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मनमौजी रचनाकारों के संसार का सच

आज हर राजनीतिक दल में वैशाखनंदनों को मोतीचूर के लड्डू कौन परोस रहा है? आज हर राजनीतिक दल में कर्तव्य-कर्मनिष्ठों को कचरा-पेटी के हवाले कौन कर रहा है? सियासत के पूरे पन्ने पर जो पसरे हुए हैं, उनका शक्तिपुंज कहां है? जो हाशिए पर ठेले जा रहे हैं, उनका ग़ुनाहग़ार कौन है? जब सारे ही राजनीतिक दल किसी-न-किसी व्यक्ति-विशेष के इर्दगिर्द घूम रहे हैं तो इस सड़ियल और बदबूदार व्यवस्था को बदलने की जवाबदेही किस पर है?

ऐसी-ऐसी तो पोस्टर-गर्ल हैं और ऐसे-ऐसे पोस्टर ब्वॉय हैं कि जुम्मा-जुम्मा सात रोज़ की गुड़ाई-बुआई के बाद अगर उनकी फ़सल में दाने नहीं आते तो वे किसी और के खेत की मचान पर जा बैठते हैं। लेकिन यह भी तो बताइए कि वह चकरी चलाता कौन है, जिसका छोर पकड़ कर ये इतने फटाफट स्वाधीनता आंदोलन से जन्मेऔर अपनी 136 साल की विरासतपर इतराने वाले राजनीतिक दल के उच्चतर माध्यमिक छज्जों तक इतनी आसानी से पहुंच जाते हैं? पहले तो दसियों बरस लोगों को दरी बिछाते, लेई लगा कर पोस्टर चिपकाते और साइकिल रिक्शे पर बैठ कर भोंपू बजाते ही बीत जाते थे। आजकल तो इधर फॉर्चूनर से उतरो और उधर कोई-न-कोई नियुक्ति-पत्र दबोच कर दरोगाई शुरू कर दो।

सो, यह सवाल तो बनता है न कि आख़िर ऐसी व्यवस्था को पाल-पोस कौन रहा है? कौन मानेगा कि अवांछित मेहमान मेरे घर में मेरी मर्ज़ी के बिना घुस कर बैठे हुए हैं? मेरे सहयोगियों, हमजोलियों, नौकर-चाकरों और कारिंदों ने अगर उस वक़्त मेरे बैठकखाने में लोगों को ला कर बैठा भी दिया, जब मैं अपने शयन-कक्ष में था, तो जब मैं बैठक-कक्ष में आया तो मैं ने क्या किया? आड़े-तिरछों को बाहर किया या उन्हें अपनी आस्तीनों में लपेट लिया? अमरबेलों से पल्ला झाड़ा या उन्हें गले में डाल लिया? उन्हें अपने परकोटे से परे धकेला या तशरीफ़ लाइए, तशरीफ़ लाइएगाता हुआ अपने दस्तरख़्वान पर ले आया? या मैं कभी बैठकखाने में जाता ही नहीं हूं और मैं ने सब-कुछ अपने कारिंदों पर ही छोड़ रखा है? वे जैसा बता देते हैं, मान लेता हूं; वे जैसा कह देते हैं, सुन लेता हूं; वे जैसा दिखा देते हैं, देख लेता हूं।

दोनों ही स्थितियां कुआं-खाई परिस्थितियां हैं। सियासत इतने निर्लिप्त-भाव से नहीं होती। सब जानते हैं कि इतने सूफ़ियाना अंदाज़ में कोई सियासत कर भी नहीं रहा है। बिना मर्ज़ी के कहीं कोई पत्ता तक नहीं खड़कता है। पंखों को हवा देने का भी पूरा इंतजाम है और उन्हें कतरने के लिए कैंचियों का भी भरपूर भंडार है। माननी हो तो खटारा दरबान तक की बात मान ली जाती है और न माननी हो तो स्वयं जगत-जननी भी आसमान से उतर कर कह दें तो उनकी आज्ञा भी ठेंगे पर। मनमौजियों का संसार ऐसे ही चलता है। कहां का विवेक? कहां की विचारशीलता? कहां की तर्कसंगतता? कौन सी संवेदनशीलता? कौन सी दूरदृष्टि? यह युग ही मनमौजियों का है। जिधर नज़र डालेंगे, उन्हें ही पाएंगे। इसलिए साढ़े सात बरस से चारों तरफ़ तुग़लक़ी बरसात हो रही है।

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मनमौजियों के इस दशक की दो प्रतीक-कथाएं सुनिए।

पहली। दस साल पहले तक एक देवी जी एक निजी कंपनी में काम करती थीं। शादी हो गई थी। बच्चे भी थे। राजनीति से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। फिर छींका टूटा। एक बड़े राजनीतिक दल के युवा संगठन ने किसी की सिफ़ारिश पर उन्हें रातोंरात महानगर के एक ज़िले में महासचिव बना दिया। बरसों से दिन-दिन भर पसीना बहा रहे आधा दर्जन दूसरे महासचिव हाथ मसलते रहे और देवी जी को तेज़ी से सीढ़ियां चढ़ते टुकुर-टुकुर ताकते रहे। दो-तीन साल में ही देवी जी दिल्ली पहुंच गईं। अपनी पार्टी की पोस्टर-गर्ल बन गईं। टेलीविज़न के परदे पर सुबह-दोपहर-शाम छाने लगीं। पार्टी के प्रचार तंत्र को विस्तार देने के बहाने ख़ुद की बिसात बिछाने वाले प्रबंधन-गिरोह का हिस्सा बन निजी विमानों में यात्राएं करने लगीं। शिखर-नेताओं के विदेशी दौरों के तैयारी-समूह का हिस्सा बन कर लंदन-वंदन घूमने लगीं। उनकी राह में सूरजमुखी खिलने लगे। चार साल में वे इस बहुत बड़े राजनीतिक दल का बहुत बड़ा चेहरा बन गईं। फिर पिछले लोकसभा चुनाव के ठीक एक महीने पहले वे अपने रचनाकारों को सायोनारा कह कर दूसरे राजनीतिक दल में चलती बनीं और चालीस वसंत पार करते-करते ही लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिरमें घुस गईं।

