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भाजपा से क्या कश्मीर समस्या का स्थाई समाधान?

पांच राज्यों के चुनावों की सारी मेहनत निष्फल है यदि कश्मीर में प्रधानमंत्री मोदी एक सर्व सम्मत सरकार नहीं बनवा पाए! 370 हटाए जाने के बाद से पूरी दुनिया की निगाहें कश्मीर पर लगी हुई हैं। इसे प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपनी सफलता मान सकते हैं कि कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद अब राजनीतिक दलों के बीच यह मुद्दा खत्म होता चला जा रहा है। लेकिन उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम है कि कश्मीर के मामले में घरेलू राजनीति में तो हमेशा सहमति और आम राय की गुंजाइश रहती है, मगर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाना आसान नहीं है।पाकिस्तान के नेताओं के लिए अपनी जनता को उलझाए रखने के लिए कश्मीर से अच्छा कोई मुद्दा नहीं है। अमेरिका और चीन आपस में चाहे जितने तेवर दिखा लें, मगर कश्मीर के मामले में वे दोनों पाकिस्तान को हवा देते रहते हैं। इसी तरह इंग्लेंड और यूरोपीय देश कश्मीर पर भारत, पाकिस्तान दोनों को खुश रखने वाली दोहरी चालें चलते रहे हैं।

बाइडेन के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार जो महत्वपूर्ण अमेरिकी मंत्री भारत आए उनके तेवर देखकर कूटनीति के विषेशज्ञ समझ गए हैं कि भारत पर सवाल खड़े करने का उनका असली मकसद क्या है? अमेरिका कोई लोकतंत्र का, मानवाधिकारों का बहुत बड़ा समर्थक नहीं है। वह इन सबका स्वघोषित ठेकेदार है। अगर वह वास्तविक रूप से लोकतंत्र का रक्षक होता तो उसे सबसे पहले वहां की संसद पर हमला करने के उकसाने के आरोप में ट्रंप को सखींचों के अन्दर कर देना चाहिए था। अमेरिका के “खुद मियां फजीहत दूसरों को नसीहत” का यह सबसे बड़ा उदाहरण है कि उसके दो सौ साल से ज्यादा के लोकतांत्रिक इतिहास को चैलेज करने के बाद भी आज ट्रंप पर कोई कानूनी कारर्वाई नहीं हो रही है। जबकि दूसरे देशों में चाहे वह विएतनाम हो, कोरिया हो, इराक हो, अफगानिस्तान हो या कोई भी कमजोर देश वह उनके घर में घुसकर मानवाधिकारों का हनन करता है। भारत का लोकतंत्र उसे खतरे में लगता है मगर बर्मा का सैनिक शासन उसे चिंतित नहीं करते है। सऊदी अरब उसका सबसे बड़ा समर्थक है इसलिए शब्द मानवाधिकार को भी वह उधर जाने भी नहीं देता। लेकिन ईरान में मानवाधिकारों और लोकतंत्र की वह हमेशा चिंता करता रहता है।

यहां उद्देश्य अमेरिका पर प्रहार करना या देश में उठ रहे सवालों को दबाने का नहीं है, मूल बात है कश्मीर पर अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की रूचि और उनके निहित स्वार्थों को उजागर करना। तीन दशक से ज्यादा समय से पाक समर्थित आतंकवाद झेल रहे कश्मीर में भी अब ये बात स्पष्ट हो गई है कि कश्मीर का भविष्य भारत से जुड़ा हुआ है और इस समस्या का शांतिपूर्ण समाधान कोई भाजपा सरकार ही कर सकती है।

सुनने में यह बात बड़ी आश्चर्यजनक लगती है मगर सही यही है कि कांग्रेस की किसी सरकार में यह साहस नहीं था कि वह कश्मीर में कोई पहल कर सके। यह कोई अनायास या चांस की बात नहीं थी कि दस साल के शासनकाल में मनमोहन सिंह एक बार भी पाकिस्तान नहीं गए हों। और यहां यह बताने में भी कोई हर्ज नहीं है कि उनसे पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे नरसिंहा राव पांच साल में एक बार भी कश्मीर नहीं गए! उधर दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुला लिया। इसी तरह वाजपेयी के बस लेकर लाहौर जाने को समझा जा सकता है।

