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चीन के सपने पर मोदी का हमला

पूर्वी लद्दाख में भारत चीन सीमा वास्तविक नियंत्रण रेखा पर 15-16 जून की रात भारत और चीन के सैनिकों में हुई खूनी झड़प के महज 18 दिन के भीतर ही तीन जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक लद्दाख का दौरा करके सबको चौंका डाला। सात घंटे के इस दौरे में मोदी सैनिक जैकेट पहने नजर आए और सैनिकों से मिल कर उनका मनोबल बढ़ाते दिखे। उनके साथ इस दौरे में रक्षा सेवाओं के प्रमुख जनरल बिपिन रावत और थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवाणे भी अगल-बगल चल रहे थे।

मोदी सुबह ही इनके साथ रूसी एमआई हेलिकॉप्टर से लेह के कुशक बाकुला रिंपोचे हवाई अड्डे पहुंचे थे। इस यात्रा का मकसद था मौके पर जाकर भारतीय सेना के जवानों का नैतिक बल और उत्साह बढ़ाना। लेकिन उससे भी ज्यादा यह दौरा इस बात का संकेत था कि चीन पर नई दिल्ली की नीति अब पहले वाली नहीं है, बदल रही है।

मोदी ने लेह में भारतीय सेना, वायु सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों को संबोधित किया। अपने 27 मिनट के इस संबोधन में उन्होंने पड़ोसी साम्यवादी देश का नाम लिए बिना चेतावनी भरे लहजे में जो यह बात कही कि विस्तारवाद का वक्त अब खत्म है तो  उससे बीजिंग हिल गया। यह एक तरह से चीन के सपनों पर निशाना ही था। दरअसल, पिछले सात साल में जब से शी जिनपिंग कम्युनिस्ट शासन में शीर्ष पर हैं, तभी से विस्तारवाद नीति उनके सपने का अभिन्न हिस्सा है। लेकिन दुर्भाग्य से हुआ यह है कि दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में जिस तरह के सीमा और क्षेत्रीय विवादों में चीन उलझा है, उससे जिनपिंग के सपने को भारी धक्का लगा है।

इसलिए आश्चर्य की बात नहीं थी कि लेह में मोदी के भाषण के कुछ मिनट बाद ही नई दिल्ली में चीनी दूतावास ने यह कहते हुए तत्काल अपनी प्रतिक्रिया दी कि चीन को विस्तारवादी राष्ट्र के रूप में देखना और पड़ोसियों के साथ इसके विवादों को बढ़ा-चढ़ा कर और झूठे रूप में पेश करना आधारहीन है।

निम्मू में वास्तविक नियंत्रण रेखा से कुछ ही किलोमीटर पहले मोदी ने चीन को जो संदेश दिया है, वह भारत के इस कड़े निश्चय को बताने वाला है कि अब हम पड़ोसी की धमकियों में नहीं आने वाले। और सिर्फ यही नहीं, इस वक्त चीन को रणनीतिक संदेश देने की जरूरत इसलिए भी है कि वह इस समय हांगकांग, शिनजियांग और तिब्बत में मानवाधिकारों के उल्लंघन और बोलने की आजादी को कुचलने के मामले में दुनियाभर की आलोचना झेल रहा है।

सबसे महत्त्वपूर्ण तो यह है कि भारत ने चीन के मामले में अब अपनी विदेश नीति बदली है, जिसकी लंबे समय से प्रतीक्षा की जा रही थी। पंचशील के दिन अब लद चुके हैं जब दोनों देशों ने 1954 में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना के साथ रहने के लिए पंचशील समझौते पर दस्तखत किए थे। बीजिंग की क्षेत्रीय विस्तार की महत्त्वाकांक्षा, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण और हमले, भारत के अंदरूनी मामलों में दखल और धमकियों की जो उसकी नीति रही है, वही अब 45 साल बाद हिंसा के रूप में सामने आई जो 15-16 जून की रात वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों ने की। इससे पेकिंग (बीजिंग) समझौता अर्थहीन हो गया।

गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के हमले में घायल हुए भारतीय सैनिकों से अस्पताल में मोदी जिस तरह से मिले उससे एक निजी भावनात्मक लगाव दिखा और इससे पूरी दुनिया में चीन को लेकर जो संदेश गया, उससे चीन की छवि और बिगड़ी ही है। एक ओर चीन जहां अपने सैनिकों के हताहत होने की बात को इसलिए छिपा रहा है कि कहीं पीएलए में बगावत न हो जाए, वहीं लोकतांत्रिक भारत ने अपने सभी बीस शहीद जवानों को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी, बल्कि प्रधानमंत्री खुद 11 हजार फीट की ऊंचाई पर सैनिकों से मिलने पहुंचे, उनका मनोबल बढ़ाया और सेना की तैयारियों का जायजा लिया। पूरी दुनिया ने देखा है कि भारत और चीन के शीर्ष नेताओं का व्यवहार कैसा रहा है और इसके क्या अर्थ हैं।

बीजिंग के रूख, उसकी प्रतिक्रिया में समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आता। चीन अभी दुनिया की महाशक्ति बन कर उभरने के दूरगामी लक्ष्य को हासिल करने में पर्याप्त समय लगाएगा। भारत के लिए उपयुक्त मौका है जब भारत बीजिंग को उसकी अनुचित कार्रवाइयों जो कानून के शासन, वैश्विक शांति और आपसी सहअस्तित्व की भावना के खिलाफ होने की हकीकत को दुनिया के आगे बेनकाब करे। नई दिल्ली ने ‘विस्तारवाद’ को लेकर चीन की जो खिंचाई की है, उसे शी जिनपिंग को आईना दिखाने वाले कदमों में से एक माना जाना चाहिए। भारत को मानना होगा कि चीन की दबंगई लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे दबंग के सामने हथियार डालने का सवाल ही पैदा नहीं होता। यही वह सही वक्त है जब भारत जैसे दादा देश के सामने डट कर खड़ा हो और उसे उसके ही खेल में शिकस्त दे। यह भी याद रखना होगा कि भारत को ऐसी दंबगई के खिलाफ लड़ने के लिए लंबी अवधि की रणनीति बनानी होगी।

चीन के 59 ऐप, जो भारत की संप्रभुता और एकता-अखंडता के लिए खतरा साबित हो रहे थे बंद करने का भारत सरकार का फैसला सही दिशा में पहला कदम है। सामरिक प्रभाव बनाने के लिए भारत को न सिर्फ आत्मनिर्भर बनना होगा, बल्कि चीन की सारी धमकियों को दरकिनार करते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सामरिक ढांचा भी खड़ा करना होगा। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने बड़े पैमाने पर सामरिक विकास कर भी वह क्षमता हासिल की है जिससे दुर्गम इलाकों में सैन्य साजोसामान को आसानी से लाया-ले जाया जा सके।

विस्तारवाद पर भारत का संदेश सत्ता के गलियारों में विकास का एक संदेश पहुंचाने वाला होना चाहिए, जिसमें हम मौजूदा और भविष्य की सामरिक जरूरतों को देखते हुए छोटे और लंबी अवधि वाले सामरिक लक्ष्यों को हासिल करने की क्षमता विकसित कर सकें। यही वक्त है जब भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा खासतौर से इससे संबंधित मामलों की योजना बनाने और उस पर अमल के मामले में नौकरशाही की पकड़ को जरा ढीली करें, तभी कोई राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत या रणनीति आकार ले पाएगी।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की वीडियो कॉल बातचीत के बाद सैनिकों के पीछे हटने का काम शुरू हो गया है, लेकिन समस्या आगे जस की तस बनी रहनी है।

चार जून को धर्म चक्र दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि आज दुनिया असाधारण चुनौतियों से जूझ रही है और इसके समाधान बुद्ध के आदर्शों में खोजे जा सकते हैं। उन्होंने लोगों से कहा था कि वे अपने को बुद्ध की विरासत से जोड़ें। क्या ऐसे में नई दिल्ली के शांति पथ का, जहां चीनी दूतावास का दफ्तर भी है, नाम नोबल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा के नाम पर नहीं रख दिया जाना चाहिए? दलाई लामा तिब्बतियों के धर्मगुरु हैं और दशकों से वैश्विक शांति के लिए काम कर रहे हैं। दलाई लामा को भारत रत्न देना भी उनका बड़ा सम्मान होगा। सही मायनों में खौफ का जवाब कार्रवाई करके दिया जाता है, शब्दों से नहीं।  (आदित्य राज कौल नई दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार हैं और विदेश नीति व राष्ट्रीय सुरक्षा पर लिखते रहे हैं।)

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