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धन रे जोबन, सपने सी माया…

देश का कोई भी सच्चा, सजग संवैधानिक नागरिक नहीं मानेगा की अनाप-शनाप धन शोधन करने वाले पर कड़े से कड़ा कानून नहीं लगाया जा सकता। लेकिन धन शोधन निवारण कानून के तहत सत्ता के द्वारा उसके गलत इस्तेमाल का भी समर्थन नहीं करेगा। मगर दर्शक बना दी गयी जनता को भीड़ में जुटाया जा रहा है और एकतरफा चल रहे मैच में राष्ट्रभक्ति के चश्मे से आइपीएल जैसा आनंद लेने में लगा दिया गया है।

आजकल अपने यहां आर्थिकी का राजनीतिक खेल जोरों से चल रहा है। खेल में चलाई जा रही राजनीति का अर्थ भी ढुंढा जा रहा है। सरकारी संस्थाओं को कार्यपालिका के तौर पर खेल के क्षेत्र रक्षण में लगा दिया गया हैं तो वहीं सर्वोच्च न्यायालय को घेर कर खेल का रैफरी या अंपायर माना जा रहा है। कानून दिखा कर एक-दूसरे पर राज की नीति थोपी जा रही है। वहीं कमर तोड़ महंगाई में धसी जनता को बदले की भावना का गजब खेल समझाया, दिखाया जा रहा है। यानी राजनीति के सहारे अर्थ की रेवड़ी बांटी, उगाही या खंगाली जा रही है। जनता को ही सभी ओर से नैतिकता का पाठ भी पढ़ाया जा रहा है। लेकिन क्या आज के इस अर्थ के अनर्थ में दूध का धुला कोई भी है?

प्रधानमंत्री ने प्रधान सेवक होने के नाते जनता से आव्हान किया कि देश में रेवड़ी बंटना बंद होना चाहिए। सही है क्योंकि यह जनता के ही धन से बांटी जा रही सुविधाओं का मुफ्तखोरी के नाम पर वोट जुटाना भर है। पक्ष-विपक्ष हो, या केन्द्र-राज्य सरकारें हों सभी वोट का यही खेल खेलने में लगीं दिखती हैं। राज की नीति ही रही है जो जनता को मुगालते में ही रखा जाए। इसी के चलते धन शोधन निवारण कानून के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को हर तरह से बटीं या बांटी गयी रेवड़ियों का हिसाब खंगालने में लगाया गया है। सरकार इसे नैतिकता की नीति कह रही है। तो नगण्य विपक्ष इसको बदले की राजनीतिक भावना बता रहा है।

मगर दोनों ही जनता के सामने इस स्थिति को अपने-अपने कार्यकलापों का नतीजा नहीं मानने पर अड़ी हैं। आखिर इसी गरीब देश की संसद ही है जो दुनिया भर की संसदों को संपन्नता में शर्मसार करने का टेलंट रखती है। जनता है की असमंजस में अच्छे दिन की आस लगाए आसमान ताकने पर मजबूर है।

ईडी नाम की संस्था के सहारे धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत पहले भी बटीं, बांटी या हड़पी गयी रेवड़ी का देश भर में हिसाब लेना चल रहा है। हिसाब तो बेशक, और बिलकुल लिया जाना जाहिए। जनता को भी हर अनैतिकता में किए गए नीतिगत भ्रष्टाचार का हिसाब चाहिए। हर तरह की सख्त कानूनी कार्यवाही भी होनी चाहिए। क्योंकि जनता का गाढ़ा धन न रेवड़ी में बंटना चाहिए, न ही काले धन की कालिख में रंगा जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस धन शोधन निवारण कानून में जुड़ते गए प्रावधानो को वैध ठहराया है। जनता के या देश के धन की चोरी करने वाले को कैसे भी कानून में कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होना ही चाहिए। मगर देश की जनता को यह पता नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कानून लागू करने की भावना का नैतिक और शुद्ध रहने का अवधान रखा है या नहीं?

देश का कोई भी सच्चा, सजग संवैधानिक नागरिक नहीं मानेगा की अनाप-शनाप धन शोधन करने वाले पर कड़े से कड़ा कानून नहीं लगाया जा सकता। लेकिन धन शोधन निवारण कानून के तहत सत्ता के द्वारा उसके गलत इस्तेमाल का भी समर्थन नहीं करेगा। मगर दर्शक बना दी गयी जनता को भीड़ में जुटाया जा रहा है और एकतरफा चल रहे मैच में राष्ट्रभक्ति के चश्मे से आइपीएल जैसा आनंद लेने में लगा दिया गया है। जब जनता सिर्फ वोट डालने के लिए जागने को ही लोक का तंत्र मान लेती है, तब ही नीतिगत भ्रष्टाचार का ऐसा राजनीतिक खेल खेला जाता है। लोकतंत्र तो जनता के लगातार सतर्क, सजग रहने से ही सुचारू चल और संवर सकता है।

धन शोधन हो या मुफ्तखोरी, आज के ये जनसेवक जनता की सेवा सिर्फ धन से ही करना चाहते हैं। और जनता भी मान बैठी है कि धनी नेता ही जनसेवा कर सकता है। या वही उसके लायक भी है। इसीलिए जनता अपनी सेवा के लिए धनी सेवक को ही चुनती है। फिर ऐसा ही हैरान करने वाला असमंजस का खेल चलता है जिससे सत्य और अहिंसा दोनों प्रभावित होते हैं।

कुमार गंधर्व का गाया सुरीला निर्गुणी भजन है जिसमें वे गाते हैं कि भोला मन या नासमझ मनुष्य मान लेता है की उसकी काया अमर है। मगर यह मानने पर भूल जाता है की धन तो योवन की तरह है। सपने की माया, और बादल की छाया जैसा है। इसलिए लोकतंत्र को समझिए, संवारिए और सुरक्षित रखिए।

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