MP politics Kamalnath congress चार उपचुनाव... ‘कमलनाथ कांग्रेस’ निष्क्रिय क्यों...
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चार उपचुनाव… ‘कमलनाथ कांग्रेस’ निष्क्रिय क्यों…

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भोपाल। मध्यप्रदेश में 4 उपचुनाव यानि 11 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान की तारीख का भले ही ऐलान नहीं हुआ  …लेकिन उपचुनाव वाले क्षेत्रों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा की मौजूदगी से निकट भविष्य में उपचुनाव से इनकार नहीं किया जा सकता… कमलनाथ सरकार के तख्तापलट के बाद 28 विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के मंसूबों पर भले ही पानी फिर गया था.. लेकिन दमोह उपचुनाव जीतकर उसने बुलंद इरादों के साथ इन उपचुनाव को जीतने का दावा किया है.. कोरोना से बड़ी राहत ऐसे में उपचुनाव वाले क्षेत्रों में विकास के एजेंडे पर शिवराज सरकार की सक्रियता और संगठन की नई जमावट के बीच  सवाल आखिर कांग्रेस और उसके वरिष्ठ जिम्मेदार नेता कहां है.. प्रदेश अध्यक्ष  और नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे कमलनाथ की अभी तक उपचुनाव वाले क्षेत्रों से दूरी चर्चा का विषय बन रही है..

कमलनाथ संभवत अचानक खराब स्वास्थ्य के कारण फिलहाल मध्य प्रदेश से दूर है.. जिनका ज्यादातर समय दिल्ली या फिर बाहर गुजरता है ..वो जब भी भोपाल आते हैं तो किसी विशेष मौके पर किसी विशेष मुद्दे को हवा दे जाते.. संगठन द्वारा बनाए गए चुनाव प्रभारियों का चक्कर भले ही क्षेत्र में लग गया हो और कॉन्ग्रेस के दूसरे नेता  स्थानीय स्तर पर अपनी जवाबदेही निभा रहे हो..  फिर भी कमलनाथ के अलावा  दूसरे दिग्गज नेताओं की भी उपचुनाव वाले क्षेत्रों से  लगातार लंबी दूरी कुछ सवाल खड़े करती है.. चाहे फिर वह कमलनाथ  मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा, जयवर्धन सिंह, जीतू पटवारी, गोविंद सिंह हो या फिर और दूसरे दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह, सुरेश पचौरी, अजय सिंह, अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया शायद ही इनमें से कोई एक ने भी उपचुनाव वाले क्षेत्रों का दौरा कर अपनी दिलचस्पी और जवाबदेही दिखाई हो..

कमलनाथ की गैरमौजूदगी में अघोषित तौर पर केयरटेकर प्रेसिडेंट की भूमिका में सज्जन सिंह वर्मा जैसे नेता जरूर अपने  ग्रुप के साथ चिंतन मंथन करते रहे हैं.. ऐसे में एक और बैठक को लेकर असमंजस जो प्रदेश कांग्रेस दफ्तर में होने जा रही है.. कमलनाथ की गैरमौजूदगी में उनके निर्देशानुसार किसी बैठक पर पार्टी के ही जिम्मेदार पदाधिकारियों के बयानों में साफ मत भेद.. चर्चा हो यदि बैठक हुई तो इसमें मंडलम व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी..  जब कमलनाथ के 8 अक्टूबर को भोपाल में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के कार्यक्रम में शिरकत करने का कार्यक्रम को अंतिम रूप  दिया जा रहा है .. सब गठित कमेटी को लेकर भी एक नया विवाद सामने आया है जिसमें एक जिम्मेदार नेता ने कमेटी के प्रमुख के नेतृत्व में काम करने से मना कर दिया.. यानी कमलनाथ की गैर मौजूदगी में होने वाली प्रस्तावित अघोषित बैठक और उनके आने पर होने कार्यक्रम दोनों पर पार्टी के अंदर विवाद..

