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बनने से पहले ही बिखरी आज़ाद की पार्टी

गुलाम नबी आज़ाद के साथ जो लोग कांग्रेस छोड़कर चले गए थे उनमें से अधिकांश भारत जोड़ो यात्रा से पहले-पहले घर वापसी की तैयारियों में हैं। जिस तरह से आज़ाद के साथ कांग्रेस छोड़कर जाने वाले नेता कांग्रेस आलाकमान से संपर्क साध रहे हैं, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि राहुल गांधी के जम्मू पहुंचते-पहुंचते कहीं आज़ाद पूरी तरह से अकेले न पड़ जाएं।

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा अगले वर्ष जनवरी के मध्य में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करेगी लेकिन यात्रा का जम्मू-कश्मीर की राजनीति पर असर अभी से दिखने लगा है। गुलाम नबी आज़ाद के साथ जो लोग कांग्रेस छोड़कर चले गए थे उनमें से अधिकांश भारत जोड़ो यात्रा से पहले-पहले घर वापसी की तैयारियों में हैं। जिस तरह से आज़ाद के साथ कांग्रेस छोड़कर जाने वाले नेता कांग्रेस आलाकमान से संपर्क साध रहे हैं, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि राहुल गांधी के जम्मू पहुंचते-पहुंचते कहीं आज़ाद पूरी तरह से अकेले न पड़ जाएं।

दरअसल गुलाम नबी आज़ाद के साथ गत अगस्त के उमस भरे महीने में जो लोग कांग्रेस छोड़कर चले गए थे उन्हें दिसंबर की सर्दी आते-आते ज़मीनी वास्तविकताओं का पता चलने लगा है। आज़ाद के साथ जाने वाले अधिकतर नेताओं को अब अपने फ़ैसले को लेकर पछतावा हो रहा है और इसी वजह से उन्होंने कांग्रेस आलाकमान से संपर्क बनाना शुरू कर दिया है। पार्टी छोड़ने वाले कई नेता किसी भी समय वापस कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं।

बड़ी संख्या में आज़ाद की पार्टी के लोगों की कांग्रेस में वापस लौटने की बेताबी को देखते हुए गुलाम नबी आज़ाद परेशान हैं। हालांकि अभी औपचारिक रूप से किसी ने भी कांग्रेस में वापसी नही की है मगर बावजूद इसके आज़ाद ने घबराहट में अपने तीन बेहद विश्वसनीय साथियों को केवल शक के आधार पर गत 22 दिसंबर की शाम को आनन-फ़ानन में अपनी नवगठित पार्टी से निकाल बाहर किया है ।

जिन तीन नेताओं को आज़ाद ने बाहर का रास्ता दिखाया है उनमें जम्मू-कश्मीर के पूर्व उपमुख्यमंत्री ताराचंद, पूर्व मंत्री मनोहर लाल शर्मा और पूर्व विधायक बलवान सिंह शामिल हैं। जिस तरह से आज़ाद ने अपने करीबियों के खिलाफ कार्रवाई की है उससे आज़ाद की हड़बड़ाहट और छटपटाहट भी ज़ाहिर होती है। तीन महीने बीत जाने के बावजूद अपने दल को मजबूती के साथ स्थापित न कर पाने की हताशा भी साफ दिखने लगी है। यह निराशा और हताशा का ही परिणाम है कि आज़ाद ने बिना कोई नोटिस दिए अपने ऐसे तीन साथियों को पार्टी से निष्कासित कर दिया जो उनके सबसे अधिक विश्वस्तों में गिने जाते थे।

बेहद करीबी रहे हैं ताराचंद

पूर्व उपमुख्यमंत्री ताराचंद को जम्मू-कश्मीर में गुलाम नबी आज़ाद का दायां हाथ माना जाता रहा है। दोनों की नज़दीकियों को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी अक्सर राजनीतिक हलकों में होती रही हैं। यहां तक कि जब कभी उपमुख्यमंत्री रहते तारा चंद पर गंभीर आरोप लगे, तो आज़ाद पूरी ताकत के साथ ताराचंद के साथ खड़े नज़र आए। कईं बार आज़ाद पर भी अंगुली उठी मगर बावजूद इसके दोनों के संबंध लगातार मज़बूत बने रहे।

गत 26 अगस्त को जब गुलाम नबी आज़ाद ने कांग्रेस छोड़ी थी तो आज़ाद के पीछे-पीछे जम्मू-कश्मीर में उनके बेहद विश्वस्त ताराचंद ने भी अन्य लोगों के साथ काग्रेंस को छोड़ दिया था। लेकिन बावजूद इसके इतने करीबी को बिना सुने पार्टी से निकाल देना अपने आप में एक अजीब फ़ैसला माना जा रहा है।

