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जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए जोड़ तोड़ चरम पर

Panchayat Municipal Elections BJP

भोपाल। चाहे जिला पंचायत अध्यक्ष के दावेदार हो चाहे राजनैतिक दलों के नेता विधायक मंत्री हो सभी की नींद उड़ी हुई है। आज 52 जिला पंचायत अध्यक्षों का फैसला होना है। उन सदस्यों में भी बेचैनी है जिन्हें अध्यक्ष चुनना है क्योंकि चुनाव जीतने के बाद से ही अधिकांश बाहर है। रात में ही सब अपने अपने जिलों में लौटे हैं और आज वोट डालकर ही घरों तक पहुंचेंगे । जोड़-तोड़ चरम पर है जहां मतदान होगा वहां अंतिम समय तक धड़कनें बढी रहेंगी और जहां निर्विरोध होना है वहां फॉर्म भरने तक बेचैनी रहेगी।
दरअसल, प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज और नगरीय निकाय के चुनाव एक साथ हो रहे हैं और यह चुनाव विधानसभा के आम चुनाव होने की 1 वर्ष पहले ही हो रहे हैं।

जिसके कारण प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस को जीत के आंकड़ों को अधिकतम करना है। चाहे वे नगरीय निकाय से हो यात्री त्रि-स्तरीय पंचायती राज से इस कारण दोनों ही दल परिणाम आने के बाद बढ़ा-चढ़ाकर जीत के दावे कर रहे हैं और असलियत महापौर और जिला पंचायत अध्यक्ष के आंकड़ों से ही पता चलेगी। कम संख्या के यह महत्वपूर्ण पद दोनों ही दल अपने-अपने खाते में नहीं दिला पाएंगे। महापौर का आंकड़ा स्पष्ट हो चुका है। नौ भाजपा के पांच कांग्रेश के और एक आप पार्टी का और एक निर्दलीय चुनाव जीता है। इसमें एक हो सकता है कि भाजपा बागी ही कटनी में निर्दलीय रूप में जीते हैं जो भविष्य में भाजपा में जा सकते हैं और भाजपा के महापौरों की संख्या 10 हो सकती है। हालांकि पिछली बार सभी 16 सीटों पर भाजपा जीती थी इस कारण इस बार उसकी यह कमी ही कही जाएगी। हालांकि जहां कांग्रेस के महापौर जीते हैं वहां भी भाजपा के निगम अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। जनपद अध्यक्षों के चुनाव के सभी परिणाम आ गए हैं। 313 में से 312 के परिणाम घोषित हो गए हैं जिसमें दोनों ही दलों के अलग-अलग दावे हैं और यह तब तक होते रहेंगे जब तक दोनों दल अपनी सूचियां जारी नहीं कर देते हैं।

बहरहाल, आज त्रिस्तरीय पंचायती राज के अंतर्गत जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव सभी 52 ज़िलों में होना है। जिसके लिए राजधानी भोपाल से लेकर दूरस्थ गांव तक जहां जिला पंचायत सदस्य का निवास है जोड़-तोड़ चल रही है। कहीं कहीं एक एक सदस्य लेकर तनातनी है। बहुत कम जिले ऐसे हैं जहां बहुत पहले से जमावट कुछ ऐसी जमाई गई। जिससे निर्विरोध अध्यक्ष चुनने की स्थिति बनी है। इसमें सागर जिला पंचायत अध्यक्ष को लेकर ऐसी ही स्थिति है क्योंकि यहां पर मध्यप्रदेश में एकमात्र निर्विरोध जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीते हीरा सिंह जिला अध्यक्ष के प्रबल दावेदार हैं। पिछले दिनों बहुमत से भी ज्यादा सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से हीरा सिंह को समर्थन दे दिया था और अधिकांश सदस्य तब से इनके साथ ही है। तीर्थ दर्शन करने के बाद अब मतदान करने के बाद ही अपने घरों को लौट आएंगे। यहां तीनों मंत्रियों गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह और गोविंद सिंह की सहमति हीरा सिंह के पक्ष में है और कोई दावेदार सक्रिय नहीं है जो दावेदार हो सकते थे। उन्होंने जिला पंचायत सदस्य का फार्म ही हीरा सिंह के समर्थन में निकाल लिया था तब राजपूत परिवार के विरोधियों ने पूरा गुस्सा परिवार युवा सदस्य अरविंद सिंह टिंकू राजा के जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में निकाल लिया था। हालांकि गुरुवार को जनपद अध्यक्ष के चुनाव में अरविंद सिंह की पत्नी राहतगढ़ जनपद पंचायत में उपाध्यक्ष चुनी गई है।

सागर जैसी स्थिति अन्य जिलों में नहीं है। अधिकांश जिलों में कशमकश चल रही है। मुरैना में कांग्रेस के पूर्व मंत्री रामनिवास रावत, विधायक राकेश माई विधायक अजय सिंह कुशवाहा और विधायक रविंद्र सिंह तोमर एसपी ऑफिस में धरने पर बैठ गए हैं उनका आरोप है कि पुलिस ने तीन जिला पंचायत सदस्यों को अगवा कर लिया है।

इसी तरह सीहोर के चार जिला पंचायत सदस्यों को पुलिस थाने ले आए। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा है। सदस्यों के साथ पूर्व विधायक रमेश सक्सेना को भी थाने में बिठाया गया है। यहां युवा जिला पंचायत सदस्य बिजेंद्र ऊइके के रिश्तेदार ने अपहरण का मामला दर्ज कराया था। जानकारी मिलने के बाद खजूरी पुलिस नंदन रिसोर्ट पहुंची जिला पंचायत सदस्यों को उठा कर थाने ले आई। कांग्रेसी नेता और जिला पंचायत सदस्य राजू राजपूत के साथ मौजूद विजेंद्र धाकड़ ने कहा मैं पढ़ा लिखा व्यक्ति जनता के वोटों से चुनकर आया हूं। मेरे परिवार के लोगों से लगातार बात हो रही है। मेरे अपहरण की झूठी शिकायत की गई है।

कुल मिलाकर पूरे प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष को लेकर जोड़-तोड़ चरम पर चल रही है। परिणाम आने तक धड़कनें बढ़ी रहेंगी क्योंकि जो लोग सदस्यों को साथ में ले गए हैं उनके परिवार वाले भी समझौते कर रहे हैं और कई बार पुलिस को भी शिकायत कर रहे हैं। ऐसे में समझ पाना मुश्किल है कि कौन किसके साथ है लेकिन आंकड़े दोनों ही दलों को बताना है। इस कारण नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपी गई है जो कि साम, दाम, दंड, भेद का सहारा लेकर अपना अध्यक्ष बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे है।

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