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दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश में सकरी लेकिन संगठन की गतिविधियों से दूर अपनी लाइन अलग बढ़ा रहे हैं.. संदेश साफ है कॉन्ग्रेस यदि कमलनाथ की गैरमौजूदगी में  बैठक करती तो उपचुनाव की उसकी चिंता से इनकार नहीं किया जा सकता.. भाजपा के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष उपचुनाव वाले क्षेत्रों में सक्रिय हैं तो फिर यह मान लिया जाएगा कि उपचुनाव को लेकर देर से ही सही कांग्रेस जाग गई है.. उपचुनाव वाले निमाड़ मालवा की जोबट और बुंदेलखंड की पृथ्वीपुर सीट पर कांग्रेस का कब्जा था..  रेगाँव विधानसभा के साथ खंडवा लोकसभा पर भाजपा का कमल पिछले चुनाव में खिला था.. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त उपचुनाव वाले क्षेत्रों के दौरे के दौरान सीधे कमलनाथ से सवाल पूछ कर निशाना साध रहे हैं तो जवाब देने से ज्यादा नए सवाल खड़े कर कांग्रेस  ट्विटर तक सीमित होकर रह गई… कमलनाथ के मुकाबले दिग्विजय सिंह  ज्यादा मध्यप्रदेश में अपनी सक्रियता का एहसास करा रहे हैं.. चाहे फिर वह किसानों का आंदोलन हो या फिर महंगाई और दूसरे मुद्दे पर राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी जनता के बीच पहुंच रहे..

कमलनाथ के मीडिया कोऑर्डिनेटर नरेंद्र सलूजा, प्रवक्ता प्रदेश महामंत्री के के मिश्रा जैसे कुछ नेता विशेष के  ट्वीट  प्रेस कॉन्फ्रेंस की औपचारिकता छोड़ दी जाए तो कहीं ना कहीं कांग्रेस  में एक अलग सी खामोशी साफ देखी जाती.. पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल भैया ने जन्मदिन पर शक्ति प्रदर्शन कर यह संदेश तो स्पष्ट तौर पर दे दिया है.. चुनाव हारने का मतलब यह नहीं कि वह घर बैठ चुके हैं.. या फिर उन्हें पार्टी द्वारा घर बैठा दिया गया.. जन्मदिन पर भाजपा नेताओं के साथ बधाई के आड़ में मेल मुलाकात पर अजय सिंह उन अफवाहों पर विराम लगा चुके कि वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जा रहे हैं.. अरुण यादव जो खंडवा से लोकसभा उपचुनाव के सबसे बड़े टिकट के दावेदार है और जिनका टिकट लगभग पक्का माना जा रहा है .. वह ज्यादातर समय क्षेत्र में गुजार कर अपनी जड़ों की गहराई नाप रहे है.. पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी का कमलनाथ के भोपाल रहने पर ही पार्टी दफ्तर और उनके बंगले पर आना जाना जरूर रहता है ..

कांतिलाल भूरिया भी कमलनाथ से ज्यादा दिग्विजय सिंह के संपर्क में बने हुए हैं.. दिग्विजय सिंह और पुत्र जयवर्धन सिंह सिंधिया के दबदबे वाले क्षेत्र ग्वालियर में अपने स्तर पर नई जमावट में जुटे हुए हुए है.. कमलनाथ और पूर्व मंत्री गोविंद सिंह की निकिटता जरूर  चर्चा में है जिनकी भोपाल से लेकर दिल्ली में हुई मेल मुलाकात संकेत दे रही है कि उत्तराधिकारी के तौर पर जब भी नेता प्रतिपक्ष के नाम का चयन किया जाएगा.. तो गोविंद सिंह पहले बड़े दावेदार होंगे जिनको कमलनाथ का समर्थन मिलेगा .. ग्वालियर चंबल की राजनीति में यदि ज्योतिरादित्य से मुकाबला करना है तो फिर गोविंद की दावेदारी को नजरअंदाज कमलनाथ चाह कर भी नहीं कर सकते.. जबकि सर्वविदित है कि गोविंद सिंह यदि किसी के सबसे ज्यादा भरोसेमंद है.. तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के.. मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अंदर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सन्नाटा भले ही पसर गया हो.. लेकिन साइलेंट मूव से इनकार नहीं किया जा सकता..

