भाजपा में सिंधिया के ये क्या हाल!

मध्य प्रदेश से लेकर बिहार तक पूरे देश में कोरोना महामारी के भयावह खतरे के बीच भी खतरा बढ़ाने का सियासी धमाल बनाया तो उसके एकलौते जिम्मेवार शख्स है ग्वालियर राजघराने के वंशज ज्योतिरादित्य सिंधिया! वही ज्योतिरादित्य जो चुनाव सभाओं में इन दिनों कह रहे हैं कि यह चुनाव कांग्रेस और भाजपा का नहीं, मेरा है मेरा! पूरा देश सिंधिया की तरफ देख रहा है। बिल्कुल सही इतिहास भी देख रहा है। जिसमें लिखा जाना है कि दल बदल का सबसे घातक उदाहरण ज्योतिरादित्य सिंधिया!  जिन्होंने महामारी के खतरों के दौरान दल बदल करके मध्य प्रदेश को एक मिनि चुनाव की तरफ धकेल दिया।

शिवराज सिंह की सरकार बनी रहे इसके लिए चुनाव आयोग को मध्य प्रदेश में चुनाव करवाने थे। और जब मप्र में करवाना थे तो बिहार में भी करवाना पड़े। विपक्ष जो आमतौर पर चुनाव की मांग करता है वह कोरोना की वजह से बिहार में चुनाव करवाने का विरोध कर रहा था। विधानसभा की अवधि खत्म हो जाने के बाद वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता था। नीतीश कुमार के कुशासन से परेशान भाजपा के लिए इससे अनुकूल कुछ नहीं था। वह अगले छह महीने या उससे भी ज्यादा अपने हिसाब से राज्यपाल के जरिए राज कर सकती थी। लेकिन मध्य प्रदेश के कारण भाजपा को ऐसे चुनाव में जाना पड़ा जो नीतीश के साथ उसके खिलाफ भी जाता दिख रहा है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया को कोई माफ नहीं करेगा। उनके समर्थक विधायक और मंत्री जिन्हें इस्तीफा देकर बहुत मुश्किल चुनाव लड़ना पड़ रहा है से लेकर ग्वालियर और चंबल संभाग की वह जनता भी जिसके लिए चुनावों ने कोरोना संक्रमण का खतरा और बढ़ा दिया है। हां, एक जगह ऐसी है जहां उन्हें माफी मांगने की भी जरूरत नहीं है केवल फोन करना है और उनकी सारी गलतियां भुला दी जाएंगी। मध्य प्रदेश के कांग्रेसियों को भी यही डर है और इसकी अटकले लगनी शुरू हो गई है।

राहुल गांधी की उदारता जहां सिंधिया के लिए आशा की अंतिम किरण है वहीं कांग्रेसियों के लिए चिंता का भारी सबब। व्यक्तिगत व्यवहार में भूलो और माफ करो बड़ा मानवीय गुण है मगर राजनीति में नहीं। राजनीति में एक को माफ करने का मतलब दूसरों की वफादारी कम करके आकंना भी है। सचिन पायलट इसका एक बड़ा उदाहरण हैं। उनकी वापसी को पार्टी में खासतौर से राजस्थान में अभी भी सहजता से नहीं लिया जा रहा है। भाजपा में सिंधिया जिस तरह अलग थलग पड़ गए उसे देखकर उनके समर्थक भी उनका साथ छोड़ने लगे हैं। इतिहास में कोई सिंधिया इतना तनहा और उपेक्षित कभी नहीं रहा। ज्योतिरादित्य को सबसे बड़ी चोट लगी जान देने की कसमें खाने वाले अपने समर्थकों की बेवफाई से। जिन मंत्री और ग्वालियर के अपने खास समर्थक प्रद्धुमन सिंह तोमर के पांवों में पहनाने के लिए वे हाथ में चप्पल लिए खड़े थे वे मुख्यमंत्री शिवराज से लेकर कांग्रेस के अपने पुराने सहयोगियों के पांवों में बुरी तरह गिर रहे हैं। भरी सभा में शिवराज के चरणों में दो दो बार सिर रखने के बाद तोमर का एक और वीडियो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और अरुण यादव ने ट्वीट किया है जिसमें कांग्रेसी कार्यकर्ता उन्हें पकड़ पकड़ कर रोक रहे हैं। मगर वे कुर्सी से उतरकर उनके पांवों में सिर रखने के लिए मचले जा रहे हैं।