ताराचंद के साथ-साथ बलवान सिंह के निष्कासन से भी सबको हैरानी हुई है। कांग्रेस छोड़ने के बाद बलवान सिंह ही एकमात्र ऐसे नेता थे जो गुलाम नबी आज़ाद के साथ बेहद सक्रिय नज़र आ रहे थे। बलवान नवगठित पार्टी को लेकर उत्साहित भी बहुत थे। मगर बलवान सिंह को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा कर आज़ाद ने यही संदेश दिया है कि उन्हें किसी पर भी भरोसा नही है। यही नही निकाले गए तीनों ही नेता हिन्दू हैं ओर हिन्दू बहुल इलाकों का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। ताराचंद और मनोहर लाल शर्मा ज़मीनी आधार वाले नेता हैं और जम्मू संभाग के लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। तीनों के जाने के बाद अब आज़ाद के साथ कोई भी बड़ा व लोकप्रिय हिन्दू नेता शेष नही रह गया है।

जिस तरह से गुलाम नबी आज़ाद ने ताराचंद, मनोहर लाल शर्मा और बलवान सिंह को पार्टी से निकाला है उसे एक तरह से आज़ाद की अदूरदर्शिता ही माना जा सकता है कि उन्होंने अपने एक ही निर्णय से अपने ही हाथों अपनी बनाई पार्टी की नींव को खोखला करने का काम कर दिया है। इस फैसले से यह भी संदेश गया है कि आज़ाद किसी पर भी यकीन नही करते चाहे कोई कितना भी करीबी क्यों न हो।

आज़ाद को नही किसी पर भरोसा

दरअसल गुलाम नबी आज़ाद के पूरे राजनीतिक सफर पर अगर नज़र दौड़ाई जाए तो साफ पता चल जाता है कि उन्होंने कभी भी किसी पर विश्वास नहीं किया। अपनी आदत अनुसार उन्होंने कभी भी किसी दूसरे को अपने बेहद करीब नही आने दिया और न ही खुद कभी किसी के नज़दीक हुए। यही कारण था कि कांग्रेस में रहते हुए जिस गुट को प्रदेश कांग्रेस में ‘आज़ाद गुट’ कहा जाता था, उसके भीतर भी कई गुट हमेशा बने रहे। इस गुट के ‘नेता’ भले ही खुद आज़ाद थे मगर अपने ही गुट को उन्होंने कभी ‘एकजुट’ नहीं होने दिया। कांग्रेस में रहते हुए ‘आज़ाद गुट’ के नेताओं की महत्वकांक्षाएं भले ही आपस में टकराती रहीं मगर  प्रदेश में ‘फूट डालो राज करो की नीति’ पर अमल करते हुए आज़ाद लंबे समय तक दिल्ली में अपनी राजनीति चमकाते रहे।

लेकिन इसी गुट के भरोसे जब गुलाम नबी आज़ाद ने अपनी पार्टी का गठन किया तो नेताओं के आपसी टकराव भी नई पार्टी को विरासत में मिले। यही बड़ी वजह थी कि तीन महीनों में ही आज़ाद के साथी आपस में उलझ पड़े और व्यक्तिगत अहंकार पार्टी को स्थापित करने में बाधा बनने लगे।

कल तक जिन भरोसेमंद साथियों के सहारे गुलाम नबी आज़ाद कांग्रेस में रहते हुए दिल्ली में आलाकमान को आंखे दिखाते थे, उन्हीं साथियों ने जब आज़ाद को अपने तेवर दिखाना शुरू कर दिए तो आज़ाद को पता चला कि पार्टी को चलाना कितना कठिन है। दरअसल कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने जिस तरह की जोड़-तोड़ की राजनीति की थी उसी का सामना उन्हें अपनी पार्टी में करना पड़ रहा है।

तेज़ी से बदल रहे हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि गुलाम नबी आज़ाद अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस गए हैं। जब तक कांग्रेस में थे तो उनका कद भी बहुत बड़ा था। दिल्ली से जब कभी जम्मू या श्रीनगर आते तो एयरपोर्ट से लेकर घर तक मिलने वालों का तांता लगा रहता। मगर जैसे ही कांग्रेस छोड़ अपनी पार्टी बनाई परिस्थितियां भी बदल गईं। मिलने आने वालों की तादाद वक्त के साथ कम होती जा रही है। अभी तक प्रदेश की राजनीति में आज़ाद का जो हौवा बना हुआ था वह हौवा अचानक से अब खत्म होता चला जा रहा है।

आज़ाद बदले हालात को समझ नही पा रहे हैं। काग्रेंस में रहते हुए जो नेता उनकी जी-हुजूरी किया करते थे वे अब गुलाम नबी आज़ाद द्वारा गठित पार्टी में बराबर के हिस्सेदार बन गए हैं और आज़ाद के बराबर बैठने लगे हैं। अब सवाल-जवाब भी होने लगे हैं। कल तक जो नेता उनसे बात करते हुए भी डरते थे वे अब आंख में आंख डाल कर बात कर रहे हैं। यही वजह थी कि जैसे ही आज़ाद को पता चला कि उनके कुछ साथी कांग्रेस आलाकमान के साथ संपर्क में हैं उनसे बर्दाश्त नही हुआ और अपने ही नज़दीकियों को निकाल बाहर किया।