खासतौर से जब फैसले आप राहुल गांधी लेने लगे हैं.. पंजाब और राजस्थान जिस पर राष्ट्रीय नेतृत्व ने कमलनाथ को अंदर खाने बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी ..उसमें से पंजाब को मुख्यमंत्री रहते अमरिंदर सिंह की प्रेशर पॉलिटिक्स के बावजूद राहुल गांधी बदल चुके हैं.. तो राजस्थान की नब्ज पहचानने के लिए दिग्गी राजा को उनकी नई जिम्मेदारी के साथ भेजा जा रहा.. नजर राजस्थान के साथ छत्तीसगढ़ पर भी जहां फैसले लंबे समय से लंबित है.. कांग्रेस के बदलते घटनाक्रम को भी नजरअंदाज नहीं किया जाता.. जब जेएनयू के पढ़े और बिहार की राजनीति से ताल्लुक रखने वाले वामपंथी विचारधारा वाले युवा कन्हैया, गुजरात के जिग्नेश और मध्य प्रदेश से अंशुल त्रिवेदी जैसे युवा नेता अपने सहयोगियों के साथ 28 सितंबर को कांग्रेस की सदस्यता ले रहे.. इस पटकथा को अंजाम देने तक का श्रेय दिग्विजय सिंह को ही जाता है..

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दिग्विजय सिंह के विवादित बयान और मध्यप्रदेश में चुनाव जिताने की उनकी क्षमता को छोड़ दिया जाए तो बदलते राजनीतिक परिदृश्य में राजा एक बार फिर 10 जनपद के और करीब पहुंच चुके.. बावजूद इसके कमलनाथ की यूपीए गठबंधन के साथ पार्टी के अंदर आर्थिक क्षेत्र में उनकी प्रबंधन क्षमता उनकी उपयोगिता और दबदबा बनाए हुए…G23 के गाहे-बगाहे सवाल खड़े करने के  बावजूद राहुल गांधी युवाओं पर फोकस बनाकर अपनी प्राथमिकता दिखा रहे.. तब सवाल यदि कमलनाथ भोपाल से दूरी बना रहे तो फिर उसकी वजह क्या है.. सिर्फ स्वास्थ्य या फिर कांग्रेस की बदलती इंटरनल पॉलिटिक्स.. सवाल यह भी क्या कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व खास तौर से राहुल गांधी के एजेंडे पर मध्य प्रदेश फिलहाल नहीं है.. तो क्या राजस्थान छत्तीसगढ़ में पार्टी नेतृत्व का संकट खत्म होने के बाद अंत में मध्य प्रदेश का रुख राहुल गांधी करेंगे .. जहां कमलनाथ नेता प्रतिपक्ष व प्रदेश अध्यक्ष दोनों की जिम्मेदारी निभा रहे हैं.. कमलनाथ समर्थकों का मानना है कि मध्य प्रदेश की स्थिति अलग है..  यहां कमलनाथ को कोई एक पद से भी मुक्त करने का मतलब पार्टी के अंदर नए पावर सेंटर का निर्माण हो जाएगा.. सिंधिया और सरकार दोनों चली जाने के बाद पार्टी नेतृत्व या तो यह जोखिम फोन लेने को तैयार नहीं या फिर उसे सही समय का इंतजार है..