सिंधिया के लिए यह सब बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल है। ग्वालियर चंबल संभाग में कांग्रेसी नेता के किसी कार्यक्रम में यदि सिंधिया के समर्थक नेता चले जाते थे तो उनसे जवाब तलब हो जाता था। जब वे कांग्रेस में थे उस समय अगर कहीं जाते थे और उस कार्यक्रम में दिग्विजय सिंह के लोग शामिल होते थे तो दिग्विजय कभी नहीं पूछते थे। लेकिन जब इसका उल्टा होता था, दिग्विजय सिंह के कार्यक्रम में सिंधिया का कोई आदमी चला गया तो सिंधिया उसका कोर्ट मार्शल कर देते थे। ऐसी अहं ब्रह्मास्मि ऐंठ में रहने वाले सिंधिया के लिए यह स्वीकार कर पाना बहुत तकलीफदेह हो रहा है कि एक एक करके उनके साऱे प्रमुख सहयोगी मुख्यमंत्री शिवराज को अपना नेता बता रहे हैं। सिंधिया के बड़े खास समर्थक माने जाने वाले मंत्री गोविन्द राजपूत ने सार्वजनिक तौर पर रोते हुए कहा कि उन्होंने तो कांग्रेस

मुख्यमंत्री शिवराज के लिए छोड़ी है। वे विकास पुरुष हैं। दूसरे सबसे बड़े सिपहसालार तुलसी सिलावट भी शिवराज के गुणगान में लग गए हैं। और जिन इमरती देवी को महाराज ने मेरी इमरती को किसने बोला कहकर अपने कंधे से लगा लिया था वे कह रही हैं कि पार्टी जाए भाड़ में। इमरती देवी जहां खड़ी हो जाती है वहां हिन्दुस्तान खड़ा हो जाता है। कहां महाराज खुद अपने आपको एक हस्ती मानते थे कहां उनकी वे समर्थक जो कल तक कहती थीं कि महाराज कहें तो हम कुए में कूद जाएंगे। वे आज खुद को हस्ती बता रही हैं।

महाराज के दुखों का कोई पारावार नहीं है। पहले उन्हें स्टार कैंपेनरों की लिस्ट में दसवें स्थान पर रखा, फिर चुनाव रथों से उनका फोटो गायब किया गया और अब मुख्यमंत्री शिवराज ने उनके साथ चुनावी दौरे बंद कर दिए। सिंधिया के गढ़ माने वाले ग्वालियर में भी शिवराज अकेले सभाएं कर रहे हैं। जगह जगह अब लोग पूछने लगे हैं कि जिस सम्मान के लिए महाराज ने मध्य प्रदेश को चुनाव में झौंका वह सम्मान कहां है? जब सचिन पायलट भाजपा की तरफ गए तो वे इंतजार कर रहे थे कि राहुल गांधी उनके लिए भी ऐसा कुछ बोलें कि सचिन चाहे जब मेरे घर आ सकते थे। मगर राहुल ने नहीं बोला। जो भावनाएं सिंधिया के लिए व्यक्त की थीं वह आज तक किसी और के लिए नहीं कीं। परिवार के तीनों सदस्य सोनिया राहुल और प्रियंका से

ज्योतिरादित्य हमेशा परिवार के सदस्य की तरह बात करते थे। जिन लोगों ने 2014 से 19 तक लोकसभा में देखा है उन्हें मालूम है कि सदन में सबसे अनौपचारिक तरीके से अगर कोई राहुल से बात करता था तो वह ज्योतिरादित्य थे। इतना सम्मान कम ही लोगों को मिलता है। और विडबंना यह देखिए कि दूसरी पार्टी में जाकर ऐसा अपमान भी कम ही लोगों के नसीब में आता है। केन्द्रीय मंत्री और ग्वालियर के सबसे बड़े भाजपा नेता नरेन्द्र सिंह तोमर ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सिंधिया हैं क्या जो उनका फोटो लगे? माधवराव सिंधिया ने ज्योतिरादित्य के लिए बहुत समृद्ध राजनीतिक विरासत छोड़ी थी। ग्वालियर के लोगों को आज अपने माधव महाराज ज्यादा याद आ रहे हैं। ग्वालियर में माना नहीं जाता कि उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें कैलाशवासी कहा जाता है। वे हिमालय पर वापस रहने चले गए। ऐसे ग्वालियर के लोगों में माधवराव के भी प्राण बसते थे। 1985 में रेल मंत्री बने तो ताज एक्सप्रेस को आगरा से ग्वालियर ले आए। आगरा वाले भारी नाराज बोले ताजमहल को भी ले जाओ! माधवराव धीरे से बोले अगर संभव होता तो ले भी आता। किसी ने राजीव गांधी से बोला इन्हें जहाजरानी मंत्री मत बना देना। नहीं तो सबसे पहले ग्वालियर में बंदरगाह बनाएंगे। और फिर पूछेंगे कि समन्दर कौन सा ठीक रहेगा। अरब सागर या प्रशांत महासागर! वे सच्चे अर्थों में विकास पुरुष थे। ज्योति को आज गद्दार से लेकर विनाश पुरुष तक कहा जा रहा है। कोरोना की चपेट में जितने नेता, कार्यकर्ता आते जा रहे हैं ज्योतिरादित्य के खिलाफ गुस्सा उतना ही बढ़ता चला जा रहा है।

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