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Tuesday, April 13, 2021
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कहीं देर ना हो जाए… उपचुनाव का मैदान सजने लगा…

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मध्यप्रदेश में तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान सारी सियासत विधानसभा की 24 सीट के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है । नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप उनके बयान सोशल मीडिया पर सक्रियता उप चुनाव को ध्यान में रखते हुए रफ्तार पकड़ते जा रही है।

तब मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा ने एक बार फिर जोर पकड़ा.. जिसने कांग्रेस की आक्रामकता को ध्यान में रखते हुए अंदर खाने डैमेज कंट्रोल की कोशिशें भी तेज कर दी है.. सियासी माहौल में हर बड़ा चेहरा कहीं ना कहीं अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा। चाहे फिर वह शिवराज सिंह चौहान हो या फिर सड़क पर उतर चुके दिग्विजय सिंह से लेकर बंद कमरे के बड़े रणनीतिकार कमलनाथ प्रदेश अध्यक्ष की अपनी पुरानी भूमिका में चुनाव वाले क्षेत्रों में सोशल इंजीनियरिंग को कांग्रेस के माथापच्ची में जुटे है।

संगठन स्तर पर भाजपा एक साथ कई मोर्चों पर चाहे फिर मोदी सरकार की उपलब्धियों का प्रचार प्रसार और वर्चुअल रैली के बीच संगठन चुनाव क्षेत्रों में अपनी जमावट कर रहा है ..लेकिन इन चुनाव की परिस्थितियों का निर्माण करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया अभी तक सड़क पर नजर नहीं आये.. बदलती परिस्थितियां सिंधिया को भले ही सामने आने की इजाजत नहीं दे रही ..लेकिन यदि चुनावी सक्रियता पर गौर किया जाए तो सवाल जरूर खड़ा होगा कहीं देर ना हो जाए.. चाहे वह फिर लगातार टलता जा रहा मंत्रिमंडल विस्तार हो या फिर ज्योतिरादित्य की प्रदेश की राजनीति के लिए भोपाल में मौजूदगी, कार्यकर्ता ही नहीं प्रदेश की जनता को भी इंतजार है कि सिंधिया भोपाल और ग्वालियर चंबल क्षेत्र में सामने आकर कॉन्ग्रेस के आरोपों का जवाब देकर अपनी बात खुलकर सामने रखें.. टीम शिवराज यदि सरकार की उपलब्धियों के भरोसे आगे बढ़ रही तो सियासी मोर्चे पर ज्योतिरादित्य को साबित करना होगा कि कांग्रेस ने उनके साथ अन्याय किया और भाजपा क्यों बेहतर विकल्प है।

कोरोना काल मे सियासत अपना असर दिखा रही है तब ज्योतिरादित्य के बिना मध्य प्रदेश की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती.. कांग्रेस छोड़ भाजपा की सदस्यता लेने के बाद भोपाल की सड़क से लेकर पार्टी संगठन के दफ्तर में अपने दबदबे और लोकप्रियता साबित कर चुके सिंधिया अभी तक यदि नजर नहीं आ रहे तो उसकी वजह है कोविड-19… जिसका खुलासा वह खुद कर चुके.. विशेष मौकों पर उनके वीडियो संदेश यदि वक्त का तकाजा मानकर छोड़ दिया जाए तो अभी तक ज्योतिरादित्य अपने उस अंदाज में नजर नहीं आए जिसके लिए वह पहचाने जाते हैं.. तो यह भी सच है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ,अमित शाह और जेपी नड्डा के अलावा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर उनकी प्रतिक्रिया सामने आती रही.. सिंधिया ने 3 माह के दौरान धैर्य और संयम की कसौटी पर खरा उतर कर दिखाया.. वह भी तब जब वो कांग्रेस के निशाने पर भाजपा और शिवराज से ज्यादा है ..ज्योतिरादित्य ने जो भी संदेश अभी तक दिया वह सकारात्मक और भाजपा संगठन गाइडलाइन के इर्द-गिर्द तक की सीमित रहा।

अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों की सफाई देने के लिए वह खुद आगे नही आये और ना ही उन्होंने पलटवार की अपनी कार्यशैली का आगाज नई भूमिका में अभी तक किया.. मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज को उन्होंने तब ताकत दी जब कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिराना थी.. तो जब उन्हें राज्यसभा के लिए निर्वाचित घोषित किया तब भी उन्होंने शिवराज के साथ मध्यप्रदेश में कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने का भरोसा दिलाया .. यह वह वक्त था जब भाजपा विधायकों के वोट यदि रिजेक्ट हुआ तो क्रॉस वोटिंग ने उसकी समस्या बढ़ाई थी.. कुछ यही बात पार्टी कार्यालय में अभिनंदन कार्यक्रम के दौरान भी उन्होंने एक और एक ग्यारह साबित कर दिखाने से जोड़कर कहीं थी.. राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रदेश के कुछ प्रमुख नेताओं से उनका संवाद और समन्वय बना हुआ है।

संगठन की बैठकों में भी वीडियो कांफ्रेंस के जरिए सिंधिया अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं.. कोविड-19 ने उनकी समस्या में इजाफा किया.. बावजूद इस बड़ी समस्या के वीडियो के जरिए समय-समय पर उनका चेहरा सामने आता रहा.. जब भी सामने आए तब हौसले बुलंद और चिंता चेहरे पर नहीं देखी गई .. लेकिन अंदर खाने चुनौती और समस्या से इनकार नहीं किया जा सकता.. जिन परिस्थितियों में उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन दांव पर लगाकर चौंकाने वाला फैसला लिया उसकी कल्पना तो कभी उनके सहयोगी रहे नेता तो दूर विरोधी भी जो अब अपने हो गए नहीं कर पाए थे.. ऐसे में अचानक 3 माह के लिए पर्दे के पीछे चला जाना नए सवाल खड़े करता है..जो भी हो इस नई पारी में पॉलिटिकली क्वॉरेंटाइन से उन्हें जल्द बाहर निकलना होगा।

क्योंकि शिवराज की सरकार बनाने में जिन सिंधिया समर्थक विधायकों ने निर्णायक भूमिका इस्तीफा देकर निभाई ..अब उनके भाग्य का फैसला उनके क्षेत्र के मतदाताओं को करना है ..भाजपा के लिए इन सीटों पर जीत जितनी जरूरी उससे ज्यादा सिंधिया के लिए हर सीट पर जीत सुनिश्चित करना मजबूरी से कम नहीं है.. कोई ऊंच-नीच हो गई तो फिर भविष्य में कोई भी विधायक अपने नेता के लिए इस्तीफे का जोखिम मोल नहीं लेगा.. ज्योतिरादित्य को यदि भाजपा में आगे बढ़कर लंबी पारी खेलना है तो उन्हें अब बिना समय गवाएं प्रदेश स्तर के नेता और कार्यकर्ता से के बीच प्रभावी मौजूदगी दर्ज कराना होगी.. भरोसे की कसौटी पर खरा उतर कर दिखाने का दावा अपनी जगह है लेकिन किए गए जीत के वादा को निभा कर ही दिखाना होगा ।

यह काम सिर्फ शिवराज और ज्योतिरादित्य की जोड़ी से संभव नहीं है.. बल्कि पार्टी के अंदर नेताओं से ज्यादा कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य वक्त की मांग है ..जो एक मजबूत ज्योतिरादित्य देखना चाहेंगे.. लोकसभा चुनाव हारने और फिर पार्टी छोड़ देने के बाद अपनी लोकप्रियता साबित कर दिखाने का सिंधिया के लिए इससे बेहतर मौका कोई और नहीं हो सकता.. जिनके पीछे सबसे मजबूत केडर माने जाने वाली भाजपा का नेता और कार्यकर्ता पीछे खड़ा होगा.. तो चुनाव जिताने का माद्दा कई बार साबित कर चुके शिवराज का चेहरा भी सामने होगा.. जिस के मुरीद खुद ज्योतिरादित्य हो चुके हैं.. सिंधिया ने भले ही कमलनाथ के खिलाफ सड़क पर उतर जाने की अपनी बात को सच साबित कर दिखाया.. लेकिन अभी सिंधिया का चुनाव मैदान में माहौल बनाने के लिए सड़क पर उतरना बाकी है ..अब जब मंत्रिमंडल विस्तार की नई चर्चा के बीच शिवराज कभी भी दिल्ली पहुंच सकते हैं ।

