दल बड़े, सियासत बच्चों जैसी…

दरअसल राष्ट्रीय स्तर पर अनेक नेता ऐसे हुए हैं जिनकी कदमों की आहट अच्छे-अच्छे राजनीतिक समझ रखने वाले भी नहीं समझ पाए। इस मामले में कभी इंदिरा गांधी के निर्णय आश्चर्यचकित करते थे तो इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के निर्णय से भी देशवासी कई मौकों पर अवाक रह गए लेकिन प्रदेश में दोनों ही दलों के नेता ऐसे ऐसे कदम रख रहे हैं जिनकी आहट एक सामान्य आदमी भी समझ जाता है और उस पर फिर नेता बयान देते हैं कि हमारा इरादा ऐसा नहीं था। हमारे कहने का यह मतलब नहीं था। हमारे बयानों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। हमारी इसमें कोई भूमिका नहीं है आदि।

बहरहाल प्रदेश की राजनीति में उठापटक लगातार जारी है। मुख्यमंत्री, राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष पर सभी की निगाहें हैं। मामला अब सुप्रीम कोर्ट के हवाले है इसलिए सबकी निगाहें आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर लगी हैं लेकिन पिछले 1 सप्ताह से दो मुद्दों पर राजनीतिक बहस जारी है। सत्ताधारी दल कांग्रेस जहां लगातार भाजपा पर आरोप लगा रही है कि उसने हॉर्स ट्रेडिंग करके कांग्रेस के विधायकों को बेंगलुरु में बंधक बनाया हुआ है वहीं भाजपा लगातार सफाई दे रही है कि यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है। भाजपा का इससे कोई लेना देना नहीं है।

जबकि आम जनता भी जानती है कि कांग्रेस के नेता लगातार सरकार के खिलाफ बयान दे रहे थे, असंतोष पनप रहा था और इसी का फायदा उठाकर भाजपा ने विधायकों को दिल्ली ले जाना शुरू किया था और जब कांग्रेस को इसकी भनक लगी तो दिल्ली में ठहरे विधायकों में से कुछ को भोपाल आने में सफल हुए लेकिन पार्टी की किरकिरी होते देख भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भी सक्रिय हो गया और फिर जो खेल शुरू हुआ जो अभी तक जारी है। दोनों ही दल के नेता लगातार दावे कर रहे हैं कि उनके विधायक एकजुट हैं, पार्टी के साथ हैं, वह हमारे अपने हैं, लेकिन विधायकों को खुला छोड़ने का साहस किसी भी दल में नहीं है। भाजपा अपने विधायकों को पहले गुरुग्राम ले गई, फिर भोपाल ले आई और अब सीहोर में ठहराए हुए है जबकि कांग्रेसी अपने विधायकों को पहले जयपुर ले गई और अब भोपाल में ठहराए हुए है। दोनों ही दल अपने विधायकों को कड़ी निगरानी में रखे हुए हैं। पूरी बहस बेंगलुरु में रुके कांग्रेस के बागी 22 विधायकों पर चल रही है जिनके बारे में दोनों ही दलों के बयान हास्यास्पद लगते हैं।

कांग्रेस जहां बार-बार बयान दे रही है कि बेंगलुरु में भाजपा ने उनके विधायकों को बंधक बनाया हुआ है और जब तक वह विधायक भोपाल नहीं आ जाते तब तक फ्लोर टेस्ट नहीं कराया जा सकता जबकि भाजपा नेता कहते हैं कि बेंगलुरु में रुके विधायकों से उसका कोई लेना-देना नहीं है लेकिन दूसरी तरफ प्लेन का किराया कौन दे रहा है, भाजपा नेताओं के साथ उनकी फोटो क्यों देख रहे हैं, वे अपने इस्तीफे भाजपा नेता के द्वारा क्यों भेजते हैं, इसका कोई उत्तर भाजपा के पास नहीं है। भाजपा के नेता उनसे मिलने क्यों जाते हैं, यह भी कोई नहीं बता रहा है। बस एक बात कहते हैं कि हमारा कोई लेना-देना नहीं है और कांग्रेसी जिसे अपने विधायक कहते है उनमें से 6 को बर्खास्त करवा देती है और बाकी के खिलाफ कार्रवाई करना शुरू कर देती है।

जहां प्रदेश में लाखों-करोड़ों के घोटाले हुए हों, कांग्रेस लगभग डेढ़ सौ घोटाले भाजपा शासनकाल के गिनाती रही है, विधानसभा चुनाव के दौरान कहती रही है कि सरकार में आने पर इन पर जांच आयोग बिठाया जाएगा लेकिन डेढ़ साल में कुछ नहीं किया और हद तो तब हो गई जब मंगलवार को उसके अपने ही आदिवासी नेता बिसाहूलाल साहू जो कांग्रेस शासनकाल में प्रदेश में मंत्री रहे हैं अभी विधायक हैं उनकी ईओडब्ल्यू में शिकायत की गई है कि उन्होंने गरीबों का राशन बीपीएल कार्ड बनाकर हड़पा है। करोड़ों-लाखों घोटालों की बजाए बीपीएल कार्ड के राशन पर शिकायत करने की राजनीति तो शायद आज के बच्चे भी ना करते।

इसी तरह सरकार जिस तरह से नियुक्तियां कर रही है और धड़ाधड़ स्थानांतरण आदेश निकाल रही है, मुख्य सचिव, डीजीपी की नियुक्तियों से लेकर निचले स्तर पर भी तमाम फैसले लिए ही जा रहे हैं, कांग्रेसी नेताओं को भी विभिन्न निगम-मंडलों और आयोगों में पदस्थ किया जा रहा है इन सब कदमों से मुख्यमंत्री कमलनाथ की उस छवि को भी धक्का लगता है जो उन्होंने लंबे राजनैतिक सफर के दौरान बनाई थी और दूसरा सरकार की मजबूती के दावे भी खोखले लगने लगते हैं क्योंकि इस समय पूरी सरकार को और उनके रणनीतिकारों को सरकार को बचाने के लिए जुट जाना था जहां अधिकांश लोग नियुक्तियों और तबादलों में उलझे हुए हैं।

कुल मिलाकर प्रदेश के दोनों ही राजनीतिक दलों में अनुभवी नेताओं की भरमार है खासकर मुख्यमंत्री कमलनाथ को अनुभवी और उदारवादी चेहरा माना जाता था लेकिन जो भी निर्णय हो रहे हैं उससे परिपक्वता भले ही दिखाई दे नहीं दे रही लेकिन उनका कॉन्फिडेंस आज भी आश्चर्यचकित करने वाला है जबकि विपक्षी दल भाजपा में भी कुछ उत्साही नेताओं ने जिस तरह का ऑपरेशन लोटस चलाया था वह पहले दौर में लड़खड़ा गया था लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के दखल के बाद फ्लोर टेस्ट के बाद पार्टी को उम्मीद है उनकी मेहनत रंग लाएगी लेकिन एक पखवाड़े से चल रही राजनीतिक उठापटक और पूरी कवायद में राजनीतिक सूझबूझ, परिपक्वता, गोपनीयता कहीं भी देखने को नहीं मिली बल्कि कुछ जगह तो ऐसा लगा जैसे यह बच्चों जैसी राजनीति कर रहे हों।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares