मध्यवर्ग विरोधी केंद्र सरकार

कोरोना संकट से उपजे वर्तमान आर्थिक हालात ने मोदी सरकार का मध्यवर्ग विरोधी चेहरा उजागर कर दिया है , अब इस बात में कोई संशय नहीं है कि केंद्र और राज्यों की बीजेपी शासित सरकारें मध्यवर्ग को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करती है और वास्तविक समस्या के समय उसे भाग्य भरोसे छोड़ दिया जाता है।

वर्तमान आर्थिक संकट से सर्वाधिक पीड़ित मध्य आय वर्ग ही है , और अब तक सरकार ने उसकी आर्थिक सुरक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं…. जबकि यही वर्ग देश की अर्थव्यवस्था का मूल संचालक है। एक अनुमान के मुताबिक देश की 40 फीसदी आबादी मध्य आय वर्ग से संबंध रखती है , यह वर्ग सरकारी व निजी क्षेत्रों में नौकरी करता है या फिर छोटे मोटे उत्पादन या सेवा क्षेत्रों के धंधे चलाता है । एक ओर यह वर्ग माल /वस्तु / सेवाओं का वास्तविक उत्पादक है तो दूसरी ओर यही वर्ग इस देश का वास्तविक उपभोक्ता भी है। हमारे शहरों और कस्बों की आबादी का यह एक बड़ा हिस्सा है।

वर्तमान संकटकाल में केंद्र सरकार ने इस वर्ग को पूरी तरह उपेक्षित रखते हुए केवल और केवल श्रमिक तथा निचले तबके को राहत देने के प्रबंध किये हैं। हम श्रमिक वर्ग का विरोध नहीं करते हैं, लेकिन हमारा कहना है कि मध्यवर्ग को क्यों उपेक्षित रखा जा रहा है। श्रमिक वर्ग के लिए मनरेगा में प्रावधान किये हैं, उनके खानपान के लिए मुफ्त राशन दिया जा रहा है। गरीबों के खातों में सीधे पैसा ट्रांस्फर किया जा रहा है। उनके प्रवास के लिए राज्य सरकारें उपाय कर रहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके रोजगार और पुनर्वास के लिए सरकारों को निर्देश दिये हैं , और राज्य सरकरें भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने के लिए प्रयास कर रहीं हैं। ….. यह सभी प्रयास ठीक हैं हम इसका विरोध नहीं करते हैं लेकिन हमारा कहना है कि इन सबसे बीच मध्य वर्ग की आय की सुरक्षा का ध्यान क्यों नहीं रखा जा रहा है। क्या वह इस देश के नागरिक नहीं हैं।

आज मीडिया में मजदूरों के पलायन की खबरें भरी पड़ी हैं , लेकिन नौकरीपेशा लोगों के पलायन की खबरों का कहीं कोई ज़िक्र नहीं हैं। इस आर्थिक संकट के दौर में बड़े पैमाने पर नौकरीपेशा लोगों का रोजगार छिना है। वह भी बड़े शहरों को छोड़कर अपने गृहक्षेत्रों में आने को मजबूर हैं। नौकरी जाने की स्थिति में परिवार पालने के डर में ना जाने कितने ही नौकरीपेशा लोगों ने खुदकुशी कर ली या हार्ट अटैक या दूसरे कारणों से उनकी मौत हो गई है , इसके आंकड़े भी किसी के पास उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन ना तो इस ओर मीडिया का ध्यान है और ना ही सरकार का , और तो और सुप्रीम कोर्ट ने भी (12 जून गुरूवार) कह दिया कि कर्मचारियों को वेतन देने का मामला कर्मचारी और कम्पनी प्रबंधन के बीच का है तथा वह इसे आपस में ही सुलझा लें। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने कम्पनी प्रबंधन को कर्मचारियों के भविष्य का फैंसला करने की मौन स्वीकृति दे दी है। यानी नौकरीपेशा वर्ग सरकार से तो बेजार था ही अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे मदद देने से इंकार कर दिया।

2006 से 2012 के बीच जो वैश्विक मंदी थी उसमें तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने समस्या से निपटने के लिए मध्यवर्ग को भी फोकस किया था , क्योंकि वो सरकार अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था को समझती थी। उन्हें मालूम था कि नौकरीपेशा वर्ग की आर्थिक सहभागिता के बिना अर्थव्यवस्था को पटरी पर नहीं लाया जा सकता है।

यही इस देश का सबसे बड़ा संगठित उपभोक्ता वर्ग है तथा इस वर्ग के द्वारा ही बाजार में मांग पैदा (Demand Generate) की जा सकती है। उस समय सरकार ने अपनी नीतियों और प्रयासों से मध्यवर्ग को सुरक्षा प्रदान की , तब सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के लिए नया वेतनमान लाई, जिसके बाद राज्यों को भी अपने कर्मचारियों को नया वेतनमान देना पड़ा और इसका असर नीचे नगर निगम , और पंचायतों के स्तर पर भी पड़ा। शासकीय कर्मचारियों के वेतनवृद्धि का मनोवैज्ञानिक असर संगठित क्षेत्र के निजी उपक्रमों पर भी पड़ा , फलस्वरूप उन्होंने भी अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप कर्मचारियों की वेतनवृद्धि की या फिर उनकी नौकरियां सुरक्षित रखीं । ग्रामीण क्षेत्र में चलाई गई मनरेगा के कारण गांव से मजदूरों का पलायन बंद हुआ, परिणामस्वरूप शहरी क्षेत्र में श्रमिकों की आय बढ़ गई ।

