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लार टपकाते नकटों के गांव में

जिन्हें भौतिक मौज़-मज़े का आनंद लेना है, उन्हें नकटापन मुबारक हो! जिन्हें सल्तनत की ड्योढ़ी पर द्वारपाली करने में गुमान होता है, उन्हें नकटापन मुबारक हो! जिन्हें आए नवाब आए, आए नवाब आएकी तान लगा कर अपना जीवन धन्य लगता है, उन्हें नकटापन मुबारक हो! बूचों के श्रंखलाबद्ध सामूहिक प्रयास से समूची पृथ्वी अगर किसी दिन नकटों का विश्वग्राम बन भी गई तो मैं कौन-सा वह दिन देखने को मौजूद रहूंगा! अपनी आप जानें।

मैं नकटा हूं। सब से बड़ा नकटा। और, मुझे अपने नकटे होने पर गर्व है। दुनिया में जितने भी नकटे हैं, उन्हें अपने नकटे होने पर गर्व होना चाहिए। जो नहीं हैं, उन्हें लाज आनी चाहिए कि वे नकटे नहीं हैं। वे भी नकटे होते तो संसार की सारी समस्याओं का समाधान बैठे-बैठे हो जाता। जितनी परेशानियां हैं, इन्हीं अ-नकटों की वज़ह से हैं।

जब तक मेरे माता-पिता थे, मैं नकटा नहीं था। उन के सामने मुझे नकटा होने की ज़रूरत ही कभी महसूस नहीं हुई। वे मेरी नाक के रक्षक बने रहे। लेकिन अब अपने बच्चों के सामने मैं नकटा हूं। बहुत संभाल कर रखने की कोशिश की, मगर बच्चों ने छीन-छान कर मेरी नाक पता नहीं कहां फेंक दी। जब तक मेरी शादी नहीं हुई थी, तब तक भी मैं नकटा नहीं था। कन्या-मित्रों से नाक-से-नाक अड़ा कर बात करता था। इस चक्कर में कई भाग गईं। कइयों ने मेरी नाक के सामने अपनी नाक नीची कर ली और बनी रहीं। मगर अब पत्नी के सामने मैं नकटा हूं। क्योंकि न तो वह भागने वाली है और न अपनी नाक नीची करने वाली है।

बहन-भाइयों, नाते-रिश्तेदारों और मित्रों-परिचितों के दायरे में मेरा नकटापन ही अब मेरी नियति है। अपनी बाकी नियतियों को मैं ने कभी स्वीकार नहीं किया, लेकिन इस नियति को कर लिया है। इसलिए कि और कोई विकल्प मेरे पास है ही नहीं। सो, उन की नाक के लिए अपनी कटवा कर जेब में रख ली है। उन की नाकें भले ही कितनी ही थुलथुल और भोंडी हों और मेरी कितनी ही सुतवां और सुंदर, बलिदान तो मेरी ही नाक का होना था, सो, हो गया।

27 साल सक्रिय पत्रकारिता में मैं नाक ऊंची किए दनदनाता फिरता रहा। ऐसे संपादक मिले, जिन्होंने मेरी नाक की क़द्र की, लेकिन ऐसे-ऐसे संपादक भी मिले, जिन्होंने मेरी नाक पर दिन-रात अपना रंदा चलाने की कोशिशें कीं। ऐसे सभी संपादकों को मैं ने खूब नाक रगड़वाई। मालिक मूलतः शालीन बने रहते थे, लेकिन अपने कारिंदों को हर रोज़ एक निश्चित संख्या में नाकें काट कर बोर्ड-रूम की मेज़ पर सजाने का टारगेट दिए रहते थे। सो, ये कारिंदे भी हाथ धो कर मेरी नाक के पीछे पड़े, मगर उन्हें भी मैं ने अपनी नाक नहंी छूने दी तो नहीं ही छूने दी। लेकिन अंततः अपनी नाक बचाने के लिए मुझे पत्रकारिता की नौकरी छोड़ ही देनी पड़ी। जिस पेशे को मैं ‘सर्वजन नाक सुरक्षा अभियान’ मानता था, उस में रहते ख़ुद ही नकटा हो जाता तो क़यामत के दिन किस-किस को क्या-क्या जवाब देता? सो, नाक बचा कर धड़धड़ाते हुए बाहर निकल आया।

एक आसमान से दूसरे आसमान पर छलांग लगाई। लेकिन जिसे दूसरा आसमान समझा था, वह खजूर का पेड़ निकला। उस में अटक गया। अब तक अटका हुआ हूं। नकटा होना सब से बड़ी योग्यता है। नकटे में जो प्रतिभा होती है, किसी में नहीं होती। नकटे की लोकप्रियता असीम होती है। नकटों को हर जगह प्राथमिकता मिलती है। लेकिन राजनीति के अलावा मैं ने ऐसा दूसरा कोई धंधा नहीं देखा, जिस में प्रवेश की बुनियादी शर्त ही नकटा होना हो। बाकी सारे पेशों में भर्ती के समय नकटा होने के अतिरिक्त अंक तो ज़रूर अपने आप मिल जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि आप नकटे नहीं हैं तो आप को अवसर ही नहीं मिलेगा। सियासी संसार अकेला ऐसा है, जिस के दरवाज़े पर लगा स्कैनर नाक की भनक पाते ही ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगता है।

जब मैं राजनीति की दुनिया का प्रवेश द्वार पार कर रहा था, तब यह स्कैनर मालूम नहीं कहां ऊंघ रहा था? सो, सियासी-संसार में हौले से मेरा प्रवेश हो गया। लेकिन बिना नाक की शक़्लें जल्दी ही समझ गईं कि एक अजीब शक़्ल वाला उनकी बगल में आ कर पता नहीं कैसे बैठ गया है। निन्यानबे फ़ीसदी बूचे चेहरों में एक फ़ीसदी स-नाक शक़्लें अजीबोग़रीब तो लगेंगी ही। गली नाक वाला चेहरा देख कर जैसे आप नाक-भौं सिकोड़ते हैं, तुर्रेदार नाक वाली शक़्ल देख कर उस से भी ज़्यादा अछूत-भाव नकटों में पैदा होता है। लेकिन मैं ने इस की परवाह न करने का फ़ैसला ले लिया था। सब से बड़ों ने तो कभी नहीं कहा, मगर उन के सब से नज़दीक रहने वाले बड़े-बड़ों ने चेतावनी दी कि आगे बढ़ना है तो जितनी जल्दी हो सके, नाक कटवा लो। शुभचिंतक के नाते जितना वे मुझे समझाते, मैं अपनी नाक के प्रति भीतर से उतना ही दृढ़ होता जाता।

किसी भी मामले में अपनी नाक घुसाने की ललक मुझ में कभी नहीं रही। नाक होने का मतलब यह है भी नहीं कि ज़रूरत हो-न-हो, आप हर जगह उसे घुसाते फिरें। लेकिन ऐसा भी क्यों ज़रूरी हो कि आप अपनी नाक कटवा कर सियासत की खूंटी पर इसलिए लटका दें कि सीढ़ियां चढ़ सकें? सीढ़ियां तय करने की अगर यही शर्त है तो नहीं चढ़नीं ऐसी सीढ़ियां। इसलिए पंद्रह साल में मेरी राजनीतिक गीतमाला एकाध निचली पायदान से ऊपर सरक ही नहीं पाई। सर्वोच्च सिंहासनों पर बैठे ख़ैरख़्वाहों ने कभी-कभार हाथ बढ़ा कर मुझे ऊपर खींचना भी चाहा तो नीचे बिछी जाजम पर बैठे नकटे मेरे पैरों से ऐसे चिपक गए कि सर्वशक्तिमानों के हाथों की पकड़ भी ढीली पड़ गईं। नकटों के बहुसंख्यक गिरोह के सामने वे भी अपनी नाक ऊंची रखने में, एक बार नहीं, कई-कई बार, असहाय-से हो गए।

इसलिए कभी-कभी मुझे लगता है कि यह जो नाक मुझ से आगे-आगे चलती रहती है, उसे कटवा ही लूं तो बेहतर है। लेकिन फिर मुझे लगता है कि अगर ईश्वर को नाक से मानवलोक को परिचित ही न कराना होता तो वह स-नाक मनुष्य को जन्म से ही अ-नाक मनुष्य बना कर भेजता। अगर जनम से ही मुझे नाक नहीं दी गई होती तो उस का न होना मुझे क्यों अखरता? तब मैं जानता ही नहीं कि नाक होती क्या है? लेकिन अब जब मैं जानता हूं कि नाक ईश्वरीय रचना है तो मैं उसे ऐसे कैसे कटवा डालूं? हां, अगर वह अपने आप पिघल कर ग़ायब हो जाए तो बात अलग है। ऐसे में मेरी नाक इतनी तो बच जाएगी न कि मैं ने उसे ख़ुद नहीं कटवाया।

नकटों के गांव में कोई रंगबिरंगी नश्वर पगड़ी पहन कर कुछ दिन घूमने के लिए मैं भी नकटा हो जाऊं तो क्या मेरे बच्चे मुझे माफ़ करेंगे? क्या मेरी पत्नी मुझे क्षमा करेगी? क्या मेरे ज़्यादातर मित्र मुझे क्षमादान देंगे? वे सब भले ही ख़ुद के लिए मेरी नकटी शक़्ल ही पसंद करते हैं, मगर मेरे नाकविहीन चेहरे का सार्वजनीन-संस्करण देख कर तो उन्हें भी मुझ से घिन आने लगेगी। इसलिए भले ही परिजन के समक्ष अपने नकटा होने पर मुझे गर्व है, मगर लार टपकाती बूचा-मंडली के मीना बाज़ार में मैं तो बिना नाक लिए नहीं टहल सकता।

जिन्हें भौतिक मौज़-मज़े का आनंद लेना है, उन्हें नकटापन मुबारक हो! जिन्हें सल्तनत की ड्योढ़ी पर द्वारपाली करने में गुमान होता है, उन्हें नकटापन मुबारक हो! जिन्हें ‘आए नवाब आए, आए नवाब आए’ की तान लगा कर अपना जीवन धन्य लगता है, उन्हें नकटापन मुबारक हो! बूचों के श्रंखलाबद्ध सामूहिक प्रयास से समूची पृथ्वी अगर किसी दिन नकटों का विश्वग्राम बन भी गई तो मैं कौन-सा वह दिन देखने को मौजूद रहूंगा! अपनी आप जानें। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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