कश्मीर के लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कश्मीर में स्थाई शांति का रोडमेप भाजपा के राज में ही तैयार होगा। खुद भाजपा यह काम कर सकती है और अपनी राजनीति भी बरकरार रख सकती है। मगर कांग्रेस ऐसा सोच भी नहीं सकती। उसके लिए यह ऐसा दुस्साहस हो जाएगा कि राजनीति में उसे जवाब देना मुश्किल कर दिया जाएगा। इसीलिए आज कश्मीर का चुनाव जो इन पांच राज्यों के चुनावों के बाद संभावित है सबसे अहम सवाल बन गया है। दूसरों के लिए जो कश्मीर एक नाजुक मसला है, वहीं भाजपा के लिए एक कठोर फैसला लेने का मौका! लेकिन यहीं भाजपा को एक बात याद रखना होगी। कल्हण की राजतरंगिणी की एक पंक्ति! केवल एक पंक्ति – “ कश्मीर पर विजय पुण्य (प्रेम) की शक्ति से ही पाई जा सकती है, किसी शस्त्र से नहीं

प्रधानमंत्री मोदी ने यह किया। एकदम विपरीत विचारों वाली महबूबा मुफ्ती के साथ सरकार बनाकर। उस प्रयोग की बहुत आलोचना हुई मगर यह बात सिद्ध हुई कि केवल मुहावरे की बात नहीं है, वास्तविकता में भी “राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता!“ आज कश्मीर के उसी प्रयोग को और विस्तार देने की आवश्यकता है। धारा 370 खत्म करने के पक्ष-विपक्ष से अब राजनीति बहुत आगे जा चुकी है। झेलम का तेज प्रवाह कई चीजों को बहा ले गया है। जिन्होंने डोडा में जहां से प्रधानमंत्री मोदी के विश्वस्त और उनके प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री डा जितेन्द्र सिंह जीतकर आते हैं झेलम का प्रबल वेग देखा है वे जानते हैं कि कश्मीर का यह दरिया कितनी तेजी के साथ सब कुछ उलट पुलट कर देता है। आज कश्मीर में वही स्थिति है। कश्मीर के लोगों ने इन 32 साल के खून खराबे में अपनी दो पीढ़ियों को बर्बाद होते देखा है। आम लोगों ने आर्थिक तबाही देखी है।

आपदा में अवसर तो देश में अभी कहा जाने लगा, मगर कश्मीर में तो यह हमेशा से होता रहा है। 1990 की शुरूआत में जब आतंकवाद चरम पर था तो नरसिंह राव सरकार के गृहमंत्री एसबी चव्हाण जम्मू कश्मीर आए थे। उन्होंने बिफरते हुए कहा था कि केन्द्र से जो हजारों करोड़ रुपया कश्मीर आता है वह जाता कहॉं है? उनका निशाना जम्मू कश्मीर के नेताओं, अफसरों और सत्ता से जुड़े कुछ हजार परिवारों पर था। राज्य में एक तरफ बेइंतहा भ्रष्टाचार और दूसरी तरफ बिना रोजगार धंधे के आम आदमी की मुश्किलों से भरी जिदंगी थी। भ्रष्टाचार कैसा था?

क्या किसी राज्य में एक पत्रकार से उसके जायज एवं सामान्य काम के लिए भी पैसे मांगे जा सकते हैं? आप कहेंगे पत्रकार क्या  है? अगर वह कुछ रहा हो तो भी! ठीक है इनफार्मेशन (सूचना विभाग) का डायरेक्टर जो जगमोहन, गैरी सक्सैना, जनरल राव जैसे राज्यपाल से सीधे निर्देश लेता हो? उसे देना पड़ें! उसे भी नहीं मानेंगे! चलिए तो मंत्री!  इतना प्रभावशाली कि मुख्यमंत्री भी उसके विभाग में कुछ नहीं बोलता हो! तो उसे भी यह कहकर अपनी जेब से पैसे देना पड़े हों कि यार छड्ड! वह नहीं मानेगा। दे उसे और अपना आर्डर निकलवा! ऐसे खराब सिस्टम में उलझ गए कश्मीर के बारे में राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कोई बहुत बढ़ा चढ़ाकर नहीं कहा था कि फैक्स खराब था और कुक के नहीं आने से खाना उन्हें खुद लेकर खाना पड़ा था। तो कश्मीर में करीब एक हजार साल पहले हुए कवि इतिहासकार कल्हण ने उस समय जो प्रेम से जो जनता को जीतने की बात कही थी वह आज भी उतनी ही सत्य है।

