मोहन भागवत के विचारों पर एक स्वयंसेवक

डॉ. नील माधव दास: प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने दशहरा उत्सव के उपलक्ष्य में अपना भाषण दिया उससे पहले श्री भागवत जी ने शस्त्र-पूजन किया। फिर 70 मिनट का अपना उद्बोधन किया। मैं बाल्यावस्था से ही संघ से अंतरंग भाव से जुड़ा हुआ हू। तब संघ की गतिविधियों को प्रसार माध्यमों से दूर रखा जाता था। आजकल तो जीवंत प्रसारण का पहले प्रबंध किया जाता है तभी कोई कार्यक्रम किया जाता है। पूर्व में दशहरा भाषण स्वयंसेवकों के लिए आगामी वर्ष के मार्गदर्शन के रूप में देखा जाता था। आजकल यह स्वयंसेवकों के लिए नहीं, वरन सभी लोगों के लिए होता है।

अपने लंबे वक्तव्य में भागवत जी ने अनेक विषयों पर अपना अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दृष्टिकोण को बताया। आपने कोरोना, चीन, हिन्दुत्व, स्वदेशी, शिक्षा, नई शिक्षा नीति, देश की कृषि और कृषक पर विचार रखा। देश की नई शिक्षा नीति की प्रशंसा की।इन में हिन्दू और हिन्दुत्व को छोड़ कर अन्य सभी विषयों पर आप के विचार में कोई नवीनता या आकर्षण नहीं था। परंतु हिन्दुत्व और हिन्दू पर उनका दृष्टिकोण बड़ा रोचक एवं उद्वेगजनक था। आपने हिन्दू और हिन्दुत्व को नया अर्थ एवं एक नई संज्ञा दी। उसके लिए आप ने एक मार्मिक, आवेगमय, आवेशमय, एवं भावगर्भक लंबा भाषण दिया। आपने अपनी वाणी को यथासंभव प्रभावी बनाने के लिए अपने पूर्वलिखित वाक्यों का भी उपयोग किया। वक्तव्य को गांभीर्य देने के लिए स्वामी विवेकानन्द, कविगुरू रवीन्द्रनाथ, महर्षि अरविन्द एवं संत विनोबा जैसे महापुरुषों का नाम भी लिया और कहा कि इन लोगों ने हिन्दू शब्द को जिस अर्थ में व्यवहार किया मैं उसी अर्थ में हिन्दू शब्द को नई संज्ञा दे रहा हूँ।

उन्होंने वह नई संज्ञा बताई कि हिन्दू कोई विशेष पूजा या उपासना पद्धति नहीं है। हिन्दू कोई विशेष व्यक्ति अथवा समूह की बपौती नहीं है। अतः जो लोग कहते रहते हैं, ‘गर्व से कहो, मैं हिन्दू हूँ’, वे असंगत हैं। हिन्दू राष्ट्र कोई राजनीतिक संकल्पना भी नहीं है। भारत में अथवा सारे विश्व में कोई भी व्यक्ति जो अपने को भारत माता की संतान मानता है, जो भारत की संस्कृति का सम्मान करता है, जो अपने भारतीय पूर्वजों का स्मरण करता है, वह हिन्दू है। आपके मतानुसार भारत के सभी 130 करोड़ लोग हिन्दू हैं। जो अपने को हिन्दू नहीं कहता, कोई और नाम कहता है, वह भी हिन्दू है। क्योंकि उस में अंतर्निहित भावना हिन्दू है। वह किसी स्वार्थ के प्रभाव में कह देता है कि वह हिन्दू नहीं है, परन्तु उस का आंतर हिन्दू ही है।

मुझे यह बोधगम्य नहीं हो पाया कि जो अपने को हिन्दू नहीं कहता एवं हिन्दू को घृणित मानता है उसे बाध्यतामूलक, बलपूर्वक हिन्दू कहना। तथा, जो अपने को भावपूर्वक हिन्दू कहता है उसे कहना कि हिन्दुत्व किसी की बपौती नहीं है। ऐसी बातों के पीछे क्या गूढ़ तत्व है? उन का उपरोक्त वक्तव्य हिन्दुओं के लिए अपमानजनक है।

माननीय मोहनजी का यह भी कहना है कि जो हिन्दू-विरोधी काम करते हैं उन का विरोध नहीं करना चाहिए। उन के स्वार्थ को ध्यान में रखकर वार्तालाप के माध्यम से सभी समस्याओं का समाधान करना है। किन्तु जो समूह हिन्दुओं को धरातल से मिटाने की बात करता है उस के साथ वार्ता का क्या फल होगा? यह आपने नहीं बताया। उन की ऐसी वाणी नीति के विपरीत है। यह हिन्दुओं के लिए घातक है।मोहन जी ने कार्यक्रम का प्रारंभ किया था शस्त्र-पूजन के साथ, किन्तु उन्होंने अपने भाषण में उस भावना का कहीं उल्लेख नहीं किया जिस से शस्त्र-पूजन किया जाता है। यह परिचायक है कि आज संघ बदला हुआ है। यदि बाघ घास खाने लगे तो वह समाज के सम्मान का पात्र होगा या उपहास का?

