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विस्थापित कर्मचारियों की गैर-हाज़िरी है सिरदर्दी

इन कश्मीरी पंडित विस्थापित कर्मचारियों में से अधिकतर की नियुक्ति प्रधानमंत्री पैकेज में हुई थी और इनको कश्मीर घाटी के विभिन्न हिस्सों में नियुक्त किया गया था। इन कश्मीरी पंडित विस्थापित कर्मचारियों की संख्या 5500 के करीब है।… कुछ लोग कश्मीर के हालात को एक विशेष चश्मे से देखते रहे हैं। इस तथ्य को नजरअंदाज करते है कि आतंकवादी गैर-कश्मीरी पंडित विस्थापित सरकारी कर्मचारियों पर भी हमले करते रहे हैं। कश्मीर में रह रहे गैर-कश्मीरी हिन्दू कर्मचारियों और सिख समुदाय पर भी हमले होते रहे हैं ।

जम्मू-कश्मीर रिपोर्ट

कश्मीर घाटी में अपने आप को असुरक्षित मान रहे कश्मीरी पंडितों के विस्थापित सरकारी कर्मचारियों और प्रदेश सरकार के बीच कोई चार महीने से गतिरोध है। हाल ही में सरकार ने एक कड़े आदेश में उन तमाम कश्मीरी पंडित विस्थापित सरकारी कर्मचारियों का वेतन रोक दिया है जो सुरक्षा कारणों का हवाला देकर अपने कार्यालयों से पिछले चार महीनों से गैर-हाज़िर चल रहे हैं । सरकार के इस ताज़ा आदेश के सामने आने के बाद कश्मीरी पंडित विस्थापित सरकारी कर्मचारियों और प्रदेश सरकार के बीच किसी तरह के समझौते की गुंजाइश फिलहाल नही दिख आ रही है।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष 12 मई को राजस्व विभाग के एक कश्मीरी पंडित विस्थापित कर्मचारी राहुल भट्ट की आतंकवादियों द्वारा की गई हत्या के बाद कश्मीरी पंड़ित विस्थापित कर्मचारी अपनी ड्यूटी से गैर हाज़िर हो गए थे। इन कर्मचारियों में से अधिकांश ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कश्मीर घाटी भी छोड़ दी थी व जम्मू या अन्य जगहों को लौट गए थे। जम्मू में लगभग चार महीनों से यह विस्थापित कर्मचारी प्रदर्शन भी कर रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि उनकी नियुक्ति कश्मीर घाटी से बाहर की जाए। विस्थापित कर्मचारियों का कहना है कि घाटी में उनकी जान को खतरा है और उनके लिए घाटी में काम करना आसान नही है ।

इन कश्मीरी पंडित विस्थापित कर्मचारियों में से अधिकतर की नियुक्ति प्रधानमंत्री पैकेज में हुई थी और इनको कश्मीर घाटी के विभिन्न हिस्सों में नियुक्त किया गया था। इन कश्मीरी पंडित विस्थापित कर्मचारियों की संख्या 5500 के करीब है।

गैर हाज़िर रहने वाले कर्मचारियों के साथ अभी तक जम्मू-कश्मीर सरकार बेहद नरमी से पेश आ रही थी और लगातार गैर हाज़िर रहने के बावजूद कुछ एक विभागों को छोड़कर अन्य ने इन कर्मचारियों का अगस्त माह तक का वेतन जारी कर दिया था । मगर अब सरकार ने अचानक सख़्ती करते हुए तमाम गैर हाज़िर रहने वाले कर्मचारियों का सितंबर माह से वेतन रोक लिया है। सरकार के इस आदेश को कश्मीरी पंडित विस्थापित नेता सरकार की तरफ़ से उठाया गया ‘एक तरफा कदम’ बता रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि ‘सरकार दबाव बना कर कर्मचारियों को वापस घाटी भेजना चाहती है’ ।

सरकार के लिए विकट स्थिति

दरअसल यह सारा मामला बेहद संवेदनशील होने के साथ-साथ उलझा हुआ भी है । प्रदेश सरकार के साथ-साथ केंद्र के लिए भी स्थिति विकट बनी हुई है ।कश्मीरी पंड़ित विस्थापित कर्मचारियों के लगातार गैर हाज़िर रहने से यहां एक तरफ प्रशासनिक स्तर पर समस्याएं पैदा हो रही हैं वहीं उन प्रयासों को भी धक्का पहुंच रहा है जो सरकार ने कश्मीरी पंडित विस्थापित समुदाय के घाटी में पुनर्वास के लिए उठा रखे हैं ।

हड़ताली गैर हाज़िर रहने वाले विस्थापित पंडित कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें उनके पद-वेतन व अन्य सेवा शर्तों के साथ कश्मीर से बाहर कहीं नियुक्त किया जाए। लेकिन सरकार का कहना है कि यह किसी भी तरह से तकनीकी व व्यवहारिक रूप से न्यायसंगत नही है कि कश्मीरी पंडित विस्थापित कर्मचारियों को पद-वेतन व अन्य सेवा शर्तों के साथ कश्मीर से बाहर स्थानांतरित कर दिया जाए । ऐसा इसलिए भी संभव नही है क्योंकि प्रधानमंत्री पैकेज के तहत विशेष तौर पर कश्मीर घाटी के लिए ही यह नियुक्तियां की गई थीं । कहीं न कहीं सरकार का इरादा यह भी था कि इन नियुक्तियों की मदद से घाटी छोड़ चुके कश्मीरी पंड़ित समुदाय को वापस घाटी में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया जाए । लेकिन जिस तरह से इस साल के शुरू में कुछ विस्थापित कर्मचारी राहुल भट्ट सहित कुछ अन्य कश्मीरी पंडितों की घाटी में हत्याएं हुई उससे कश्मीरी पंडित विस्थापित कर्मचारियों में भय पैदा हुआ और वे गैर हाज़िर हो गए ।

गैर-कश्मीरी कर्मचारी हो रहे हैं हाज़िर

दूसरी तरफ कश्मीर घाटी में आज भी बिना किसी शिकायत के बड़ी संख्या में घाटी के बाहर के गैर-कश्मीरी कर्मचारी लगातार अपनी नौकरी कर रहे हैं । पुलिस, अदालतों और सचिवालय सहित कई अन्य विभागों में बड़ी तादाद में गैर-कश्मीरी सरकारी कर्मचारी काम कर रहे हैं । इनके अलावा जम्मू-कश्मीर के विभिन्न हिस्सों के रहने वाले अनुसूचित जातियों से संबंधित हज़ारों सरकारी कर्मचारी भी हैं जो घाटी के लगभग सभी जिलों और हिस्सों में कार्यरत हैं।

उल्लेखनीय है कि कश्मीर घाटी में बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है। ऐसे में अनुसूचित जातियों के लिए जिला स्तर पर ‘आरक्षित’ होने वाली तमाम नौकरियों के लिए कश्मीर घाटी के बाहर से प्रदेश के अन्य हिस्सों के रहने वाले अनुसूचित जातियों के उम्मीदवार ही आवेदन करते रहे हैं और उन्हें ही वह ‘आरक्षित’ नौकरियां मिलती रही हैं । ऐसा  2008 में उमर अब्दुल्ला सरकार के कार्यकाल में अनुसूचित जातियों के उम्मीदवारों को किसी भी जिले में नौकरी के लिए आवेदन करने की छूट मिलने से संभव हो सका था।  इस नीति की बदौलत जम्मू संभाग से अनुसूचित जातियों के लोग बेखौफ होकर सरकारी नौकरी के लिए कश्मीर के दूर-दराज के हिस्सों तक में जाने लगे। यह सिलसिला लगातार जारी है और इस समय भी लगभग आठ हज़ार से अधिक अनुसूचित जातियों के लोग कश्मीर घाटी के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न सरकारी विभागों में कार्यरत हैं।

इस साल 16 जून को कुलगाम के गोपालपुर इलाके में आतंकवादियों ने जिस महिला शिक्षिका रजनी बाला की हत्या कर दी थी वह अनुसूचित जाती से ही संबंधित थी और पिछले कई वर्षों से अपने पति के साथ कश्मीर में नौकरी कर रही थी। इसी तरह से सात अक्तूबर 2021 को श्रीनगर में एक कश्मीरी पंडित अध्यापक के साथ एक महिला सिख अध्यापक की भी हत्या कर दी गई थी । लेकिन इस तरह की घटनाओं के बावजूद 1990 से ही कश्मीर घाटी के विभिन्न इलाकों में बड़ी संख्या में सिख समुदाय रह रहा है ।

कुछ लोग कश्मीर के हालात को एक विशेष चश्मे से देखते रहे हैं । हालात को ईमानदारी के साथ बड़े परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है। यह कहना पूरी तरह से गलत है कि आतंकवादियों के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ कश्मीरी पंड़ित विस्थापित कर्मचारी ही रहे हैं और उन्हीं को आतंकवादियों से खतरा है । आतंकवादी गैर-कश्मीरी पंडित विस्थापित सरकारी कर्मचारियों पर भी हमले करते रहे हैं और उनके निशाने पर कश्मीरी मुस्लिम सरकारी कर्मचारी भी रहा है। कश्मीर में रह रहे गैर-कश्मीरी हिन्दू कर्मचारियों और सिख समुदाय पर भी हमले होते रहे हैं ।

वापस लौटने का नही है उत्साह                   

कश्मीरी पंडित विस्थापित सरकारी कर्मचारियों के गैर-हाज़िर रहने का मामला दरअसल समस्या के एक दूसरे पक्ष की ओर भी इशारा करता है । राजनीतिक कारणों से भले ही विस्थापित पंडितों को वापस घाटी में बसाने की मांग की जाती रही हो मगर व्यवहारिक तौर पर और वास्तविकता में परिस्थितियों में बहुत बदलाव आ चुका है । कश्मीरी पंडित समुदाय को वापस कश्मीर में बसाने की मांग करने वाले दरअसल वास्तविक हालात पर नज़र नही दौड़ाते और व्यवहारिक ढंग से सोचते नज़र भी नहीं आते हैं । आज बड़ा सवाल यह है कि क्या खुद कश्मीरी पंडित विस्थापित समुदाय वापस कश्मीर लौटने को लेकर उत्साहित हैं ?

