‘राजा’ एफआईआर.. के मायने और सियासी सवाल..

दिग्विजय सिंह पर पहली बार भाजपा द्वारा गंभीर आरोप नहीं लगाए गए, 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में लड़े गए चुनाव के दौरान घपले घोटालों के आरोप लगाए गए। बावजूद इसके बात आई गई हो गई, या तो भाजपा ने सिर्फ चुनाव में इसका फायदा उठाया.. या फिर आरोपों में दम नहीं था ..कमलनाथ सरकार के 15 महीने की कार्यप्रणाली पर गौर किया जाए ..तो भाजपा जिसे बदलापुर की राजनीति कहती सवाल क्या शिवराज सरकार भी अब उसी लाइन को आगे बढ़ा रही है।

दिग्गी राजा के खिलाफ FIR से पहले सरकारी आवासों पर पूर्व मंत्रियों का कब्जा विवाद.. तो इससे पहले कांग्रेस की सरकार में रहते नरोत्तम मिश्रा जैसे मंत्रियों को टारगेट करके की गई। जब भी कोई घटना कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में सामने आई तब उसके तार बीजेपी और उसके कार्यकर्ता से जुड़ गई थे.. क्या इसे इन फैसलों से जोड़कर देखे जा सकते हैं ..या फिर नूरा कुश्ती और राजनीतिक हित साधने की कोशिश तक इसे सीमित रखा जाएगा।

दिग्विजय सिंह अपने खिलाफ कार्यवाही को आदिवासियों के हित में उठाई गई मांग से जोड़कर इस लड़ाई को और आगे ले जाने के संकेत दिए.. जिसमें शराब कारोबार और मुख्यमंत्री और उनका गृह जिला सीहोर जोड़ने की कोशिश की गई है.. लेकिन मूल मुद्दे पर ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं नजर आते है.. यानी मसाला बहुत कुछ जिसे कॉन्ग्रेस एक बड़ा मुद्दा बना सकती है.. लेकिन सवाल जब भाजपा आक्रमक और मामला पुलिस थाने और प्रकरण दर्ज होने तक जा पहुंचा .. वह भी जब कोरोना कॉल में चुनावी माहौल लगातार परवान चढ़ रहा तब सवाल कमलनाथ को छोड़कर आखिर दूसरे दिग्गज नेता अपने ट्वीट और बयानों के जरिए सामने क्यों नहीं आ रहे ..क्या इसे प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ की गाइडलाइन से जोड़कर देखा जाएगा।

जो इसे ज्यादा तूल नहीं देना चाहते या फिर इसे ट्वीट के जरिए समर्थन और सवाल के साथ दिग्विजय सिंह की व्यक्तिगत लड़ाई मन कर उन पर छोड़ दिया गया.. या फिर खुद दिग्विजय सिंह ने अपने समर्थ चाहे वह विधायक हो या फिर संगठन से जुड़े उन्हें फिलहाल चुप रहने को कहा है.. जो इसे चुनाव में भुनाने की रणनीति बना रहे हैं.. या फिर इसे चूक और गलती मान बैठे हैं ..सोशल मीडिया पर कुछ गिने चुने नेताओं के बयानों को छोड़ दिया जाए तो सवाल जो समर्थन भविष्य की कांग्रेस से जुड़े नेता प्रतिपक्ष प्रदेश अध्यक्ष के दावेदारों में शुमार होते आखिर वह इतना लंबा मौन क्यों साधे हैं। क्या कांग्रेस में हम दो हमारे दो की बहस आगे बढ़ रही है.. कुछ दिन पहले ही दिग्विजय सिंह अपनी ही पार्टी के पूर्व मंत्री चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी के निशाने पर आ गए थे .. तब पार्टी में उनके समर्थकों ने एक तरह से हल्ला बोल दिया था .. अभी तक कांग्रेस के किसी बड़े नेता की प्रेस कॉन्फ्रेंस इस मुद्दे पर आगामी रणनीति के साथ नही हुई है ।

कमलनाथ सरकार के मंत्री रहते जिनका सियासी कद बढ़ चुका आखिर वह अपनी चुप्पी कब तोड़ेंगे .. जिन्हें विधानसभा चुनाव में टिकट दिलाने और जिताने के लिए दिग्गी राजा ने पूरी ताकत लगाई आखिर हो क्यों मौन साधे हैं.. वह भी तब जब भाजपा की ओर से नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता लगातार राजा को निशाने पर लिया हुए हैं.. क्या इस चुप्पी को संगठन और उसके प्रमुख के दिशा-निर्देशों से जोड़कर देखा जा सकता है ..या फिर इस मामले में कांग्रेस जहां खड़ी और जितना आगे बढ़ी वह कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की संयुक्त रणनीति का हिस्सा है.. जो किसी बड़े सियासी हित को साधने के लिए बदलते राजनीतिक परिदृश्य में नए सिरे से पर्दे के पीछे रणनीति बना रहे.. एफ आई आर दर्ज होने के 24 घंटे के अंदर राजा के समर्थन में परिवार के लोगों ने ही अपने अपने तरीके से आवाज बुलंद की.. फिर भी अभी तक भाई लक्ष्मण सिंह कहीं नजर नहीं आए।

सवाल कांग्रेस के उन नेताओं से भी किया जा सकता है जिन्हें पार्टी का क्षत्रप माना जाता.. पिछले 15 माह में जिनके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था.. जो यह मानकर चल रहे थे कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का न सिर्फ सरकार बल्कि संगठन पर कब्जा है.. या फिर यह नेता राज्यसभा चुनाव से पहले कोई ऐसा गलत संदेश नहीं देना चाहते.. जिससे पार्टी की कलह उजागर हो या गुटबाजी को बढ़ावा मिले ..कांग्रेस और बीजेपी दोनों की ओर से इस मामले को डर्टी पॉलिटिक्स के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है.. जहां तक बात भाजपा की तो उसने दिग्विजय सिंह को निशाने पर ले लिया है । तो सवाल खड़ा होना लाजमी है कि आखिर इसके पीछे भाजपा के रणनीतिकारों की राजनीति क्या है ..क्या भाजपा अभी भी दिग्विजय सिंह को राज्यसभा से लेकर उपचुनाव में बड़ी चुनौती मानकर चल रही है.. जो उनकी घेराबंदी को मजबूर हुई। या फिर कमलनाथ जिस सहानुभूति लहर पर नजर लगाकर सत्ता वापसी की मंशा रखते हैं।

उनके मुकाबले भाजपा चुनाव के मैदान में दिग्विजय सिंह और उसके चेहरे को ही सामने लाना चाहती है …यह जानते हुए कि मैदान में लड़ाई लड़ने वाला कांग्रेस के अंदर कोई नेता है तो वह दिग्विजय सिंह .. तो क्या राजा को विवादों में लाकर उन्हें लड़ाई लड़ने को मजबूर कर भाजपा क्या महाराजा के सामने लाकर गोल पोस्ट बदलना चाहती है.. या फिर भाजपा की रणनीति शिवराज के सामने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के सामने ज्योतिरादित्य रखकर चुनाव मैदान में जाने की है.. सवाल क्या भाजपा कमलनाथ सरकार के 15 माह के कार्यकाल की तुलना शिवराज के पुराने 13 साल और इन तीन चार माह की करेगी।

जिसमें विकास के एजेंडे पर कांग्रेसी और कमलनाथ को एक्सपोज किया जाए.. जो आर्थिक संकट का हवाला देकर शिवराज सरकार की पुरानी जन हितेषी योजनाओं को बंद कर चुके थे ..तो दूसरी ओर कमलनाथ सरकार के तख्तापलट में बड़ी भूमिका निभाने वाले ज्योतिरादित्य और उनके समर्थक विधायकों जिन्हें राजा समर्थकों द्वारा गद्दार करार दिया गया.. उनके मुकाबले दिग्विजय को जनता की नजर में और विवादों में खड़ा करने की है.. इसे संयोग कहें या फिर सोची समझी रणनीति शिवराज सिंह चौहान जब सिंधिया समर्थक प्रभु राम चौधरी और गोविंद सिंह राजपूत के विधानसभा क्षेत्र में मोदी सरकार की उपलब्धियों का गुणगान करने के लिए कार्यकर्ता और जनता के बीच पहुंच रहे थे.. तब दिग्विजय सिंह के खिलाफ पुलिस प्रकरण दर्ज किया गया।

कुछ सवालों की फेहरिस्त में एक और सवाल कुछ ज्यादा ही मायने रखता है.. दिग्विजय के खिलाफ एफ आई आर क्या उनकी गलती को कमजोरी साबित कर उन्हें विवादित और कमजोर करने तक सीमित है.. या फिर इसके तार राज्यसभा चुनाव से लेकर आगामी उपचुनाव तक जोड़कर देखे जाए ..यही नहीं क्या दिग्विजय सिंह के उस दावे को भाजपा ने गंभीरता से लिया है.. जो कहते थे कि एक बार कर्नाटक में मौजूद विधायकों के वह संपर्क में आ जाए तो कांग्रेस अपने रूठे विधायकों को मना लेगी.. तो सवाल क्या भाजपा के कुछ विधायक जो कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के समर्थन में उस पुरानी उठापटक के दौरान संपर्क में थे.. क्या उन्हें भी नए सिरे से भाजपा नेतृत्व ने इशारों इशारों में संदेश दे दिया है।

यही नहीं क्या अतिरिक्त समर्थक की भूमिका निभाने वाले निर्दलीय बसपा और सपा विधायकों के लिए भी इसमें कोई संदेश छुपा है.. यह सवाल इसलिए क्योंकि कमलनाथ , दिग्विजय सिंह और कांग्रेस के दूसरे नेता यह दावा करते रहे हैं कि शिवराज मंत्रिमंडल के विस्तार के साथ नाराजगी के चलते कई विधायक जो उनके संपर्क में भी है वो पाला बदल सकते हैं.. तो क्या बदलापुर की राजनीति सिर्फ सरकार बदलने के कारण अभी रुकी नहीं है.. क्या भाजपा इस बार कांग्रेस की बनाई लाइन को ही आगे बढ़ा रही है ..या फिर से आगे कांग्रेस उपचुनाव की आड़ में सत्ता वापसी के लिए किसी नए राजनीतिक गणित और फार्मूले को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ रही है .. जिसकी भनक भाजपा को लग चुकी है इसलिए दिग्विजय सिंह पर उसकी पैनी नजर है.. सवाल क्या भाजपा कि अभी भी कांग्रेस के अंदर दिग्विजय सिंह विरोधी विधायकों पर नजर लगी हुई है.. जो शिकवा शिकायतों के साथ पार्टी के अंदर कमलनाथ सरकार के गिरने का कारण दिग्विजय सिंह को बताते हैं। दिग्विजय सिंह उनके समर्थक और कमलनाथ और उनकी कांग्रेस क्या राजा के खिलाफ पुलिस द्वारा दर्ज किए गए प्रकरण को प्रदेश में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाएगी।

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