लव-जिहाद, यानी काफिर से नफरत!

इस्लाम मात्र एक धर्म नहीं वरन एक संपूर्ण सभ्यता है। इस के दायरे से जीवन का कोई भी पहलू अछूता नहीं। केवल मुसलमान ही नहीं, बल्कि इस्लाम न मानने वालों (काफिरों) के लिए भी पक्के इस्लामी निर्देश हैं। फिर यह सब स्वैच्छिक नहीं, बल्कि अनिवार्यतः करना, करवाना है! राजनीतिक इस्लाम, जिहाद, और शरीयत इसी का इंतजाम है। निर्देशों के उल्लंघन पर जीते-जी प्रोफेट मुहम्मद के अनुयायी कठोर दंड देंगे, और मरने के बाद अल्लाह जहन्नुम में जलाएगा।

इसी आधार पर इस्लाम में मुहब्बत और नफरत का निर्देश भी है। अरबी में इसे ‘अल वला वल बारा’ कहते हैं। हरेक मुसलमान को अल्लाह के मुताबिक ही मुहब्बत/नफरत रखनी है, विचार और व्यवहार दोनों में। सभी संबध इसी के अधीन हैं। कुरान (9-23,24) में साफ निर्देश है, ‘‘ओ मुसलमानों! अपने पिता या भाई को भी गैर समझो, अगर वे अल्लाह पर ईमान के बजाए कुफ्र पसंद करते हों। तुम्हारे पिता, भाई, पत्नी, सगे-संबंधी, संपत्ति, व्यापार, घर – अगर ये तुम्हें अल्लाह और उन के प्रोफेट, तथा अल्लाह के लिए लड़ने (जिहाद) से ज्यादा प्यारे हों, तो बस इंतजार करो अल्लाह तुम्हारा हिसाब करेगा (दंड देगा)।’’ इसे आम निर्देश जैसे भी कुरान (60-1, 3) में दुहराया गया है, ‘‘ओ ईमान वालो (मुसलमानों), मेरे दुश्मनों और अपने दुश्मनों को अपना न बनाओ। दुश्मन वे हैं जो अल्लाह के कहे से इन्कार करते हैं।… कयामत के दिन तुम्हारे नाते-रिश्ते काम नहीं आएंगे।’’

यानी अल्लाह और उस के प्रोफेट को मानने वाले से ही सदभाव रखा जा सकता है। यही ‘अल वला’ यानी प्रेम संबंध का आधार है। कुरान में 13 आयतों में यह दुहरा-दुहरा कर कहा गया है कि गैर-मुसलमानों से दोस्ती भी नहीं रखी जा सकती। उसे अपना संबंधी बनाना तो दूर रहा।

ठीक उसी का पूरक ‘अल बारा’ है। यानी जिस से अल्लाह नफरत करता है, उस से मुसलमानों को भी नफरत रखनी है। वरना वैसे मुसलमान को भी अल्लाह दंड देगा। कुरान, हदीस (प्रोफेट के कथन-कार्य), एवं सीरा (प्रोफेट की जीवनी) में अनगिनत बार मिलता है कि अल्लाह व उन का प्रोफेट काफिरों से घृणा करता और काफिरों का दुश्मन है। यही कानूनी व्यवहार रूप में शरीयत में भी लिखा है।

इस प्रकार, कथनी, करनी, विश्वास, और मनुष्य – ये सब ‘अल वला वल बारा’ के दायरे में हैं। उन चारों चीजों में अल्लाह के अनुसार ही मुहब्बत या नफरत रखनी लाजिमी है। अल्लाह जिन चीजों से खुश होता है, वे हैं – अल्लाह का जिक्र करना, जिहाद करना, अल्लाह के एक मात्र ईश्वर होने में विश्वास करना, अल्लाह को मानने वाले से प्रेम करना। जिन चीजों से अल्लाह को नफरत है – चुगलखोरी, बुतपरस्ती या व्यभिचार, अल्लाह में किसी को शरीक करना (अन्य देवी-देवता को मानना), और अल्लाह को न मानना।

अर्थात्, काफिर से कोई भी सदभाव रखना अल्लाह व उस के प्रोफेट को नामंजूर है। जिन बातों से अल्लाह और प्रोफेट को प्रेम है, उसी से मुसलमानों को प्रेम रखना है। जिन बातों से अल्लाह और प्रोफेट को नफरत है, और जिन की वे भर्त्सना करते हैं, उन से मुसलमानो को भी घृणा रखनी और भर्त्सना करनी है। यह इस्लाम के तीनों मूल ग्रंथों में ठोक-ठोक कर रखा मिलता है। कुरान तो आधे से अधिक इसी पर है कि काफिर बुरे, गंदे, और घृणित हैं। उन के लिए एक भी अच्छा शब्द या सहानुभूति नहीं है। काफिर से अल्लाह और मुसलमान घृणा ही नहीं, बल्कि ‘‘तीव्र घृणा’’ करते हैं (कुरान, 40-35)।