दूसरी। पांच दशक पहले 26 साल की उम्र में एक नौजवान राजनीति में आया। सोने की चम्मच लेकर जन्म लेने के बावजूद अपने राजनीतिक दल के लिए सचमुच धूल छानी। पार्टी ने भी प्रतिदान देने में कोताही नहीं की। साढ़े छप्पन साल की उम्र में आसमानी हादसे से उनकी इस यात्रा पर दुःखद पूर्ण विराम लग गया। पिता का अधूरा काम पूरा करने के लिए बेटा आगे आ गया। 30 साल की उसकी उम्र थी। चूंकि उसका आगमन विशेष भावनामयी परिस्थितियों में हुआ था – पार्टी में उसे ममतामयी साया मिला, भाइयों सरीख़ा दोस्ताना मिला, शिखर-विश्वास हासिल हुआ और काम करने की पूरी आज़ादी मिली। बड़ी-बड़ी भूमिकाएं मिलीं। बड़े-बुजु़र्गों ने उसके लड़कपनी नखरे भी झेले। बेटे ने भी सियासी पगडंडियों से सामंजस्य बिठाने के लिए परिश्रम में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि अपनी ही बनाई तस्वीर पर उसने अपने ही हाथों से कालिख पोत दी। पचास वसंत पार करते-करते वह भी अपनी पुश्तैनी धरती, अभिभावक और लंगोटिया दोस्त से कुट्टी कर मायावी दुनिया में चला गया

ये दो अलग-अलग चरित्र-कथाएं हैं। लेकिन दोनों का अंतिम परिणाम एक-सा है। क्या दो अलग-अलग मूल्यों, दो अलग-अलग संस्कृतियों और दो अलग-अलग मक़सदों के रास्ते पर चल रहे दो अलग-अलग व्यक्तियों के सफ़र के अंत्य-नतीजे की यह कील आप के दिमाग़ में कहीं चुभती नहीं है? एक तो आया ही मालमत्ता समेट कर जाने के लिए था। दूसरा आया तो इसलिए नहीं था, लेकिन जब हालात ऐसे बिगड़े कि सुधरने की आस जाती रही तो राम-राम कर गया। एक किस्से का पात्र निराधार है, विचारधाराविहीन है और किसी भी कीमत पर राजनीतिक कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ने में विश्वास रखता है। दूसरे किस्से का पात्र आधारहीन और विचारधाराविहीन नहीं था। दोनों का पालन-पोषण, दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक ही आश्रम में हुई। इसलिए क्या आप को यह पेंच चौंकाता नहीं है कि एक ही ऋषि-मंडली कैसे तो एक कुपात्र को अर्थवानों की कीमत फलने-फूलने देती है और कैसे एक सुपात्र को अनर्थवानों की कीमत पर मिट्टी में मिल जाने देती है?

ताज़ा दशक की ऐसी बीसियों कथाएं हैं। इससे पहले के दशकों की भी ऐसी कई कथाएं हैं। लेकिन इस एक दशक में जो हुआ है, जिस तरह हुआ है और जिस रफ़्तार से हुआ है, वह अनोखा है। आंखों का लिहाज़ पहले कभी इतना कम नहीं था। अपनों को जोड़े रखने का ख़याल पहले कभी इतना संवेदनहीन नहीं था। पिद्दियों को अन्यान्य कारणों से इतना बग़लगीर बना लेने का रिवाज़ पहले कभी ऐसा नहीं था। कमाऊ संतानों को डंडा ले कर खदेड़ने का दस्तूऱ पहले कभी ऐसा नहीं था। आज हर राजनीतिक दल में वैशाखनंदनों को मोतीचूर के लड्डू कौन परोस रहा है? आज हर राजनीतिक दल में कर्तव्य-कर्मनिष्ठों को कचरा-पेटी के हवाले कौन कर रहा है? सियासत के पूरे पन्ने पर जो पसरे हुए हैं, उनका शक्तिपुंज कहां है? जो हाशिए पर ठेले जा रहे हैं, उनका ग़ुनाहग़ार कौन है? जब सारे ही राजनीतिक दल किसी-न-किसी व्यक्ति-विशेष के इर्दगिर्द घूम रहे हैं तो इस सड़ियल और बदबूदार व्यवस्था को बदलने की जवाबदेही किस पर है? जिन पर है, वे समझ लें कि लोगों को टोटकों में हिलगाए रखने का ज़माना गया। समकालिक प्रश्न उत्तर मांग रहे हैं। आगत के अंदेशे सनसना रहे हैं। इनकी अनदेखी भारी पड़ेगी।  (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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