फिर आगे मोहन जी कहते हैं कि हिन्दू दर्शन के अनुसार संघर्ष द्वारा कोई प्रगति नहीं होती है। अतः कोई हिन्दू-विरोधी या भारत-विरोधी काम करे तो उस के लिए आक्रोश नहीं होना चाहिए। मोहन जी पुनः बोलते हैं कि हिन्दू कोई पंथ या संप्रदाय का नाम नहीं है। मानवता के प्रांगण में सब को बसाने वाला ही हिन्दू है।हिन्दू समाज में निकट-अतीत में बड़ी जागृति आई है। अब हिन्दू अपने ऊपर अन्याय का विरोघ एवं प्रतिकार का साहस करता है। ऐसी स्थिति में मोहन जी को चाहिए था कि वे उस को प्रोत्साहित करते, किन्तु उपरोक्त वाणी के द्वारा उन्होंने उसे निर्वासित करने का प्रयास किया है। यह हिन्दू समाज के लिए घातक है। लंबे समय से सेक्यूलरिज्म ने हिन्दुओं में भर दिया था कि मुसलमान मुसलमान हो सकता है, ईसाई ईसाई हो सकता है, मगर हिन्दू अपने को हिन्दू नहीं कह सकता, उसे तो अपने को विश्व-मानव जैसा कहना होगा। मोहन जी फिर वही भाव हिन्दू मन में भरना चाहते हैं।

हिन्दू शब्द में जो पराक्रम, शौर्य एवं वीरता की आभा रही है, मोहन जी उस को शिथिल करना चाहते हैं। स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द एवं विश्व-गुरू रवीन्द्रनाथ जब हिन्दू शब्द बोलते थे तब उस में पराक्रम, शौर्य एवं आभा प्रकाशित होती थी। किन्तु आज मोहन जी हिन्दुत्व शब्द को जो संज्ञा दे रहे हैं उस में वह तेज नहीं है। अपितु उस में पौरुषहीनता एवं भीरुता झलकती है। अतः उन महापुरुषों के हिन्दुत्व शब्द के साथ अपने हिन्दुत्व शब्द का तुलना करना एक दुष्टता का परिचय है।

अपने सिद्धांत पर चलने वाला मुसलमान कभी भारत को अपना देश नहीं मान सकता है। वह अपने हिन्दू पूर्वजों (काफिरों) से घृणा करता है, क्योंकि सिद्धांत उसे यही सिखाता है। वह कभी भारतीय संस्कृति को अपना नहीं मान सकता। फिर भी मोहन जी उन से आशा रखते हैं। इस से लगता है कि मोहन जी को इस्लाम के बारे में परिपक्व ज्ञान नहीं है। आज मोहन जी मुसलमानों के बारे में जो भाव रख रहे हैं, सारा यूरोप 50 वर्ष पूर्व यही भाव रखता था। किन्तु आज उस का दुष्परिणाम उनको भोगना पड़ रहा है। मोहन जी को उन से सीख लेना चाहिए था। विश्व-गुरू रवीन्द्रनाथ ने कहा था कि मुसलमान कभी नहीं बदलता है। वह तभी बदलेगा जब उस का धर्म बदल दिया जाएगा। उससे भी मोहन जी को सीख लेना चाहिए था।

आज सारा विश्व और हिन्दू समाज इस्लाम से त्रस्त है। इस्लाम काफिरों को, हिन्दुओं को धरती से मिटा देना चाहता है। हिन्दुओं के मंदिर तोड़ना, गोहत्या करना, हिन्दू-भूमि को बलपूर्वक हथिया लेना, हिन्दू नारी का अपहरण एवं घर्षण करना, आदि घटनाएं कभी बंद नहीं हुई। इसीलिए सारे हिन्दू ही नहीं पूरा विश्व इस्लाम और मुसलमान से त्रस्त है। निकट में भारत के दो बड़े दंगे मुसलमानों ने किए, दिल्ली और बंगलुरू। आए दिन भारत में हिन्दू भुगतता रहता है। जिस देश में साधु-संतों का सम्मान सर्वोपरि होता था, वहाँ साधुओं के साथ दुर्व्यहार हो रहा है। इन स बातों का मोहन जी के भाषण में कोई उल्लेख नहीं था। यह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है।

अन्त में मुझे यही प्रतीत हुआ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई हिन्दू संगठन नहीं है। यह हिन्दू हितों की रक्षा नहीं करेगा। न ही इस संगठन से आगे जाकर कोई राजनेता आंतरिकता के साथ हिन्दुओ के लिए कुछ करेगा। हो सकता है कि निर्वाचन में लाभ उठाने के लिए वे कुछ वाणी-सेवा करते रहें। अतः भारत के हिन्दू को संघ और भाजपा को पार कर आगे कोई अन्य आशय का सन्धान करना होगा।  (लेखक एक पुराने स्वयंसेवक हैं। अभी धनबाद, झारखंड में प्रतिष्ठित चिकित्सक और समाजसेवक हैं।)

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