घाटी के हालात और बहुसंख्यक समुदाय को अक्सर कोसने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि आज कश्मीरी पंडित विस्थापित समुदाय के भीतर ही वापस लौटने का कोई विशेष उत्साह शेष नही बचा है । यह बात कहने-सुनने में भले ही कड़वी लगे मगर यह एक सच्चाई है कि अधिकतर विस्थापित पंडित परिस्थितियों वश ही सही मगर देश के विभिन्न हिस्सों में स्थाई रूप से बस चुके हैं । दिल्ली से लेकर सुदूर केरल तक में पंड़ित समुदाय फैल चुका है। बीते सालों में बड़ी संख्या में विदेशों में भी पंड़ित समुदाय बस गया है । विस्थापित पंडितों को कश्मीर छोड़े हुए 32 साल हो चुके हैं। ऐसे में दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर में पैदा होने वाली और पली बड़ी नई पीढ़ी का कोई विशेष भावनात्मक लगाव भी कश्मीर से नही रह गया है । यहां तक कि जिन पंड़ित विस्थापितों ने 1990 में जम्मू में शरण ली थी उनमें से भी बड़ी संख्या में विस्थापितों ने जम्मू को छोड़ दिया है और देश के अन्य हिस्सों में स्थाई रूप से अपना ठिकाना बना लिया है । कश्मीरी पंडित स्वभाव से प्रगतिशील रहा है और पढ़ा लिखा होने का कारण हमेशा से आगे बढ़ता रहा है ।

इसके विपरीत उन कश्मीरी पंडितों को हर प्रकार से मज़बूत करने की आवश्यकता है जिन्होंने तमाम तरह के उकसावों के बावजूद कश्मीर घाटी को कभी नही छोड़ा । ऐसे लगभग 800 कश्मीरी पंडित परिवार हैं जो लगातार 1990 से घाटी में रहे रहे हैं । विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इन कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर घाटी से कभी भी निकलना ठीक नही समझा । यहां तक कि इन लोगों को विस्थापित पंड़ित समुदाय की उलाहना की शिकार भी होना पड़ा मगर बावजूद इसके यह परिवार घाटी में डटे रहे । यह विडंबना ही है कि इन परिवारों की सुध न तो सरकार ने कभी ली और न ही किसी राजनीतिक दल ने कभी इनकी आवाज़ को उठाना मुनासिब समझा । खुद कश्मीरी पंडित समुदाय के संगठनों ने भी इन्हें नज़रअंदाज़ ही किया है । कश्मीरी पंडित समुदाय के जिन लोगों ने 1990 में कश्मीर घाटी से पलायन कर दिया था उन्हें तो देश भर से खूब मदद मिली मगर जिन लोगों ने घाटी न छोड़ने की हिम्मत दिखाई उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया । ज़रूरत इस बात की है कि आतंकवाद के बावजूद 1990 से लगातार कश्मीर में रहने वाले कश्मीरी पंडितों की हिम्मत बढाई जानी चाहिए ।

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के नेतृत्व में आज भी कश्मीर घाटी से पलायन न करने वाले  कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग अपने हकों की लड़ाई लड़ रहे है।

भारतीय जनता पार्टी से है नाराज़गी

कश्मीरी पंडित विस्थापित कर्मचारियों और प्रदेश सरकार के बीच पैदा हुए गतिरोध के कारण कश्मीरी पंडित समुदाय में भारतीय जनता पार्टी को लेकर नाराज़गी भी बढ़ी है । विस्थापित पंडित समुदाय में यह राय तेज़ी से बन रही है कि जिस ताकत से सत्ता में आने से पहले भारतीय जनता पार्टी विस्थापितों के मुद्दों को उठाया करती थी अब वैसा नही करती । कश्मीरी पंडित विस्थापित सरकारी कर्मचारियों के मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी की खामोशी भी नाराज़गी का कारण बन रही है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय कश्मीर से पलायन के बाद से भारतीय जनता पार्टी का समर्थक रहा है। भारतीय जनता पार्टी भी विस्थापितों की समस्याओं को लगभग हर मंच पर पूरी ताकत से उठाती रही है । मगर ताज़ा हालात में कश्मीरी पंडित समुदाय की भारतीय जनता पार्टी से नाराज़गी बढ़ रही है । कई पंडित नेता अब पार्टी पर पंडितों की उपेक्षा का भी आरोप लगाने लगे हैं । हाल ही में विस्थापित कश्मीरी पंड़ित समुदाय के प्रमुख संगठन पनुन कश्मीर के नेता अग्निशेखर ने सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय की अनदेखी करने का आरोप लगा चुके हैं

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