केवल 370 हटाने से ही जम्मू कश्मीर का समाधान नहीं हो जाता। वहां अगले कदम के तौर पर एक चुनी हुई ऐसी सरकार बनवानी होगी जो पूरे जम्मू कश्मीर के दोनों खित्तों (अंचलों) की भावनाओं के अनुरूप हो और उसमें ज्यादा से ज्यादा वर्गों का प्रतिनिधित्व हो। पाक समर्थित आतंकवाद के भीषण दौर के बीच 1996 का जब विधानसभा चुनाव हुआ तो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मैसेजिंग यही करने की कोशिश की गई थी कि यह पापुलर (लोकप्रिय) सरकार है। मगर धन्य हो फारुक अब्दुल्ला का कुशासन कि उसने इसे अति अलोकप्रिय सरकार बना दिया। जगह की कमी की वजह से अभी यहां बस इतना ही कि सरकार दो अफसर चलाते थे! 6 साल सरकार उनके हाथों में रही। इनमें से एक चीफ सैकेट्री थे, दूसरे मुख्यमंत्री के प्रिन्सीपल सैकेट्री। जिनके परिवार तो छोड़िए कुत्ते भी स्टेट प्लेन में घूमते थे! वहां अब एक नए मुख्यमंत्री और नई पहल की जरूरत है। उसके बाद ही  दुनिया में सही और स्पष्ट मैसेज जाएगा। जिसे पाकिस्तान को भी सुनना पड़ेगा। वहीं से कश्मीर के स्थाई समाधान की सूरत निकलेगी!

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राजनीति

इस बार लेफ्ट रहेगा दूसरे मोर्चे में

left parties

आजाद भारत के इतिहास में वामपंथी पार्टियां हमेशा तीसरे मोर्चे की राजनीति का केंद्र रही हैं। जब कांग्रेस की सरकार होती थी और दूसरी धुरी भारतीय जनसंघ या स्वतंत्र पार्टी जैसी पार्टियां होती थीं तब तीसरा मोर्चा कम्युनिस्टों का होता था। समाजवादी पार्टियों के साथ टकराव के बावजूद कम्युनिस्ट हमेशा तीसरा मोर्चा बनाते रहे, जिसमें समाजवादी पार्टियां भी शामिल होती रहीं। इसके एकाध अपवाद रहे हैं। लेकिन इस बार कम्युनिस्ट पार्टियां तीसरे मोर्चे से बाहर हैं। ममता बनर्जी, शरद पवार, वाईएस जगन मोहन रेड्डी या के चंद्रशेखर राव जैसा कोई नेता वामपंथियों को नहीं पूछ रहा है। ऊपर से वामपंथी पार्टियों ने केरल में आमने-सामने की लड़ाई के बावजूद अपनी किस्मत कांग्रेस के साथ जोड़ ली है।

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ध्यान रहे इस समय कम्युनिस्ट पार्टियां दो राज्यों में कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार का समर्थन कर रही हैं। बिहार और तमिलनाडु में कांग्रेस और कम्युनिस्ट एक साथ सत्तारूढ़ पक्ष में हैं और पश्चिम बंगाल में दोनों कई सालों से मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं। सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी और सीपीआई के सबसे बड़े नेता डी राजा के साथ राहुल के निजी संबंध बहुत अच्छे हैं। येचुरी और राजा बिना शर्त राहुल का समर्थन कर रहे हैं। इसलिए चुनिंदा प्रादेशिक पार्टियों के साथ मिल कर अगर राहुल गांधी दूसरा मोर्चा बनाते हैं या नया यूपीए बनाते हैं तो उसमें कम्युनिस्ट पार्टियां रहेंगी।

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यह अनायास नहीं है कि जिन दो प्रादेशिक नेताओं- एमके स्टालिन और तेजस्वी यादव से राहुल के संबंध अच्छे हैं, उनके साथ कम्युनिस्ट पार्टियों भी बहुत सहज भाव से जुड़ी हैं। इसलिए यह तय है कि अगले चुनाव में भाजपा के विरोध में जो मजबूत दूसरा मोर्चा बनेगा उसमें कई बड़े प्रादेशिक क्षत्रपों के साथ कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल होंगी। यह तीसरा मोर्चा बना रहे नेताओं पर निर्भर करेगा कि वे तीसरा मोर्चा बना कर भाजपा विरोधी वोट का बंटवारा करा कर भाजपा की जीत का रास्ता बनाते हैं या दूसरे मोर्चे को मजबूत करते हैं।

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