इन प्रयासों का नतीजा यह निकला कि बाजार में दोबारा मांग पैदा हो गई और हमारी GDP नई ऊंचाईयों पर पंहुच गई। यही वो दौर था जब पूरी दुनिया में मंदी थी लेकिन हमारे यहां रियल स्टेट का सबसे बड़ा बूम आया, इसी दौरान IT, Pharma, Automobile, FMCG, Metal आदि अर्थव्यवस्था के सभी सेक्टरों में तेज़ी आई। और हम वैश्विक आर्थिक मंदी से बच गए। लेकिन इस समय सरकार ने मध्यम वर्ग को उपेक्षित छोड़ दिया है। अपने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज में उन्होंने कर्मचारियों की आर्थिक सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया। वह सिर्फ बड़ी कम्पनियों और MSME को लोन बांट रहें हैं। आसान भाषा में कहें तो सरकार उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने पर जोर दे रही है जबकि दूसरी ओर सरकार के अर्थशास्त्री इस तथ्य को नज़रअंदाज कर रहे है कि यदि बाजार में मांग ही नहीं होगी तो उत्पादन बढ़ाने का कोई फायदा नहीं होगा।

मार्केट एक सेंटिमेंटल चीज़ है , सकारात्मक भाव पर यह बढ़ता है और नकारात्मक भाव पर यह गिरता है । नौकरीपेशा वर्ग इस समय नेगेटिव सेंटिमेंट से ग्रस्त है। क्योंकि उसकी नौकरियां खतरें हैं । बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को नौकरियों से निकाला जा रहा है। बैंकों में जमा राशि पर ब्याज दरें हों या सामाजिक सुरक्षा स्कीमों की ब्याज दरें , सभी लगातार घटती जा रहीं हैं। नौकरी जाने या तन्ख्वाह ना मिलने की स्थिति में उसके पास इतना भी पैसा नहीं है कि वह 2 से 3 महिने बड़े शहरों में रह सके। इस आर्थिक बदहाली के दौर में उसे दोबारा नौकरी भी जल्दी नहीं मिलेगी। दूसरी ओर यह पढ़ा लिखा क्वालिफाइड तबका मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी नहीं कर सकता है और ना ही सड़क के किनारे ढेला लगा सकता है। ऐसे समय में इस तबके को ना तो सरकार से और ना ही कोर्ट से कोई आसरा मिल रहा है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के बारें में कैसे सोचा जा सकता है।

हमारे शहर इसी आर्थिक तबके से आबाद हैं , यह वर्ग स्वभावतः भावुक , शंकालु और भोला होता है वह आशंकाओं तथा अनुमानों में जीवन जीने वाला है ….. इसलिए बीजेपी की हिंदू – मुसलमान ,और अन्य भावनात्मक मुद्दों पर आधारित कुटिल राजनीति में आसानी से फंस जाता है। बीजेपी इस तबके को फांसने के लिए मुसलमानों को हमेशा एक चारे के रूप में इस्तेमाल करती है। जबकि बीजेपी के लिए असली शिकार यह मध्यवर्ग होता है। वह हमेशा बीजेपी की कुटिल चाल में फंसकर संगठित होकर बीजेपी को वोट दे देता है। ऐसा करते समय हर बार वह यह भूल जाता है कि बीजेपी ने हमेशा इनके साथ विश्वासघात किया है। नोटबंदी में यही तबका प्रभावित हुआ था , जीएसटी में भी इसी पर मार पड़ी , पिछले सालों में श्रम कानूनों में हुए तमाम संशोधनों से भी यही प्रभावित हुआ , सरकार ने नौकरियों में क्रॉट्रेक्ट और एड्होक को बढावा दिया उससे भी यही मारा गया । यानी मोदी सरकार ने अपने शासनकाल में इस तबके की कमर तोड़ने के सारे प्रयास कर लिये हैं दूसरी ओर हर बार चुनाव के समय बीजेपी कोई भावनात्मक मुद्दा ले आती है और यह वर्ग उसे वोट दे देता है। प्रधानमंत्री ने इस बार भी अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा था कि इस संकटकाल में कर्मचारियों को नौकरी से ना निकाला जाए और उनहे वेतन भी दिया जाए , लेकिन यह केवल और केवल एक मीडिया का बयान बनकर रह गया है। इस पर जमीनी स्तर पर किसी प्रकार को कोई अमल नहीं किया गया है।

2 thoughts on “मध्यवर्ग विरोधी केंद्र सरकार

  1. EVM ka khel hai,E.C ka head bahumukhi patibha ke dhani hai eseleye sirf noukari karna or desh ki janta ke prati E.C thora bhi responsible nahi hai lekin enko sari sukha suvidha tax payer ke paise se niyamit rup se milta rahega,nyaypalika bhi essi system ka part and parcel hai,ramrajya hai.

  2. बिल्कुल सही कहा यह सरकार मध्यम और कर्मचारी विरोधी है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares