युवक देश का बड़ा नेता बन गया है।

जब खुद बोले में हूं नरेंद्र तोमर..
जयसिंह कुशवाह बताते हैं कि वर्ष 1977 एक वाक्या ऐसा भी हुआ कि भाजपा की युवा मौर्चा कार्यकारिणी के गठन के समय पार्टी में नरेंद्र को कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई तो तोमर थोड़ा नाराज हो गए सो तत्काल एक प्रकोष्ठ बनाया गया बेरोजगार प्रकोष्ठ और नरेंद्र तोमर को उसकी जिम्मेदारी सौंपी गई सो सहृदय तोमर ने उसे भी स्वीकार किया और संगठन के काम पर लग गए.श्योपुर दौरे पर जब तोमर पार्टी की जिम्मेदारी और संगठन का काम करने बस से पहुंचे तो वहां कुछ युवा उनके स्वागत में फूल मालाएं लेकर खड़े थे.तोमर बस से नीचे उतरकर एक तरफ खड़े हो लिए और फूल मालाएं लेकर युवा उन्हें खोजने लगे.तब शांत स्वभाव के तोमर बोले में ही हूँ नरेंद्र सिंह तोमर..ये वाक्या दर्शाता है कि भाजपा के इस छोटे ठाकुर की सोच कितनी बड़ी और पार्टी के प्रति समर्पण और निष्ठा का भाव क्या है।

प्रभुता पाकर भी तोमर साधारण व्यक्ति..
ग्वालियर राज परिवार के सदस्य छात्र जीवन से जुड़ाव रखने वाले ध्यानेन्द्र सिंह बताते हैं कि मैंने अपने जीवन में इकलौता ऐसामिलनसार, सहृदय,समर्पित और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति नरेंद्र तोमर के रूप में देखा जिसने साधारण परिवार से छात्र जीवन से उठकर सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़कर अपने आप को देश के इतने बड़े पद पर स्थापित किया और ये नरेंद्र तोमर का राष्ट्र के प्रति समर्पण और मिलनसार व्यक्तित्व का परिणाम ही है.ध्यानेन्द्र सिंह आगे कहते हैं कि
‘नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं,
प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं।’

प्रभुता पाकर किसे मद यानी अहम नहीं होता पर नरेंद्र तोमर इससे परे हैं और आज भी वो सहज,सरल और मिलनसार भाव से ही सबसे मिलते हैं.उन्होंने बताया कि छात्र जीवन मे तोमर को अपनी दिनचर्या एक डायरी में लिखते थे और जब उन्होंने एक दिन वो डायरी देखी तो वो दंग रह गए.दरअसल उस डायरी में राष्ट्रवाद से जुड़े बड़े गम्भीर विषयों पर लिखा गया था.पूंछने पर तोमर ने बताया कि जब वो रात में फ्री होते तो डायरी में लिखते हैं.भाजपा प्रदेश अनुशासन समिति के अध्यक्ष रहे रीवा के केशव पांडेय बताते हैं कि नरेंद्र तोमर के व्यक्तित्व की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है.उन्हें किसी से न नाराजगी रहती है और न उनमें कटुता का भाव है।

जनसहयोग भी कमाल का…
बात 1974-75 की जब देश में आपातकाल के हालात थे और इमरजेंसी का दौर था.नरेंद्र तोमर के एक गुरु यानि शिक्षक को जेल में डाल दिया गया और उनकी बेटी की शादी थी.तोमर और उनकी युवा टीम को जानकारी लगते ही उन्होंने जनसहयोग से अपने गुरूजी नौबतसिंह चौहान की बिटिया की धूमधाम से शादी कराई और गुरूजी की जमानत का भी इंतज़ाम किया.जैसा की जयसिंह कुशवाह ने बताया.तोमर हर समारोह और समस्या में लोगों के मददगार बनकर हमेशा जाते रहे और आज भी वो अपने मित्रों से बातचीत कर उनका हाल जानते हैं।