यह घृणा किसी गलत व्यवहार, आचरण या स्वभाव, आदि के लिए नहीं। बस अल्लाह और प्रोफेट को न मानने के लिए! सीरा में इस के विवरण है कि कई सुसंस्कृत, चरित्रवान लोगों को इस्लाम ने खत्म कर डाला क्योंकि उन्होंने अल्लाह को एक मात्र ईश्वर और मुहम्मद को प्रोफेट मानने से इंकार किया था। अतः नफरत कोई व्यक्तिगत मामला नहीं, सीधे-सीधे इस्लाम को न मानने से जुड़ा है। इस्लाम मे सब से बड़ा अपराध हत्या, जनसंहार, बलात्कार, चोरी-डाका, बच्चे के साथ दुराचार, आदि नहीं है। सब से गर्हित अपराध है: इस्लाम छोड़ देना। यानी, जो मुसलमान से काफिर बन गया। यही अल्लाह की नजर में सब से भयंकर अपराध है।

इस प्रकार, किसी काफिर से प्रेम तो दूर, सहज सदव्यवहार रखना भी इस्लामी कायदे से गुनाह है। यदि कोई मुसलमान किसी काफिर से सचमुच दोस्ती रखे, तो यह कुफ्र है। हाँ, इस का दिखावा करने की इजाजत है। यह इस्लाम में जायज है कि काफिर को धोखा दिया जाए, उस के खिलाफ षडयंत्र किया जाए, उसे अपमानित किया जाए, आदि। ताकि अंततः वह इस्लाम कबूल करे या मारा जाए।

कुल मिलाकर, ‘अल वला वल बारा’ का सिद्धांत काफिर के प्रति किसी भी तरह की सहानुभूति या वफादारी को खत्म कर देता है। व्यक्तिगत स्तर यह वही चीज है, जो राष्ट्रीय स्तर पर दारुल-इस्लाम और दारुल-हरब का सिद्धांत है। यानी जिस देश ने इस्लाम से सामने समर्पण किया, और जिस ने अभी तक नहीं किया। जैसे जिहाद द्वारा दारुल-हरब को दारुल-इस्लाम बनाना मुसलमानों का उसूल व फर्ज है, वैसे ही केवल मुसलमान से प्रेम और काफिर से घृणा भी उन का उसूल व फर्ज है। सो, राजनीतिक और व्यक्तिगत, दोनों संबंधों में कसौटी केवल अल्लाह और उन के प्रोफेट को स्वीकारना ही है।

यही कारण है कि किसी काफिर को मुसलमान से विवाह करने पर इस्लाम कबूल करना ही है। चाहे वह धनी-मानी शोहरतदार काफिर ही क्यों न हो। शर्मिला टैगोर को भी आएशा बेगम बनना पड़ता है। यह सारी दुनिया का इतिहास है। इस्लाम केवल औपचारिक सिद्धांत नहीं। जिहाद और शरीयत ने उसे पक्के तौर पर लागू करने की फुलप्रूफ व्यवस्था भी की है। जब ऐसा नहीं हो पाता, तो केवल इसलिए कि मुसलमान शासन से बाहर, कमजोर या कम संख्या में हैं। लेकिन यह स्थाई स्थिति नहीं होती। पिछले चौदह सौ सालों का इतिहास है कि जिस भी समाज में इस्लाम ने प्रवेश किया, समय के साथ उस का सफाया  हो गया। हिंसा, शोषण, प्रलोभन, छल, दबाव, अपमान, लाचारी, आदि विविध कारणों से अंततः काफिर खत्म होते रहे हैं। अरब से लेकर यूरोप, अफ्रीका, एसिया तक इस के दर्जनों उदाहरण हैं। चाहे इस में सदियों, दशकों लगे। यह आज कश्मीर में आँखों के सामने चल रहा है। इस की चर्चा नहीं होती, तो उसी अपमान और लज्जा के कारण जिस से काफिर चुप रहते हैं और इस्लाम लगातार दबाव बनाए बढ़ता जाता है।

दरअसल, भारत में ‘लव-जिहाद’ की चर्चा और उस पर उद्वेलन भी क्रिश्चियनों के कारण हो सका। वर्षों से कैथोलिक बिशप काऊंसिल, सीरियन मलाबार चर्च, जैसी संस्थाएं इस पर क्षुब्ध हैं। केरल में ‘इस्लामिक पोपुलर फ्रंट’ की छात्र शाखा ‘कैंपस फ्रंट’ ने असंख्य क्रिश्चियन और हिन्दू युवतियों को जाल में फँसा कर धर्मांतरण कराया है। बिशप काउंसिल के अनुसार गत दो दशकों में वहाँ लव-जिहाद की शिकार लड़कियों की संख्या हजारों में है। क्रिश्चियनों के चलते ही सब से पहले कम्युनिस्ट  नेता  वी. एस. अच्युतानन्दन  ने  मुख्य मंत्री पद से यह मामला उठाया  था। उन के शब्दों में, एक मुस्लिम दल ‘मनी और मैरेज’ द्वारा केरल को पूर्ण इस्लामी बनाने की योजना पर चल रहा है।

इस बीच, भारत के राष्ट्रवादी दलों, संगठनों के नेता तो सशस्त्र-जिहाद पर भी चुप रहे हैं। चाहे उन के हाथों में कितनी भी सत्ता आ जाए। उलटे मुसलमानों को भी हिन्दू कह कर, और इस्लाम की नियमित तारीफ करते हुए समस्या से ही आँखें फेर लेते हैं। यदि भारत के ‘सभी 130 करोड़ लोग हिन्दू हैं’ तब लव-जिहाद जैसी कोई चीज ही नहीं – मूँदहु आँख, कतहु कुछ नाहीं! जिस देश में काफिरों का नेतृत्व ऐसा आदर्श धिम्मी हो, तब उन का विनाश एवं इस्लाम की बढ़त और आसान है। इंशाअल्लाह!

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