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कांग्रेस में बदलाव और नई पीढ़ी को आगे लाने की जो संकेत राहुल गांधी दे रहे हैं.. यह तभी संभव है जब प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष किसी युवा ऊर्जावान चेहरे को बनाया जाए.. मध्य प्रदेश कांग्रेस के दावेदारों में अधिकांश का यह मानना है की उत्तराधिकारी के चयन के वक्त राहुल गांधी से ज्यादा बड़ी भूमिका कमलनाथ की होगी.. कांग्रेस के अंदर जो माहौल बदला है उससे संदेश यही गया है कि राहुल गांधी द्वारा पार्टी की कमान सशर्त संभालने से पहले हर राज्य में युवाओं की टीम के गठन का काम पूरा करना चाहेंगे.. फैसले के दिन राहुल और प्रियंका गांधी अब सोनिया गांधी को भरोसे में लेकर लेते हैं तो इससे पहले राहुल गांधी किस टीम के महत्वपूर्ण सदस्य बनकर सामने आए वेणुगोपाल, सुरजेवाला, इस रावत, अजय माकन की राय महत्वपूर्ण ही नहीं निर्णायक साबित होती है.. ऐसे में सवाल बतौर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ जैसा अनुभवी नेता क्या ढलती उम्र में राहुल गांधी के अध्यक्ष रहते टीम का हिस्सा बना रहना चाहेंगे.. वह भी तब जब राज्यों की कमान युवा चेहरों के हाथों में होगी..

अध्यक्ष की कुर्सी छोड़कर नेता प्रतिपक्ष बने रहकर कमलनाथ 2023 के पीएम इन वेटिंग के स्वीकार्य सबसे बड़े दावेदार बने रह सकते हैं.. महाराज के कांग्रेस छोड़ देने के बाद अब नाथ और राजा की जोड़ी पर ही राहुल दांव लगाएंगे.. या फिर अपनी टीम के नए और चौंकाने वाले चेहरे को संगठन की कमान सौंपकर वह 2023 और 24 की तैयारी करना चाहेंगे.. यह सवाल है जिस पर सहमति, समन्वय और स्वीकार्यता के अभाव में फैसला रुका हुआ है.. मंडलम स्तर पर जमीनी जवावट का दावा करने वाली कमलनाथ कांग्रेस का कड़वा सच यही है कि छुटपुट आंदोलन छोड़ दिया जाए तो वह ट्विटर और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित होकर रह गई.. राज्यसभा चुनाव में पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस जो माहौल मध्यप्रदेश में बना सकती थी उसका जोखिम उसने मोल नहीं लिया.. क्रॉस वोटिंग का खतरा कांग्रेस के अंदर से ज्यादा कमलनाथ की स्वीकार्यता पर बड़ा सवाल खड़ा कर सकता था.. कांग्रेस के अंदर ऐसे भी नेता है जो विधानसभा के फ्लोर पर अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराने पर जोर दे रहे हैं.. लेकिन यह भी किसी जोखिम से कम नहीं होगा.. कांग्रेस के अंदर कमलनाथ के बाद अब उनके सबसे भरोसेमंद केयरटेकर प्रेसिडेंट के तौर पर पूर्व मंत्री सज्जन वर्मा की गिनती होती है.. आदिवासी दलित और पिछड़े वर्ग का मुद्दा जोर-शोर से उठाती रही.. कांग्रेस को यह संदेश देना होगा की प्रदेश अध्यक्ष हो या फिर नेता प्रतिपक्ष जब भी कमलनाथ अपनी मर्जी से ही सही कुर्सी छोड़ेंगे तो फिर इस वर्ग का नेतृत्व सामने लाया जाएगा..