एक नज़र तोमर का सियासी सफर..
अपने शांत स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व के लिए पहचाने जाने वाले नरेंद्र सिंह तोमर को परिजन,परिचित,मित्र मुन्ना भैया और छोटे ठाकुर के नाम से पुकारते हैं.मध्यप्रदेश में मुरैना जिले के पोरसा विकासखंड के ग्राम ओरेठी में 12 जून 1957 को नरेंद्र सिंह तोमर का जन्म हुआ था.उन्होंने स्नातक की शिक्षा ग्रहण की है.पहली बार 1993 में ग्वालियर विधानसभा से लड़े लेकिन हार गए 1998 में पहली बार विधानसभा में पहुंचे.2003 के विधानसभा चुनाव में तोमर ने ग्वालियर से भाग्य आजमाया किस्मत का साथ मिला और कैबिनेट मंत्री भी बने.उमा भरती, बाबूलाल गौर और शिवराजसिंह चौहान मंत्रिमंडल में कई अहम विभागों के मंत्री पद की जिम्मेदारी निभाई.पहली बार 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें मुरैना संसदीय क्षेत्र से मैदान में उतारा और वो जीते भी।

जब तोमर सांसद बन गए तो केंद्र की राजनीति में आ गए लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति पर अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने दी और वो 2012 में दूसरी बार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए.तोमर की दूरदर्शिता,कुशल प्रबंधन,सफल रणनीति से बीजेपी की तीसरी बार सरकार बनी.ये वो दौर था जब शिवराज और तोमर की जोड़ी ने प्रदेश सहित देश में सुर्खियां बटोंरी थीं.यहीं से तोमर केंद्रीय नेतृत्व में अपनी विश्वसनीय कार्यशैली और अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता के चलते पकड़ बना पाए और मोदी कैबिनेट में उन्हें दो बार महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली.2018 चुनाव के बाद जब कांग्रेस की अल्पमत सरकार बनीं तो केंद्रीय नेतृत्व ने एक बार फिर मध्यप्रदेश के लिए उन पर भरोषा जताया और उन्होंने अपनी जबावदेही पूरी कर शिवराज,नरोत्तम का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया.नतीजा कांग्रेस में फूट और चौथी बार भाजपा की सरकार।

मेहनत से मिला अटलजी और राजमाता का सानिध्य…
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ाव रखने वाले नरेंद्र सिंह तोमर और जयसिंह कुशवाहा की टीम को जेपी आंदोलन के समय राजनीति की मुख्यधारा में जुड़ने का अवसर उस समय मिला जब जनता पार्टी के नेताओं ने एबीवीपी टीम से युवा संघ का गठन किया गया और संभागीय कमेटी में दोनों को जिम्मेदारी दी गई.इसी आंदोलन के समय से बैठकों और पार्टीगत आयोजनों के चलते नरेंद्र तोमर राजमाता के संपर्क में आए.इस समय मध्य भारत में राजमाता का वर्चस्व था.अटल जी जब 1972 में ग्वालियर संसदीय सीट से चुनाव लड़े तब नरेंद्र तोमर और उनकी युवा टीम सीधे अटल जी के संपर्क में आए.तोमर को अपने दोस्तों के अलावा कोई राजनीतिक प्लेटफार्म नहीं मिला बस उनकी लगन और मित्रों के जुनून ने उन्हें छोटे से घर से निकालकर देश की राजनीती का चमकने वाला तारा बना दिया।

नरेंद्र तोमर के मित्र जयसिंह कुशवाहा और धीरसिंह तोमर बताते हैं कि ये वो दौर था जब प्रदेश की राजनीति में एक तरफ राजमाता का तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह,माधवराव सिंधिया और दिग्विजय सिंह का ग्वालियर चम्बल अंचल में पर्याप्त दखल रहता था पर उस दौर में राजनीती में कटुता नहीं थी.इसलिए वे लोग अपने कॉलेज की मांगों को लेकर कई बार अर्जुन सिंह से मिले और उन्होंने उनकी बात भी मानी.तो कुछ ऐसा रहा नरेंद्र तोमर का छात्र राजनीति से देश की राजनीती तक का सियासी सफर।

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