दरअसल गुलाम नबी आज़ाद ने अपना मज़ाक खुद बनवाया है। जिस जल्दबाज़ी में आज़ाद ने कांग्रेस छोड़ी और उससे भी जल्दी में जिस तरह से अपनी पार्टी का गठन किया उसमें इस तरह के हालात बनने ही थे। पार्टी के नाम को लेकर अलग से असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कैसी विड़बंना है कि तीन महीने बीत जाने के बावजूद यह पता नही है कि पार्टी का आखिर नाम क्या है ? एक के बाद एक तीन नाम बदले जा चुके हैं और अभी भी साफ नही है कि पार्टी का नाम ‘डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी’ है या ‘डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आज़ाद पार्टी’ है।

गुलाम नबी आज़ाद के साथ जुड़ने वाले नेताओं में निराशा और बैचेनी पिछले कुछ समय से साफ नज़र आने लगी थी । कुछ नेताओं ने बहुत ही खामोशी के साथ धीरे-धीरे आज़ाद से दूरी बनाना शुरू कर दिया था और कुछ पुरी तरह से निष्क्रिय होने लगे थे। इन नेताओं में प्रमुख हैं पूर्व विधायक चौधरी महोम्मद अकरम और वरिष्ठ नेता जय सिंह।

आज़ाद की नवगठित पार्टी को संसाधनों की भारी कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। इस वजह से भी पार्टी नेताओं में निराशा पैदा होना स्वाभाविक है। रोजमर्रा का कामकाज चलाना भी मुश्किल हो रहा है।

पहले से ही थी संभावना

गुलाम नबी आज़ाद की पार्टी के भविष्य को लेकर ‘नया इंडिया’  में लगातार लिखा जाता रहा है। अभी गत 25 नवंबर को ही ‘नया इंडिया’ में छपे एक लेख में यह संभावना व्यक्त कर दी गई थी कि आज़ाद की पार्टी में अधिकांश नेताओं में निराशा है और पार्टी बिखर सकती है।

यही नही गत दो वर्षों से गुलाम नबी आज़ाद की खुद की राजनीति और हाल ही में गठित हुई उनकी पार्टी पर ‘नया इंडिया’ में विस्तार से लिखा गया है। जो लिखा गया था वही अब सही साबित भी हो रहा है। ऐसे ही 6 सितंबर 2022 को ‘थके हारे नेताओं के बुते आज़ाद?’ शिर्षक से छपे लेख को लेकर कुछ लोगों का कहना था कि ‘आज़ाद को कम आंकना गलत होगा।’ मगर तीन महीनों में ही गुलाम नबी आज़ाद और उनकी पार्टी की हालत ने बता दिया है कि आज़ाद को लेकर किया गया आकलन गलत नही था।

दरअसल लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहने के कारण गुलाम नबी आज़ाद ने अपनी एक विशेष छवि गढ़ ली थी। इस छवि को गढ़ने में दिल्ली के कुछ पत्रकारों ने भी अहम भूमिका निभाई थी। इसी छवि के सहारे ही कांग्रेस आलाकमान को भी लंबे समय तक डराते रहे कि वे (आज़ाद) ही जम्मू-कश्मीर के एकमात्र निर्विवाद नेता हैं और उनके बिना प्रदेश में कांग्रेस का चलना मुश्किल है।

लेकिन गुलाम नबी आज़ाद द्वारा कांग्रेस छोड़ने के बाद एक ताकतवर और जनाधार वाला ज़मीनी नेता होने की जो छवि तैयार की गई थी उसकी अब हवा निकल चुकी है।

दूसरा बड़ा झटका

गुलाम नबी आज़ाद के साथ कांग्रेस छोड़ देने वाले नेताओं द्वारा ‘घर-वापसी’ के रास्ते पर चल निकलने और बेहद वफादार साथियों द्वारा उनके खिलाफ विद्रोह कर देने से उन्हें एक बड़ा झटका लगा है। इससे पहले जी-23 के उनके साथियों ने उनका साथ छोड़ दिया था। जिस समय आज़ाद ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दिया था उस समय उन्होंने यह भ्रम पैदा करने की भरपूर कोशिश की थी कि जी-23 के अधिकतर नेता भी उनके पीछे-पीछे कांग्रेस छोड़ देंगे। मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं और आज़ाद पूरी तरह से अलग-थलग पड़ते चले गए।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस छोड़ने से पहले आज़ाद ने जी-23 के कई असंतुष्ट नेताओं को जम्मू में इकट्ठा कर अपनी ताकत दिखाने का नाटक भी किया था। यहां तक कि सोनिया गांधी को लिखे पांच पेज के इस्तीफे में भी उन्होंने जी-23 समूह का जिक्र किया था। मगर जी-23 के एक भी साथी ने बाद में आज़ाद का साथ देना मुनासिब नही समझा।

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