तो शिवराज की ज्योतिरादित्य से लंबे अरसे बाद यह आमने सामने की मुलाकात होगी… यानी इस बैठक में सिर्फ मंत्रिमंडल के एडजस्टमेंट पर ही चर्चा सीमित होकर नहीं रह जाएगी ..बल्कि सड़क की लड़ाई के लिए उस रोड मैप को भी अंतिम रूप दिया जा सकता है.. जिसके तहत एक बार फिर मजबूत ज्योतिरादित्य मध्यप्रदेश में नजर आएंगे.. इससे पहले वह स्क्रिप्ट भी आगे बढ़ चुकी होगी.. जिसमें सांसद बनने के बाद ज्योतिरादित्य को जल्द कैबिनेट मंत्री की शपथ दिलाई जा सकती है.. संभवत इसके बाद ही सिंधिया भोपाल पहुंचेंगे.. तो सवाल क्या मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान ज्योतिरादित्य नजर आएंगे या फिर कोरोना के क्राइटेरिया के तहत अभी 29 जून तक उनका भोपाल पहुंचना संभव नहीं होगा.. तो सवाल शिवराज भले ही अति शीघ्र मंत्रिमंडल विस्तार का दावा कर रहे क्या सिंधिया के इंतजार में यह विस्तार 29 तक टलेगा.. क्योंकि इन दिनों राज्यपाल का स्वास्थ्य ठीक नहीं है।

सवाल क्या भाजपा में सरकार के रहते सिंधिया की स्वीकार्यता को लेकर पार्टी गुटबाजी मंत्रिमंडल विस्तार के साथ वह भी तब जब उपचुनाव कहीं चर्चा का विषय तो नहीं बन जाएगी .. या फिर गुटबाजी दूर की बात हो चुकी क्योंकि खेमे बाजी और व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा रखने वाले भाजपा के जिम्मेदार नेताओं और कार्यकर्ताओं का मानस बदल चुका है.. और अब सिंधिया से उनकी प्रतिस्पर्धा शिकवा शिकायत कोई मायने नहीं रखती है .. फिर भी सवाल क्या पिछला विधानसभा चुनाव हारने वाले उन विधायकों से सिंधिया का व्यक्तिगत संवाद हो चुका है.. जिन्हें संगठन स्तर पर भरोसे में लेने की कवायद अभी भी जारी है ..या फिर इस रस्म अदायगी को पूरा करना बाकी है.. जिस तरह केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य के रिश्तो में मिठास और सामंजस्य नजर आता ..क्या वह विधानसभा क्षेत्र के अंदर कार्यकर्ताओं के बीच बूथ तक भी नजर आएगा.. जो भी हो चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई है।

क्योंकि कमलनाथ कांग्रेस की नजर उन चेहरों पर टिकी हुई जो अपने सियासी भविष्य को लेकर कभी भी पाला बदल सकते हैं.. भाजपा के पराजित कई विधायकों के बयान पार्टी के लिए अभी भी किसी समस्या से कम नहीं है.. कमलनाथ- दिग्विजय सिंह की जोड़ी नए सिरे से आगे बढ़े तब सबको ज्योतिरादित्य के मैदान में उतरने का इंतजार.. मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार अपने कार्यकाल का तीन माह पूरा कर चुकी है.. तब भाजपा मोदी सरकार पार्ट टू के 1 साल पूरा होने के मौके पर वर्चुअल रैली कर रही है.. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा इस रैली का मुख्य आकर्षण होंगे.. मोदी सरकार की उपलब्धियों पर फोकस कर भाजपा कोरोना काल में आम जनता का भरोसा जीतने की रणनीति पर काम कर रही है।

वह भी तब जब कोरोना के अलावा आर्थिक और विदेश नीति के मोर्चे पर एक साथ कई समस्याओं से केंद्र सरकार जूझ रही है.. मध्य प्रदेश में उपचुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा संगठन इन वर्चुअल रैली को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर लेकर आगे बढ़ रही… तो इसका बड़ा उद्देश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि में और निखार लाना है.. संयोग से भाजपा मध्यप्रदेश में सत्ता में लौट चुकी है …लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार का इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा.. 3 माह पूरा होने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बार फिर जल्द विस्तार के संकेत दिए तो लगे हाथ साफ कर दिया कि अंतिम विचार विमर्श के लिए वह कभी भी दिल्ली जा सकते हैं.. इस दौरे के दौरान पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के अलावा अमित शाह ही नहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया से उनकी मुलाकात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.. पिछले दिनों प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से भोपाल प्रवास के दौरान शिवराज का प्रत्यक्ष संवाद हो चुका है।

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