ऐसे में मजबूत विपक्ष होने के बावजूद कांग्रेस की समस्याएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही.. दमोह विधानसभा उपचुनाव की जीत कांग्रेस को जो ताकत दी थी.. उसे चार उपचुनाव में धार देने में संगठन सफल नहीं हो पाया है.. ऐसे में सवाल चार उपचुनाव में क्या कांग्रेस सिर्फ शिवराज और भाजपा विरोधी माहौल को भुनाने के इंतजार तक सीमित होकर रह गई.. यानी सरकार की विफलताए और एंटी इनकंबेंसी चुनाव जिताने के लिए काफी है.. या फिर उसे भरोसा है कि मंडलम स्तर पर बनाया जा रहा  वह मजबूत संगठन उपचुनाव में उसकी जीत का मार्ग प्रशस्त कर देगा.. कांग्रेस में चारों सीटों पर टिकट को लेकर ज्यादा विवाद नहीं है .. लेकिन सिर्फ उम्मीदवार के भरोसे कांग्रेस मैदान में जाएगी.. वोट मांगने कौन जाएगा दिग्विजय सिंह जिनके बारे में उमा भारती खुद उनकी बात को दोहरा दी है कि उनके जाने से वोट कट जाते.. या फिर मुख्यमंत्री ,नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ.. क्या गारंटी है कि वह इन उपचुनाव में ताबड़तोड़ सभाएं करेंगे.. कमलनाथ के बाद उनकी कैबिनेट के पूर्व सहयोगियों में वह कौन नेता  जो उनकी भरपाई 4 उपचुनाव वाले क्षेत्रों में कर सके.. क्या कमलनाथ की गैरमौजूदगी में किसी पूर्व मंत्री और दूसरे नेता ने अभी तक 4 उपचुनाव वाले क्षेत्रों का दौरा कर कार्यकर्ताओं में जोश भरने की जहमत उठाई है..

कमलनाथ खुद अपने भरोसे चार उपचुनाव में सक्रिय होंगे या फिर दिग्विजय सिंह के साथ जोड़ी बनाकर घूमेंगे.. सवाल कमलनाथ की मध्य प्रदेश से दूरी बनाने के बीच प्रदेश प्रभारी मुकुल वासनिक आखिर कहां है.. सवाल कांग्रेस और कमलनाथ का चुनावी सर्वे आखिर क्या कहता है.. भाजपा नेताओं के सघन दौरे और सक्रियता  क्या उप चुनाव की आहट का एहसास कांग्रेस को नहीं कराती है.. यदि आने वाले एक पखवाड़े के अंदर उप चुनाव की तारीख का ऐलान हो जाता है.. तो फिर कांग्रेस की निष्क्रियता और तैयारियों का अभाव उसकी समस्याओं में इजाफा नहीं करेगा.. क्या यह स्थिति कमलनाथ के ज्यादातर भोपाल से दूर रहने के कारण बन गई है.. तो फिर ऐसे में उपचुनाव को लेकर कांग्रेस की रणनीति क्या होगी..

जबकि यह चार उपचुनाव कांग्रेस से ज्यादा कमलनाथ के लिए भी किसी बड़े अवसर से कम नहीं.. भाजपा के कब्जे वाली खंडवा और रेगांव सीट जीतने के साथ यदि कांग्रेस जोबट और पृथ्वीपुर में अपना कब्जा बचा लेती है.. तो कमलनाथ के नेतृत्व पर खड़े हो रहे सवालों का जवाब भी हाईकमान को मिल जाएगा.. मिशन 2023 विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट चुकी बदलती भाजपा को संकट में डाल कर  पार्टी के अंदर और बड़े बदलाव को कमलनाथ कॉन्ग्रेस मजबूर कर सकती है.. लेकिन बड़ा सवाल 4 उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार के लिए वोट कौन नेता मांगेगा.. क्या उम्मीदवारों को उनके हाल पर कांग्रेस छोड़ देगी.. लाख टके का सवाल चार उपचुनाव में जब भाजपा सक्रिय तो कमलनाथ कांग्रेस निष्क्रिय क्यों और  सन्नाटा क्यों पसरा है.. यह सन्नाटा आखिर कब.. कौन तोड़ेगा..

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